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गन्ने के बारे में

वानस्पतिक नाम

वानस्पतिक नाम

आजकल की गन्ने की व्यवसायिक प्रजातियां मनुष्य द्वारा संकरित कृन्तक हैं जिन्हें सैक्रम आफिश्नेरम (Saccharum officinarum) एल. और सैक्रम स्पानटेनियम (S.spontaneum) के मिलान से बनाया गया है और इनमें कुछ जीन्स एस. बारबेरी (S. barberi) जेस्विट, एस. साइनेंस (S. sinense) रोक्सब. और कुछ हद तक एस. रोबस्टम (S. robustum) बरैंड्स से भी हैं।

उशणकटिबंधीय क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा संकरित प्रजातियों के विकास से पहले एस. आफिश्नेरम (S.officinarum) कृन्तकों की ही खेती की जाती थी वहीं उत्तरी भारत व चीन के कुछ हिस्सों में एस. बारबेरी (S. barberi) और एस. साइनेंस (S. sinense) कृन्तकों की खेती की जाती थी।

उत्तरी भारत के गन्ने एस आफिश्नेरम (S.officinarum) गन्नों से निमन्नलिखित गुणों में भिन्न थे:

  • पुष्पों के गुणों में
  • पतले से मध्यम मोटाई के गन्ने
  • रस में कम से मध्यम शर्करा
  • उच्चतर रेशे की मात्रा
  • प्रतिकूल हालातों के लिये अधिक प्रतिरोधिता
  • बारबर के भारतीय पनसाही गन्ने एस. साइनेंस से मिलते थे

एस. साइनेंस (S. sinense) के गन्ने चूसने व चीनी बनाने के लिये प्रयोग किये जाते थे जबकि एस. बारबेरी के पतले व सख्त गन्ने चीनी बनाने के काम आते थे।

क्रमिक विकास

क्रमिक विकास- सैक्रम (Saccharum) समूह

सैक्रम समूह को सचित्र देखने के लिये यहां दबाऐं

सैक्रम, इरिएंथस, स्कलैरोस्टाइका और नारेंजा निकट सम्बंधी अन्तर प्रजनन वर्ग हैं जिन्होंने गन्ने की उत्पत्ति में सहयोग दिया है (मुखर्जी, 1957), डेनियल और उनके सहयोगियों (1975) ने इनमें मिस्कैंथस को भी जोड़ने के लिये सुझाव दिया।

सैक्रम समूह में 6 स्पीसिस हैं।

जंगली स्पीसिस: एस. स्पान्टेनियम एल. और एस. रोबस्टम बरैंड्स और जेस्विट एक्स ग्रास्सल्

खेती वाली स्पीसिस: सैक्रम आफिश्नेरम एल., एस. बारबेरी जेस्विट, एस. साइनेंस रोक्सब. और एस. इडयूल हास्सक

वर्तमान भूगौलिक फैलाव के आधार पर मिस्कैंथस और इरिएंथस का रिपिडियम भाग सैक्रम का निकट सम्बंधी हैं और यह सैक्रम समूह के मुख्य भागीदार हैं।

मिस्कैंथस एन्ड्रोपोगोनि की सैक्रीनि उप-जाति में सावर्धिक मौलिक मानी जाती है जबकि स्कलैरोस्टेकिया और नारेंजा काफी बाद में उत्पन्न हुए।

सैक्रम - जो हमारे घ्यान का केन्द्र बिन्दु है और भारत में जिनका गुणसूत्र नम्बर कम पाया जाता है - सम्भवतः क्रमिक विकास में काफी बाद में उत्पन्न हुए।

