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अनुवांशिक अध्यन

अनुवांशिक अध्यन

अनुवांशिक अध्यन

पादप प्रजनन के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण कारनामों में से एक है सैक्रम स्पानटेनियम का गन्ने के विकास में प्रयोग। किसी भी और फसल में जंगली स्पीसिस का प्रयोग इतनी सफलता से नहीं हुआ जितना गन्ने में मनुष्य की ज़रुरतें पूरी करने में किया गया है। एस. स्पानटेनियम की जंगली स्पीसिस में जैविक और अजैविक तनावों की पूरी श्रंखला के विरुध उच्च स्तर की प्रतिरोधिता है। डा0 सी.ए. बारबर, जो तब इस संस्थान में गन्ने के विशेषज्ञ थे, को जंगली स्पीसिस के प्रयोग करने का यह निपुण विचार गन्ने में सुधार लाने के लिये आया। उन्होंने गन्ने की व्यवसायिक प्रजातियों में जैविक व अजैविक तनावों के लिये प्रतिरोधिता लाने के लिये एस. आफिशनेरम को मादा के रुप में लेकर उसे एस. स्पानटेनियम को नर के रुप में प्रयोग कर संकरण किया। इस प्रयोग से प्राप्त को. 205 प्रजाति की उपोषणकटिबंधीय इलाके में शुरुआती सफलता ने गन्ने के विकास के कार्य में विस्फोट सा ला दिया जिससे गन्ने की कृषि में न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के गन्ना उगाये जाने वाले देशों में भी क्रान्ति आ गई।

डा0 बारबर के इस निपुण विचार के अलावा एक अन्य बहुत महत्वपूर्ण घटक, जिसने संस्थान में प्रजनन की कोशिशों को सफल बनाने में योगदान दिया, वह था यहां (कोयम्बत्तूर में) पुष्पण एवं बीज का बनना जो, गन्ने में प्रजाति विकास में, विश्व भर के प्राकृतिक हालातों में एक अति संवेदनशील समस्या है। विश्व में स्थान विशेष के साथ गन्ने में पुष्पण में एक पैटर्न दिखाई देता है। उषणकटिबंधीय क्षेत्र में सारा साल पुष्पण होता रह सकता है यदि फसल में काफी वृद्धि हो सके। जैसे ही आप उषणकटिबंधीय क्षेत्र के उत्तर और दक्षिण की तरफ चलते हैं तो पुष्पण में अधिक से अधिक संकुचन देखा जाता है मगर उर्वरता का स्तर बढ़ जाता है। ऐसे स्थान जो उत्तर और दक्षिण में 110 अक्षांश पर स्थित हैं वहां वर्ष में पुष्पण 2 से 3 महीने के बीच ही हो पाता है। उत्तरी गोलार्ध में यहां मध्य अक्तूबर से जनवरी मध्य तक पुष्पण होता है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में वहां मध्य अप्रैल से मध्य जुलाई तक पुष्पण होता है। क्योंकि इन इलाकों में उर्वरता का उच्च स्तर रहता है इसलिये अधिक गन्ना प्रजनन संस्थान इन्ही इलाकों में स्थित हैं। कोयम्बत्तूर इन्हीं में से एक स्थान है जिसको कुछ और भी अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध हैं: यहां दोनो मानसून ऋतुओं में वर्षा होती है और क्योंकि यह पश्चिमी घाटों के हवा की दिशा में स्थित है जिससे इसे तापमान, नमी और हलकि हवा का रुख उपलब्ध होता है जो पुष्पण और बीज बनने के लिये अति आवश्यक है। अतः कोयम्बत्तूर में पुष्पण और बीज बनने के लिये विश्व के सर्वोतम प्राकृतिक हालात उपलब्ध हैं।

प्राकृतिक हालातों में पुष्पण का होना अति मुश्किल हो जीता है जब हम 110 अक्षांश से आगे निकलते हैं जिसके लिये बनावटी तकनीकों की आवश्यक्ता होती है ताकि पुष्पण हो सके।

