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संकरण

पुष्पण

कोयम्बत्तूर में गन्ने में पुष्पण

कोयम्बत्तूर के प्राकृतिक हालातों में गन्ने में पुष्पण अक्तूबर से दिसम्बर तक नियमित रुप से होता है। नर पैतृकों के पुष्पगुच्छ की टहनियों को सुबह 5.00 से 5.30 बीच इकठ्ठा कर उनको थोड़े से उच्च तापमान और थोड़ी कम नमी पर रखकर एन्थर्स को खुले खेतों के प्राकृतिक हालातों में स्फुटन से पहले ही स्फुटन कराने में सहायता मिलती हैं। इनसे प्राप्त पराग कणों को इकठ्ठा कर मादा एैरोस पर 7-8 दिनों तक छिड़कते हैं जब तक की सब नन्हीं बालियां पूर्ण पुष्पण नहीं दिखाती। पिछले 8 वर्ष के बीज बनने के डाटा को विश्लेषित करने पर पता चलता है की जुलाई और अगस्त में बरसात होने से बीज बनना अधिक देखा गया। इसे देखते हुए पर्याप्त और समय पर पुष्पण के लिये प्रेरक प्रावस्था के दौरान खेतों में प्रयाप्त नमी को छिड़काव यन्त्रों द्वारा बनाये रखा जाता है।.

खेतों में क्रासिंग

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किसी क्रास के पैतृकों का फैसला करने के लिये पुष्पण का समकालिक होने के साथ साथ वह गुण जिन्हें हम संकरों में चाहते हैं। पैतृकों का नर या मादा वर्ग का होना उनके पराग कणों के जनन क्षमता पर निर्भर करता है। सधारणतयः 50% से अधिक पराग कणों की जनन क्षमता वाले पैतृक नर की तरंह और 30% से कम वाले मादा की तरंह प्रयोग किये जाते हैं। यदि वांछित क्रास के दोनो पैतृक नर जनन क्षमता वाले हों तब थोड़ी कम जनन क्षमता वाले को मादा पैतृक लिया जाता है। मादा एैरो को एक पराग कणों को न आने दे सकने वाले कपड़े के झोले से ढक दिया जाता है; एक अलुमीनियम के लैम्प के साथ जिसे खेत में खड़े किये गये बांस के डंडों की सहायता से लटकाया जाता है। झोले को ऊपर उठाया जाता है ताकि परागण किया जा सके और उसके बाद उसे एैरो के तल पर बांध दिया जाता है। परिपक्व बीजों को परागण के 25-30 दिन बाद इकठ्ठा कर भन्डारन से पहली उनकी नमी को घटाने के लिये सुखाया जाता है।

मारकोटिंग

मारकोटिंग

संरक्षित क्षेत्रों में क्रासिंग को नियंत्रित करने के लिये मार्कोटिंग की विधि को इस संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। इस तकनीक में उन प्रजातियों के गन्नों में जड़ों के नोडल क्षेत्रों से निकलने को प्रेरित किया जाता है जिसके लिये गन्ने की 2 से 3 नोड्स को रेत, सिल्ट और कार्बनिक पदार्थ के मिश्रण से एक उपयुक्त बर्तन में डालकर ढक दिया जाता है। उसके बाद गन्ने के मार्कोटेड हिस्से के नीचे वाले भाग को काट दिया जाता है और उन्हें गमलों में लगाकर उगने दिया जाता है ताकि बाद उन्हें क्रासिंग में प्रयोग किया जा सके। यद्यपि इस तकनीक को संस्थान में विकसित किया गया था मगर क्योंकि कोयम्बत्तूर के हालात में बेहतर बीज बनते हैं अतः इसे क्रासिंग के लिये आमतौर पर प्रयोग नहीं किया जाता। फिर भी इस विधि को उन स्थानों व देशों में जहां कई कारणों से खेत में क्रासिंग करना सम्भव नहीं होता, इस तकनीक को पूरे जोर शोर से प्रयोग किया जा रहा है।.

वास्तविक बीजों का मुल्यांकन

गन्ने के वास्तविक बीजों को सुखाने, रुँआओं को हटाने और श्रेणीकृत करने के लिये सुविधाओं को हाल ही में विकसित किया गया है। इन सुविधाओं से बीजों को एक आपेक्षित नमी के स्तर तक सुखाना, फूलों के कचरे और खाली एवं अपरिपक्व बीजों को हटाने में मदद मिलती है जिससे बैंचों पर बिजाई करने पर प्रति ग्राम बीज से अधिक से अधिक बीज जनित पौधे उपलब्ध हो सकें। बिजाई से पहले अंकुरण परीक्षण बैंचों पर पौधों की सही संख्या पाने में मदद करते हैं जिससे पौधों के बीच प्रतिद्वन्दता से पौधों के मरने को कम किया जा सकता है।

बीज जनित पौध मूल्यांकन

बीज जनित पौधों का मूल्यांकन

साफ और सूखे बीजों की प्रायः जनवरी के दौरान रेत, मृदा और घोड़े की लीद या प्रैस मड के मिश्रण से भरी क्यारियों में बिजाई की जाती है। पहले नर्सरी बैंचों को पालीथीन की चदर से ढका जाता था ताकि तापमान और नमी को बनाया रखा जा सके तथा उनकी नियमित रुप से सिंचाई की जाती थी ताकि अच्छा अंकुरण हो सके। आजकल पोलीकार्बोनेट से बने कक्षों में बिजाई की जा रही है जिसमें तापमान और नमी के नियंत्रक लगे हैं। Mist Chamber छः से आठ सप्ताह पुराने बीज जनित पौधों को एक पौधा प्रति पोलीबैग में बेहतर बचाव व वृद्धि के लिये स्थानान्तरित किया जाता है। पोलिथीन में बड़े हुए बीज जनित पौधों को खेत में 90 सैंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में पौधों को 60 सैंटीमीटर की दूरी पर खेत में रोपित किया जाता है। दस महीनों की उमर में पौधों को गन्ने/स्टूल, गन्नों की मोटाई व एच.आर ब्रिक्स के लिये जांचा जाता है। बीज जनित पौधों में से 25-30% को चुनकर आगे कृन्तक स्तर पर मूल्यांकन के लिये बढ़ाया जाता है।.

कृन्तक मूल्यांकन

चुने गये कृन्तकों को 6 मीटर लम्बी पक्तियों में चैक प्रजातियों के साथ उपयुक्त डिज़ाइनों में लगाया जाता है। गन्ने के उत्पादन और रस की गुणवत्ता के मापदंडों को 10 और 12 महीनों की अवस्था पर दर्ज किया गया। इन कृन्तकों में से 10-15% को चुनकर आगे के परीक्षण के लिये बड़े प्लाटों में रोपित किया जाता है। इन परीक्षणों में से बेहतर कृन्तकों को बहु स्थानीय परीक्षण के लिये आगे बढ़ाया जाता है और अन्त में सबसे अच्छे प्रजातियों के रुप में लोकार्पित किये जाते हैं। रोगों और हानिकारक जीवों के विरुद्ध प्रतिक्रिया के लिये उपयुक्त अवस्थाओं पर संस्थान के रोग और कीट विज्ञानिकों द्वारा तत्रस्थ स्थानों पर या बनावटी इन्आक्यूलेशन द्वारा परीक्षित किया गया है।

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