नोबल गन्नों (एस. आफिश्नेरम) की भूगौलिक उत्पत्ति मेलानेशियन क्षेत्र में सोची जाती है और उनकी वानस्पतिक विज्ञानिक उत्पत्ति भी एक बहुत अधिक अनुमान का विशय रहा है। नोबल गन्नों की उत्पत्ति पर प्रकाश डालने में ग्रास्सल के टैक्सोनामिक अनुसंधानकर्ता सावर्धिक महत्व रखते हैं। पैतृकों के वर्ग में एस. रोबस्टम की भागीदारी के अलावा स्टीवन्सन (1965) के द्वारा इरिएंथस मैगस्मिस ब्रोगन् का भी योगदान सुझाया गया मगर बाद में डेनियल्स और रोच (1987) के द्वारा इसे एस. आफिश्नेरम और मिस्कैंथस के मिलन का संकर पाया गया।

डेनियल्स और रोच (1987) के कथन/प्रस्ताव के लिये प्रमाण जुटाने के लिये डेनियल्स और उनके सहयोगियों (1989) ने फलैवोनोयड कीमोटैक्सोनोमिक मारकर्स के अध्यन से बताया की एस. आफिष्नेरम की उत्पत्ति एस. स्पान्टेनियम, इ. आरुंडिनेशियस और मिस्कैंथस साइनेंस्सि के बीच जटिल अन्तर-मिलन से हुई। इस अन्तर-मिलन के कुछ बीच वाले उत्पादों में एस. रोबस्टम के वर्ग थे जिन्हें आमतौर पर एस. आफिष्नेरम का पूर्वज माना जाता है। एस. रोबस्टम वर्गों में केवल तीन वर्ग हैं - लाल चमड़ी वाले, पोर्ट मोर्सबाइ और टेबोए सालाह - जिनमें से एस. आफिश्नेरम को चुना जा सका होगा। इस बात की सबसे अधिक सम्भावना है कि एस. आफिश्नेरम कृन्तक, जिन्हें पहले प्रशान्त और आखिर में हवाई ले जाया गया उनकी लाल चमड़ी रही होगी। और इसकी पूरी सम्भावना है कि एस. आफिश्नेरम की जनसंख्या को जिनमें से चुना गया वह सेपिक में लाल चमड़ी वाली जनसंख्या रही होगी। इस प्रकार यह साफ हो जाता है कि मिस्कैंथस, एस. आफिश्नेरम के जाति-इतिहास में भागीदार हैं।

एस. आफिश्नेरम का विकास सम्भवतः पूर्वी इंडोनेशिया / न्यू गुआयना क्षेत्र, जो वाल्लेस रेखा के पूर्व में है, में एस. स्पान्टेनियम, मिस्कैंथस और इरिएंथस आरुंडिनेशियस से हुआ जिनमें एस. रोबस्टम एक बीच की कड़ी है (डेनियल्स और रोच 1987)। कीमोटैक्सोनोमिक अध्यनों से प्राप्त सबूत यह इशारा करते हैं कि न्यू गुआयना की एस. स्पान्टेनियम अन्य स्थानों पर मिलने वालों से भिन्न है और एस. आफिश्नेरम इसका निकट सम्बंधी है। एस. आफिश्नेरम की एस. रोबस्टम के रास्ते उत्पत्ति की प्राकल्पना में निमन्नलिखित तथ्य शामिल हैं:

  • नयू गुआयना के नदी किनारे निचले इलाकों से मनुष्य द्वारा अधिक मिठास वाले एस. रोबस्टम का चुनाव
  • नयू गुआयना में 1,000 मीटर से भी अधिक ऊँचाईवाले इलाकों में बाड़ के रुप प्रयोग किये जाने वाले एस.रोबस्टम में से मनुष्य द्वारा अधिक मिठास वालों का चुनाव
  • एस.रोबस्टम की प्राकृतिक जनसंख्याओं या बाड़ के रुप प्रयोग किये जाने वालों में से उनका चुनाव, जिन्हें चूहों और सूअरों द्वारा क्षतिग्रस्त पाया गया, नर्म या मीठे के गुणों के कारण किया गया। इस प्रकार इन मिठास वाली जनसंख्याओं का जनन नदियों के किनारे चलता रहा क्योंकि अधिक मिठास वाले कृन्तक के सक्कर अधिक वृद्धि में सक्षम थे अतः आसपास के वानस्पतिक क्षेत्रों में घुसने के काबिल हो सके।