नोबिलाइज़ेशन

नोबिलाइज़ेशन

पहले के डच कार्यकर्ताओं ने एस. आफिश्नेरम को इसकी विशिष्ट दिखावट के कारण इसे ’नोबल गन्ना’ बुलाया गया। डच गन्ना प्रजनक जेस्विट ने जावा में पहली बार ’नोबिलाइज़ेशन’ षब्द का प्रयोग क्रासिंग और वापिस क्रासिंग के कार्यक्रम को दिया, जिसके द्वारा सख्त और रोग प्रतिरोधि परन्तु नीचे दर्जे के जंगली वर्ग के गन्नों को अधिक आकर्षक और मीठे नोबल गन्नों के साथ क्रासिंग कर धीरे धीरे उनमें उन्नती लाई गई (स्टीवेंनसन, 1965)। मगर इस प्रकार के कार्यक्रम में वापिस क्रासिंग को समान्य ढंग से लिया गया बजाये यथार्थ अनुवांषिक अर्थ में क्योंकि क्रमिक नोबल गन्नों की प्रजातियां एस. आफिश्नेरम के विभिन्न कृन्तक थे जिससे सन्ततियों में विविधता लाई जा सके। नोबिलाइज़ेशन की इस प्रक्रिया में गुणसूत्रों का स्थानान्तरण नीचे दिया गया है:

गुणसूत्रों का नोबिलाइज़ेशन के दौरान स्थानान्तरण - चित्र

Nobilization process

नोबिलाइज़ेशन की इस प्रक्रिया में कोशिकाअनुवंषकी की अनूठी बात यह थी की संकर सन्ततियों में एस. आफिश्नेरम से 2एन गेमीटस जबकि एस. स्पान्टेनियम से एन गेमीटस प्राप्त हुए। इस बात को बहुत पहले 1923 में बरेमर ने प्रमाणित कर दिया था। मगर बदले वाले क्रासिस में n + n स्थानान्तरण देखा गया है। दूसरी तरफ जब संकर को एस. आफिश्नेरम को मादा के रुप में लेकर वापिस क्रासिंग की गई तब फिर 2एन + एन (2n + n) स्थानान्तरण देखा गया। और अधिक वापिसी क्रासिंगस में देखा गया की 2n गेमीटस अपना कार्य करें या न करें, यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस एस. आफिश्नेरम को प्रयोग किया गया। नोबिलाइज़ेशन की इस प्रक्रिया में यह एक प्राकृतिक तोहफा है की गन्ना प्रजनकों को खेती की जा रही प्रजाति का उन्हें पूरे का पूरा जिनोम 2एन $ एन के स्थानान्तरण में मिलता है जबकि जंगली एस. स्पान्टेनियम के अधिकतर अनावश्यक गुणसूत्रों को हटाया जा सकता है वहीं अनुकूल गुणसूत्रों को रखा जा सकता है। इसके बाद शब्द नोबिलाइज़ेशन में फैलाव लाया गया जिसमें सैक्रम की सभी जंगली प्रजातियों या उससे सम्बंधित जैनरा का प्रयोग एस. आफिश्नेरम के साथ क्रासिंग के लिये किया गया। कभी कभी इस शब्द को किसी व्यवसायिक प्रजाति को एस. स्पानटेनियम के साथ क्रासिंग के लिये भी प्रयोग किया गया है मगर इसे 'नोबिलाइज़ेशन' कहना ठीक नहीं है और इससे दूर रहना चाहिये।