भूगोलिक विस्तार

भूगोलिक विस्तार

एस. स्पानटेनियम एक अति बहुरुपीय, दूर दूर तक उषणकटिबंधीय और उपोषणकटिबंधीय क्षेत्रों मेें फैली हुई जंगली घास है।

एस. रोबस्टम ऊँचे और मोटे गन्नों वाला नयू गुआइना और इंडोनेशिया की नदियों के किनारे पाया जाता है।

एस. आफिश्नेरम, नोबल गन्ने, केवल पालतू हालात में मिलता है और इसकी बड़ी भिन्नता को चूसने वाले गन्नों के रुप में नयू गुआइना और इंडोनेशिया के स्थानीय बगीचों में अनुरक्षित है।

एस. बारबेरी और एस साइनेंस उतरी भारत और चीन के गन्ने हैं जिनकी खेती चीनी उत्पादन के लिये की जाती रही है।

एस इडयूल एक बहुरुपीय स्पीसिस है जिसमें गुणसूत्र नम्बर 2एन = 60, 70 और 80 पाया जाता है ओर इसमें एन्यूपलाइड मिलते हैं । इसकी खेती प्रशान्त द्वीपों में इसके पुष्पगुछ के गर्भपात/ निश्फल होने के कारण एक सब्जी के रुप में की जाती है। एस इडयूल के गन्ने एस. रोबस्टम से मिलते हैं और इसे एस. रोबस्टम, एस. आफिश्नेरम और मिस्कैंथस स्पीसिस का प्राकृतिक संकर माना जाता है।

कोशिकानुवांशिकी

कोषिकानुवंषिकी

गुणसूत्र संख्या

  • एस. स्पान्टेनियम (S.spontaneum L.): 2n = 40-128
  • एस. रोबस्टम बरैंडेस और जेस्विट एक्स ग्रास्सल(S.robustum Brandes & Jesw ex Grassl): 2n = 60-170
  • एस. आफिश्नेरम (S.officinarum L.): 2n = 80
  • एस. बारबेरी जेस्विट (S.barberi Jesw.): 2n = 81-124
  • एस. साइनेंस रोक्सब (S.sinense Roxb.): 2n = 111-120
  • एस. इडयूल हस्सक(S.edule Hassk.): 2n = 60-80
  • इर्विन (1999) ने सैक्रम में केवल दो स्पीसिस, , नामश: एस. स्पान्टेनियम और एस. आफिश्नेरम, जिसमें एस. रोबस्टम, एस. आफिश्नेरम, एस. इडयूल, एस. बारबेरी और एस. साइनेंस शामिल हैं, का सुझाव दिया।
  • एस. स्पान्टेनियम के सायटोप्लास्मिक डी.एन.ए. अनुक्रम दूसरों सभी से अलग थे।
  • एस. स्पान्टेनियम के कलोरोप्लास्ट, माइटोकोन्ड्रिया और राइबोसोम्स से प्राप्त डी.एन.ए. कीे बेस जोडि़यों के अनुक्रम एस. आफिश्नेरम, एस. रोबस्टम, एस. साइनेंस और एस. बारबेरी से भिन्न थे जबकि इन सभी की बेस जोडि़यों के अनुक्रम आपस में एक दूसरे से अलग नहीं थे।