गन्ने का जीनपूल

गन्ने का जीनपूल

एस. आफिशनेरम गन्ने की मूल स्पीसिस है। यह माना जाता है की इसकी उत्पत्ति इंडोनेशिया के आरकिपेलागो में हुई। यह स्पीसिस प्राकृतिक हालातों में जंगलो में उगती नहीं पाई जाती पर इसे प्रायद्वीपों में लम्बे समय से उगाकर अनुरक्षित किया गया है। बाद में इसे दक्षिणी भारत में उगाया गया। इसके अलावा दो अन्य स्पीसिस, नामशः एस. बारबेरी और एस. साइनेंस, की भी खेती की जाती रही है। एैसा विश्वास किया जाता है यह दोनो स्पीसिस एस. आफिशनेरम और जंगली स्पीसिस से उत्पतित संकर हैं। एस. बारबेरी को उत्तरी भारत में और एस. साइनेंस को चीन में उगाया जाता रहा है। उन्नत प्रजातियों, जिन्हें असाधारण संकरण पद्यतियों द्वारा विकसित किया गया है, के आने के कारण इन दो स्पीसिस की अब खेती नहीं की जाती है। इसके अलावा गन्ने से सम्बंधित और भी स्पीसिस और जैनरा भी हैं। व्यवसायिक प्रजातियां, जो एस. आफिशनेरम, एस. स्पानटेनियम, एस. बारबेरी और एस. साइनेंस के मिलन का उत्पाद हैं, मूल जीनपूल हैं क्योंकि इनके नर मादा के मिलन से उत्पतित पहली सन्तति ही एक क्षमतावान खेती योग्य लाइन को जन्म दे सकती है। खेती की जा रही स्पीसिस नामशः एस. आफिशनेरम, एस. बारबेरी और एस. साइनेंस द्वितीय जीनपूल हैं क्योंकि प्रजाति विकास के कार्यक्रम में प्रजनन प्रक्रिया में इनके प्रयोग करने पर कई सन्ततियों के योगदान की आवश्यक्ता पड़ती है। प्रजाति विकास कार्यक्रम में जंगली स्पीसिस के अनावश्यक प्रभावों को हटाने के लिये कई सारी पीढि़यों की आवश्यक्ता पड़ती है और इसके लिये एस. स्पानटेनियम और एस. रोबस्टम तृतीय जीनपूल का काम करते हैं। सम्बंधित जैनरा को एक दूरस्थ जीनपूल कहा जाता है और अभी तक इनका सफलता पूर्वक प्रयोग प्रजाति विकास में नहीं किया जा सका हैं इनमें से इरिएंथस अरुंडिनेशियस, जो केवल एक ही गन्ना बना सकने वाली स्पीसिस है जो पूरे संसार में बहुत सारे प्रजनन विज्ञानिकों का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही हैं, विशेषकर इनकी उच्च जीव भार उत्पादन क्षमता व जैविक और अजैविक तनावों की प्रतिरोधि क्षमता के कारण है।

प्रजनन के दृष्टिकोण से केवल एस. आफिशनेरम, एस. स्पान्टेनियम, एस. रोबस्टम और इ. अरुंडिनेशियस को ही मुख्य जीनपूल माना जाना चाहिये क्योंकि एस. बारबेरी और एस. साइनेंस को एस. आफिशनेरम और एस. स्पानटेनियम के अन्तःमिलन का फल माना जाता है (ब्रैंडेस, 1958)। तीन जंगली स्पीसिस में से एस. रोबस्टम का प्रयोग अभी तक कोई खासतौर पर सफल नहीं हो पाया है, शायद इसलिये की यह अनुवांशिक तौर पर एस. आफिशनेरम के बहुत ही निकट है जैसा की आणविक तकनीकों के प्रयोग से पता चला है। अतः खेती किये जा रहे एस. आफिशनेरम और जंगली एस. स्पान्टेनियम एवं इ. अरुंडिनेशियस, व्यवसायिक प्रजातियों के बहुत बड़े समूह के साथ, गन्ने में विकास कार्य के लिये प्रजनकों के पास सबसे महत्वपूर्ण समग्री है।

वर्तमान की व्यवसायिक प्रजातियां क्रासिंग, अन्तर-क्रासिंग और वापिस-क्रासिंग (बैकक्रासिंग), जिसमें इन दो स्पीसिस के साथ साथ एस. बारबेरी और एस. साइनेंस का योगदान भी है, के उत्पाद हैं। इन खेती की जा रही प्रजातियों में एस. आफिशनेरम के सभी वांछित गुणों के साथ एस. स्पान्टेनियम के प्रतिरोधि घटकों के साथ साथ इसकी उच्च जीव भार उत्पन्न करने की क्षमता भी शामिल हैं।

2एन स्थानान्तरण

2एन स्थानान्तरण

डिम्ब कोशिकाओं के द्वारा 2एन स्थानान्तरण की क्रियाविधि का अध्यन

गन्ने में 2एन + एन स्थानान्तरण को समझने के लिये कई परिकल्पनायें दी गई हैं (प्राइस, 1961) उनमें से कुछ हैं:-