पुनुरुत्पादन क्रियाविधि

पुनुरुत्पादन क्रियाविधि

गन्ना एक प्रति-परागण स्पीसिस है यद्यपि सैल्फिंग कम स्तरों पर पाई जाती है। यद्यपि गन्ने के फूलों में कम नर उरवर्ता पाई जाती है मगर यह कभी ही नर बांझ होते हैं। गन्ने के पराग बहुत छोटे होते हैं और हवा द्वारा बिखरते हैं। यह स्फुटन के बाद जल्दी जल्दी सूखते हैं; इनकी जि़ंदगी का आधा समय केवल 12 मिन्ट है और बिना बदलाव के वातावरण (26o सी. और 67% सापेक्ष नमी) में 35 मिन्ट के बाद अंकुरणक्षम नहीं रहते। अतः अंकुरणक्षम पराग खेतों में ज़्यादा दूरी तक नहीं बिखर पाते। गन्ने के पराग को 4oसी. 90-100% सापेक्ष नमी पर 14 दिनों के लिये भंडारित करने पर अंकुरण क्षमता कुछ हद तक बनी रहती है।

गन्ने में पुष्पण एक महत्वपूर्ण विशय है। एक तरफ जहाँ प्रजनन विज्ञानिकों के लिये नई प्रजातियों को विकसित करना आवष्यक है वहीं किसान इसके हक में नहीं दिखते। गन्ने में देष के कुछ हिस्सों में प्राकृतिक तौर पर पुष्पण होता है जबकि कुछ दूसरे इलाकों में या तो पुष्पण होता ही नहीं है या फिर कभी ही होता है। पुष्पण दक्षिण से उत्तर की तरफ जाते हुए कम होता जाता है। दिन की लम्बाई (प्रकाषावधि), तापमान, नमी और अक्षान्तर में स्थानान्तरण का पुश्पण के वर्ताव में अन्तर दिखाई देता है।

जेस्विट (1925) ने पुष्पण षुरुआत, पुष्पगुच्छ के विकास और इसका अन्त में बाहर दिखाई देने के समय के दौरान हो रहे बदलावों का एक अत्यन्त सुन्दर विवरण दिया है। शिखर पर उपस्थित पत्ते के आकार को देखकर यह अन्दाज़ लगाया जा सकता है की इस तने में पुष्पण की शुरुआत हो गई है। शिखर पर पत्तों का आकार धीरे धीरे कम होते होते बहुत ही कम हो जाता है, जिसे ’छोटा ब्लेड’ कहा जाता है, जिसके बाद पुष्पगुच्छ या ’एैरो’ बाहर निकलता है। पुष्पण शुरुआत से ’छोटा ब्लेड’ से ’एैरो’ के पूरे बाहर आने तक का समय विभिन्न स्पीसिस में भिन्न भिन्न होता है।

गर्भाधान करना

गर्भाधान करना

व्यवसायिक संकरणों में पुष्पण ऋतु का फैलाव 2 महीने के समय (अक्तूबर - नवम्बर) तक होता है। ’छोटे ब्लेड’ से ’एैरो’ तक का समय 7 से 27 दिन का देखा गया है। जैसे ही एैरो बाहर निकलता है, आमतौर पर इसकी टहनियां फैलनी शुरु हो जाती हैं। बालियों (फूलों) के खुलने का समय (एन्थेसिस) भिन्न होता है मगर यह सदा ऊपर से नीचे की तरफ और टहनियों के शिखर से केन्द्रीय डंडी (एक्सिस या रैकिस) की तरफ ही खुलती हैं। एस. स्पान्टेनियम, एस. बारबेरी और एस. साइनेंस में डंडी वाली बालियां (पैडिस्लिेट स्पाइकलैट्स) पहले और बिना डंडी (सैसाइल) वालीे बालियां अगले दिन खुलती हैं जबकि इससे उल्ट एस. आफिषनेरम, एस. रोबस्टम और इरिएंथस में बिना डंडी वाली बालियां पहले और डंडी वाली बालियां अगले दिन खुलती हैं। कभी कभी कुछ एस. बारबेरी और एस. आफिषनेरम में दोनो तरंह के फूल साथ साथ खुलते हैं (दत्ता और उनके सहयोगी, 1938ए)। आमतौर पर बालियों का खुलना जल्द सुबह देखा गया है जबकि इरिएंथस स्पीसिस में इसे शाम करीब 4 बजे देखा गया है।