  • बिना कम हुए डिम्ब कोशिकाओं का बनना
  • गुणसूत्रों का डायड या टैटराड प्रवस्था में अन्तःप्रतिरुपण द्वारा दुगना होना
  • दो सबसे अन्दर वाले गुरुतर बीजाणुओं का अर्धसूत्री विभाजन के बाद संलगन
  • डिम्ब कोशिकाओं में अर्धसूत्री विभाजन के बाद अन्तःसूत्री विभाजन
  • n + n गेमीट्स में असामन्जस्य या तो चयनात्मक गर्भधान कर दोशपूर्ण भ्रूणपोष के विकास के कारण विशेष युग्मनज संयोजनों की असफलता के कारण या फिर चयनात्मक गर्भधान करने और अनिषेकजनन के कारण यानि के 2n + n और n + n युग्मनजों की भेदकर उत्तरजीविता
  • दोषपूर्ण भ्रूणपोष का विकास (चयनित उत्तरजीविता) के कारण कुछ विशेष सम्मिलित युग्मनजों का न बन पाना

डिम्ब कोशिकाओं का दो अगुणित गुणसूत्रों के समूह के बनने की स्टीक प्रक्रिया अभी तक अनिश्चित है। अगुणित गुणसूत्रों वाली डिम्ब कोशिकाओं के बनने की सम्भावना को रोका जा सकता है चूंकि एस. आफिशनेरम x एस. स्पान्टेनियम के बीच क्रासिस से बने संकरों में मादा के गुणों का पृथक्करण देखा जाता है। गुणसूत्रों की संख्या में वृद्धि एस. आफिशनेरम के डिम्ब-न्यूकलियस के गुणसूत्रों का एस. स्पान्टेनियम के शुक्राणु के साथ गर्भधान के दौरान करोमेटिडस का अलग होना इसका कारण हो सकता है; या फिर चैलेज़ा के गुरुतर बीजाणुओं के गुणसूत्रों का अन्तःप्रतिरुपण के द्वारा दुगना होकर (n + n) गुणसूत्रों वाली डिम्ब कोशिकायें उत्पन्न करना जो या तो पहले अर्धसूत्री विभाजन के बाद डायाड प्रवस्था पर या फिर दूसरे अर्धसूत्री विभाजन के टैटराड प्रवस्था के बाद मगर गर्भधान से पहले हो सकता है। इसके बावजूद की यह प्रक्रिया (2n + n) युग्मनजों के बनने को तो समझा सकती है मगर फिर भी यह एस. आफिशनेरम में सैल्फिंग पर या अन्तःजातीय क्रासिंग पर गुणसूत्रों के एन गुण सूत्रों का स्थानान्तरण नहीं समझा पाती है; (2n + n) स्थानान्तरण केवल अन्तरजातीय क्रासिंग में परागण और गर्भधान के बाद देखा जाता है। इस सबसे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है की एस. आफिशनेरम अर्धगुणसूत्रों और समगुणसूत्रों वाली डिम्ब कोशिकायें उत्पन्न करती है। इस प्रकार की घटना की दो व्याख्यायें होंगी - 1. 2n और n डिम्ब कोशिकायें चुनकर गर्भधान करती हैं या 2. गुणसूत्रों का डिम्ब कोशिकाओं में दुगना होना उस समय होता है जब डिम्ब कोशिका एस. स्पान्टेनियम के शुक्राणु के न्यूकलियस द्वारा गर्भधान करती है।