SpeciesTime of Anthesis
एस. स्पान्टेनियम (S.spontaneum) सुबह 05.30 से 7.00 बजे तक
एस. आफिषनेरम(S.officinarum) सुबह 05.45 से 11.00 बजे तक
एस. रोबस्टम(S.robustum) सुबह 06.00 से 10.30 बजे तक
गन्ना सुबह 05.00 से 11.00 बजे तक

प्राकृतिक परागण

प्राकृतिक परागण

एन्थसिस के समय बाहर वाले गलूमस (1 और 2) थोड़े से फैल जाते हैं। धागे (फिलामैंट्स) जल्दी से लम्बे होते हैं जो बालियों के प्रौढ़ एन्थरस को गलूमस के बीच में से बाहर धक्का देते हैं और एन्थरस चलायमान बनकर हवा से डोलने लगते हैं। एन्थर्स का स्फुटन एक छेद के बीच से या झिररी के हिस्से से होता है और हवा पराग कणों को उड़ा ले जाती है। बाद में खाली एन्थरस सूखकर गिर जाते हैं। आमतौर पर स्टाइल भी लम्बा होकर परों वाले स्टिग्मा को हवा द्वारा लाये गये परागों को पकड़ने में मदद करता है।

परागण के बाद बालियां बंद हो जाती हैं। विषेशकर गन्ने के कुछ कृन्तकों में जो नर बांझपन देखा गया है वह एन्थर्स के बाहर न आ पाने, स्फुटन न हो सकने, परागों में खराबी, पराग कणों का आपस में चिपकाव और परागों में उरवर्कता में कमी इत्यादि के कारण से हो सकती है (दत्त एवं सहयोगी, 1954)। स्पान्टेनियम के कुछ कृन्तकों में प्रोटोगाईनी देखी गई है। मौसम के हालातों का भी कुछ असर एन्थसिस के समय और स्फुटन पर पड़ता है। ठंडे, बादलों या बारिश वाले दिन एन्थसिस या स्फुटन में देरी कर देते हैं जबकि धूप वाले, सूखे और हवा चलने वाले दिन एन्थसिस या स्फुटन जल्द कर देते हैं।

दत्त एवं सहयोगियों (1938बी) ने बिना डंडी वाली बालियों में डंडी वाली बालियों में अधिक बीजों का बनना देखा गया और इसी तरंह बनने वाले बीजों का अंकुरण बेहतर था और उन बीजों से जनित पौधे अधिक शक्तिशाली भी थे। ऊपर दिया गया विवरण सैक्रम और इरिएन्थस स्पीसिस में समान्यतः देखा जाता है जबकि केवल समय और समयावधि में कुछ अन्तर देखा जाता है।

गन्ने का बीज या ’फज़’ पूरा फूलों वाला पुष्पगुच्छ है जिसमें फूलों की मुख्य धुरी और बड़ी बड़ी पुष्प-शाखाओं की धुरी भी नहीं होती। प्रौढ़ फज़ प्रौढ़ सूखे फलों, गलूमस, कैलस बालों, एन्थर्स और स्टिगमा का बना होता है। पुष्पगुच्छ के फालतू हिस्से भी न केवल भंडारित किये जाते हैं बल्कि बीजने के सपय भी साथ ही रहते हैं क्योंकि उनको अलग करना क्रियात्मक नहीं है। यद्यपि गन्ने की कई व्यवसायिक प्रजातियां बीज उत्पन्न करती हैं मगर फज़ केवल प्रजनन कार्यक्रमों में ही प्रयोग किया जाता है क्योंकि बीज जनित पौधों में से केवल कुछ में ही अपने व्यवसायिक पैतृकों जैसे सस्य विज्ञानिक गुण बहुत कम में ही पाये जाते हैं। गन्ने का फज़ बहुत थोड़ी देर ही जीवनक्षम रहता है क्योंकि 80 दिनों में 28oसी. पर 90% जीवनक्षमता में कमी आ जाती है यदि उनका पानी पूरी तरंह से सुखा न दिया जाये।

सन्दर्भ

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