स्वतः-संयोजित जोडि़यां

इसके बावजूद की गन्ने में काफी विभिन्न तरंह के जिनोम उपस्थित रहते हैं, मगर फिर भी नोबिलाइजेषन के दौरान संकरों और वापिस क्रासिंग पर प्राप्त सन्ततियों के संकरों में बहुसूत्रों/एकसूत्रों का बनना महत्वपूर्ण रुप में नहीं पाया गया है। इस प्रकार की अपूर्ण सजातीय गुणसूत्रों के बीच संयोजित जोडि़यों का न मिलना जिनोमस के बीच गुणसूत्रों के अदान-प्रदान की सोच को प्रतिबंधित करता है। एस. आफिशनेरम x एस. स्पानटेनियम के बीच बने संकरों में गुणसूत्रों की जोडि़यों का बनना सामान्य बात है। अर्धसूत्री विभाजन अध्यनों ने दिखाया है की मैटाफेस 1 के दौरान अधिकतर द्विसूत्री और बहुत ही कम एकसूत्री गुणसूत्र पाये जाते हैं (ब्रैमर, 1961 और प्राईस, 1957)। अकालिक रुप से बंटे हुए एकसूत्री जब भी मिलते हैं, उन्हें एनाफेस 1 पर फिस्सडी के रुप में पाया गया और प्रायः न्यूकलियस में सम्मिलित पाये गये। प्राकृतिक और मनुष्य द्वारा बनाये बने संकरों में नर व मादा जननक्षम थे। पराग कणों का औसत अंकुरण 75% था जो 40 से 100% के बीच था। पूरी तरंह से नर बांझ सन्ततियां कभी बहुत ही कम मिलती हैं मगर एैसा जैनेटिक कारणों से सम्भव है न की अर्धसूत्री विभाजन में गड़बड़ी के कारण।

यदि स्वतः-संयोजित जोडि़यां पूरी तरंह से बन जाती हैं तो जिनोमस के बीच टुकड़ों का अदान-प्रदान अनिष्चित है। इसके आधार पर शुरुआत के गन्ना प्रजनक इस निर्णय पर पहुंचे की एस. आफिशनेरम और एस. स्पानटेनियम के जिनोम के बीच कोई आपसी मिलन नहीं होता है। मगर डी.’होन्ट और सहयोगियों ने 1996 में एक खेती किये जा रहे कृन्तक में यथास्थान संकरण अध्यनों में पुर्नसंयोजित जिनोमिक डी.एन.ए (DNA). विधि द्वारा दिखाया की आर. 570 (2 एन = 107-115) में गुणसूत्रों का करीब 10% एस. स्पान्टेनियम से आया पाया गया और करीब 10% को एस. आफिशनेरम और एस. स्पानटेनियम के गुणसूत्रों के पुर्नसंयोजन से बना हुआ पाया गया। यह इस बात की और इशारा करते हैं की संकरित सन्ततियों में स्वतः-संयोजित जोडि़यां का बनना पूरा नहीं था और प्रजनकों ने शायद एैसे पृथ्ककृतों को बिना ध्यान दिये चुना जो बहुत कम होने वाली अपूर्ण सजातियों के गुणसूत्रों के संयोजित जोडि़यों से बने थे।

1980 से नोबिलाइज़ेशन

1980 से नोबिलाइजेषन

एस. स्पान्टेनियम के जिनोम से अजैविक तनावों के विरुध प्रतिरोधिता के गुणों को स्थानान्तरित करने के लगातार प्रयासों की आवश्यक्ता है ताकि अत्याधिक विविधिता लाई जा सके। बारबर के एस. आफिशनेरम (वेल्लाई) और एस. स्पान्टेनियम (कोयम्बत्तूर प्रकार) के बीच क्रासिस के सफल प्रयास के समय से 60 के दशक तक विभिन्न कृन्तकों को प्रयोग कर बेहतर प्रजातियों के विकास के क्रम को जारी रखा गया। आज की प्रजातियों के विकास के लिये केवल आज तक नीचे दिये गये 11 एस. आफिशनेरम कृन्तकों और 2 एस. स्पान्टेनियम का प्रयोग किया गया हैः

एस. आफिशनेरम - एषि मारिशियस, बदिला, बनजर्मेसिन हित्म, ब्लैक चेरिबोन, फिडजि, ग्रीन स्पोर्ट, कालुथाइ बूथन, लहाइना, लायथर्स, स्ट्राइप्ड मारिशियस और वेल्लाइ।

एस.स्पान्टेनियम - कोयम्बत्तूर प्रकार और जावा प्रकार

आधार जनसंख्या में जैनेटिक समग्री की विविधिता लाने के लिये पिछले 15 वर्षों में बड़ा गहन कार्य किया गया है जिससे क्षमतावान प्रजातियों के विकास में, उनके पैतृकों में, निमन्नलिखित जैनेटिक आधार रहे हैं:-

एस. आफिशनेरम:: 28 NG 51, 28 NG 93, 28 NG 210, 28 NG 221, 28 NG 224, 57 NG 78,57 NG 110, NG 77-63, NG 77-92, NG 77-99, NG 77-137, Uahi-e-pele.

एस.स्पान्टेनियम: SES 44A, SES 69, SES 87A, SES 90, SES 91, SES 93, SES 131, SES 198, SES 275, SES 515-7, SES 517 A, SES 538

विभिन्न क्षेत्रों में प्रजाति मूल्यांकन के अन्तरगत कुछ आशावान सामग्री विकसित की गई है जिसमें से थोड़े को. स्तर तक पहुंच गए हैं।

इ. अरुंडिनेषियस में नोबिलाइज़ेशन

इ. अरुंडिनेषियस में नोबिलाइजेषन

एस. स्पान्टेनियम के अलावा एक और महत्वपूर्ण गन्ना बनाने वाली जंगली स्पीसिस, जो जीनस् सैक्रम से सम्बंधित है, वह है इरिएंथस अरुंडिनेशियस जिसको नोबिलाइज किया जा सकता है। इस स्पीसिस की क्षमता इसके जीन समूह में उच्च रेशे, उच्च जीव भार, सूखे व जलप्लावन के हालातों को सहने की क्षमता, हानिकारक जीवों और रोग प्रतिरोधिता और कई रटून दे पाने की क्षमता एक बहुत ही ललचाने वाली परिस्थिती है। मगर इस के प्रयोग को सिर चढ़ाने के लिये दो मुख्य रुकावटों को दूर करना है। पहली रुकावट है की एस आफिशनेरम को जब इरिएंथस अरुंडिनेशियस से क्रास किया जाता है तब वह केवल एन गेमीट्स बनाना, बजाए की 2n गेमीट्स के जैसाकि एस. स्पान्टेनियम की नोबिलाइजेषन के दौरान देखा गया है। दूसरे अन्तर-जैनरिक संकरों में बांझपन का दिखाई देना जो प्रजनन के द्वारा आगे के विकास का रास्ता रोके हुए है।

इन दो मुसीबतों के पार पाने में सहायक हो सकने वाले एक नई विधि के विचार को इस संस्थान में कार्यान्वित किया जा रहा है। यह विचार है एस. स्पान्टेनियम स्पीसिस को एक पुल के रुप में एस आफिशनेरम और इरिएंथस अरुंडिनेशियस के बीच प्रयोग। इस वास्तविक्ता को पाने के लिये इ. अरुंडिनेशियस को नर और एस. स्पान्टेनियम को मादा, और इसके उल्ट भी, के रुप में प्रयोग कर क्रासिंग की गई है। इन अन्तर-जैनरिक सन्ततियों में एस. स्पान्टेनियम के जिनोम की उपस्थिति, विशेषकर तब जब इसे एक नर के रुप में एस. आफिशनेरम के साथ नोबिलाइजेशन के कार्यक्रम में प्रयोग किया जायेगा तब, से उम्मीद की जाती है की इन सन्ततियों में एस. आफिशनेरम के पूरे जिनोम को रखने की क्षमता होगी।

इ. अरुंडिनेशियस के प्रयोग में समस्यायें

इ. अरुंडिनेशियस के संग्रहण में भिन्नता की भारी कमी है। सत्तर के करीब स्वीकृतियों में से केवल थोड़े ही पुष्पण कर पाती हैं। दूसरे इनमें ऋतु की शुरुआत में पुश्पण होता है अतः इसका एस. आफिशनेरम या अन्य प्रजातियों के साथ समकालिक करना एक समस्या है। पराग कणों को इकðाकर कुछ सप्ताह के लिये भंडारन कर इस समस्या के एक हल के रुप में प्रयोग करने की कोशिश की जा रही है। सैल्फिंग या खुले परागन द्वारा देर से पुष्पण वाले पृथककरणों को प्राप्त करने की कोशिशें जारी हैं।

इ. अरुंडिनेशियस का मादा के रुप में प्रयोग: इ. अरुंडिनेशियस, एस. स्पान्टेनियम की तरंह एक अत्यंत स्वयं गर्भाधान वाली स्पीसिस है अतः जब इसे एक मादा के रुप में प्रयोग किया जाता है तब बहुत बड़ी संख्या में सैल्फस मिलते हैं। इस कार्य में मदद इस यर्थाथ से मिलती है की सैल्फस में ओस की गोद (डियू लैप) का न होना इनकी पहचान है जबकि अन्तर-जैनरिक संकरों में ओस की गोद पाई जाती है। अतः अंकुरण के एक सप्ताह के बाद ही अन्तर-जैनरिक संकरों को पहचान कर उन्हें अलग से आगे बढ़ाया जा सकता है।

इ. अरुंडिनेशियस का नर के रुप में प्रयोग:: इ. अरुंडिनेशियस में एन्थसिस का समय बहुत ही अनिश्चित है अतः पराग कणों का संग्रहण संकरण के लिये एक मुश्किल कार्य है। क्योंकि इ. अरुंडिनेशियस एन्थर्स बड़े ही छोटे हैं यह लगता है की सूर्य के निकलने के बाद जैसे नमी कम होती है, वह सैक्रम स्पीसिस में एन्थर्स के स्फुटन में तो मदद करती है, मगर यह हालात इ. अरुंडिनेशियस पर विषेश प्रभाव नहीं डालते हैं। इस समस्या से पार पाने के लिये संकरण से एक दिन पहले ही पुष्पगुच्छ को पेपर के लिफाफे से ढक दिया जाता है ताकि अगले दिन सुबह ही उन सब परागकणों को, जो रात भर गिरे हों, संकरण के समय इकðा कर लिया जा सके। इ. अरुंडिनेशियस के नर के रुप में संकरण में प्रयोग में एन्ड्रोजैनेसिस एक समस्या है जब सैक्रम स्पीसिस का एक मादा के रुप में प्रयोग किया जा रहा हो। इन क्रासिस से प्राप्त सन्ततियों को बीज जनित पौधों में से अन्तर जैनरिक पौधों को पहचानना एक आसान कार्य है क्योंकि जिनमें ओस की गोद नहीं होती उन्हें हटा दिया जाता है।

एस. स्पान्टेनियम में नोबिलाइज़ेशन

एस. स्पान्टेनियम (S.spontaneum) में नोबिलाइजेषन

गन्ना प्रजनन के कार्य में नोबिलाइज़ेशन सबसे महत्वपूर्ण है। गन्ना प्रजनन की गतिविधियों की नींव, एस. स्पान्टेनियम की एस. आफिशनेरम (S. officinarum) के साथ मादा के रुप में क्रासिंग कर, रखी गई और उसी के ऊपर उन्हें बढ़ाया जा रहा है। कोशिकानुवांशिकी की दृष्टि में एस. स्पान्टेनयम ने एस. आफिशनेरम में 2n गेमीट् के कार्यान्वन को प्रेरित किया, और इस प्रकार खेती किये जाने वाले एस. आफिशनेरम संकर इसके पूरे के पूरे जिनोम को रख पाये, जो आगे के विकास के लिये आवष्यक था। सस्य विज्ञान की दृष्टि से एस. स्पान्टेनियम ने उच्च जीव भार, हानिकारक जीवों व रोगों के विरुध प्रतिरोधिता और प्रतिकूल वातावरण घटकों को सहने की शक्ति प्रदान की। अतः एस. स्पान्टेनियम ने गन्ने के सुधार में बहुत ही प्रभावशाली भूमिका अदा की है। इरिएंथस अरुंडिनेशियस, जो जीनस् सैक्रम से सम्बंधित है वह नोबिलाइजेशन के लिये एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रत्याशि है। क्योंकि बांझपन और (2n + n) गुणसूत्रों का स्थानान्तरण का न हो पाना इ. अरुंडिनेशियस द्वारा नोबिलाइजेशन के रास्ते की समस्या है जिससे पार पाने के लिये एस. स्पान्टेनियम स्पासिस को एक पुल के रुप में प्रयोग की कोशिश की जा रही है और इस दिशा में शुरुआती परिणाम काफी उत्साह वर्धक हैं। वर्ष 2001 के दौरान बनाये गये इ. अरुंडिनेशियस X एस. स्पान्टेनियम के कई क्रासिस में से दो से 13 बीज जनित पौधों का संकर होना निश्चित पाया गया। वर्ष 2002 के दौरान इन बीज जनित पौधों में से 4 को बिना तना बनाये ही समाप्त देखा गया। बचे हुए 9 में से तीन स्वस्थ थे और उनमें पुष्पण देखा गया। बाकी 6 में कलोरोफिल के संशलेषण में भिन्न भिन्न स्तर का विकार पाया गया जिसके कारण वह बहुत ही कमज़ोर थे अतः इनमें से कोई भी पुष्पण तक नहीं पहुंच पाया। जिन तीन में पुष्पण हुआ उनमें पराग कणों का उच्च स्तर का निष्फल होना देखा गया। अतः यह साफ दिखाई देता है की संकरों की जीवन अक्षमता और परागकणों का निष्फल होना (जैसाकि बीज जनित स्पीसिस के बारे में स्टेविन्स, 1951 ने स्थापित किया) प्रजननीय रुकावटों का कार्य करती हैं।

आई.के. 76-92 ग एस.ई.एस. 286 के क्रास से प्राप्त 4 सन्ततियों की जड़ों के शिखरों को जांचा गया। अगर मानकर चला जाये कि (n + n) स्थानान्तरण हुआ तो उनमें 62 (30 + 32) गुणसूत्र नम्बर होना चाहिये जबकि वास्तव में 2n नम्बर उससे बहुत कम (50, 52, 54 और 58) जो इस बात की और इशारा करती है की इनमें गुणसूत्रों का समूहिक त्याग हुआ है।

यद्यपि शरीरिकी आकृति के आधार पर इन सन्ततियों का संकर होना बिना किसी शक शुबह के था फिर भी आणविक तकनीक को इनके संकर होने को निश्चित करने के लिये अपनाया गया। नौ जीवित सन्ततियों में से 5 को एस.टी.एम.एस. (सीकुएंस टैग्ड माइक्रोसैटेलाइटस साईटस) मारकर्स तकनीक द्वारा विशलेषित करने पर एस. स्पान्टेनियम के मारकर्स के पाये जाने ने इनके संकर होने को निश्चित कर दिया। तीन स्वस्थय सन्ततियों ने बीज जनित पौधों के रुप में पुष्पण पर 0% पराग कणों की फलदायक्ता देखी गई मगर इनके कलोनल जनन से प्राप्त पौधों से उत्पादित पराग कणों में 5 से 15% तक की फलदायक्ता देखी गई। इन संकर सन्ततियों को आगे क्रासिंग में प्रयुक्त किया गया। इस आपसी वर्ग में एस. स्पान्टेनियम X इ. अरुंडिनेशियस क्रासिस से प्राप्त अनेक सन्ततियां अत्यंत सशक्त थी और उनमें विलक्षण लिपटने वाली प्रकृति थी। इन सन्ततियों की संकर होने की बात बिना किसी षक के अभी साबित होनी शेष है। आगे के अनुसंधान इस बात को साबित करेगें की नई तकनीक से अन्तर-जैनरिक संकरों में अति आवश्यक पराग कणों की फलदायक्ता आ पाती है या नहीं। शुरुआती अध्यनों से यह पता चला है की यद्यपि इ. अरुंडिनेशियस X एस. स्पान्टेनियम से प्राप्त अन्तर-जैनरिक संकरों में पराग कणों की फलदायक्ता 20% से कम देखी गई मगर इन कृन्तकों को जब मादा के रुप में आगे के संकरण में प्रयोग किया गया तब इनसे वास्तविक संकर सन्ततियां प्राप्त हुई।

सन्दर्भ

References

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  8. Stevenson,G.C. 1965.Genetics and Breeding of Sugarcane.Longmans, London, pp.284.

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