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गन्ने में फसल उत्पादन प्रणालियां

फसल उत्पादन सौर ऊर्जा को रसायनिक ऊर्जा में बदलकर एकत्रित करने का एक प्राकृतिक तरीका है। किसी खेत में फसल उत्पादन को उच्चतम सीमा तक लाने के लिये उसमें पत्तियों के अनुकूलतम क्षेत्रफल द्वारा सौर ऊर्जा के अधिकतर भाग को पूरे वर्ष भर पकड़ना आवश्यक है। किसी खेत में अकेली एक फसल के द्वारा यह सम्भव नहीं हो सकता क्योंकि उस फसल की पत्तियों का क्षेत्रफल फसल की शुरूआती और परिपक्वता की प्रवस्थाओं में अनुकूलतम से कम ही रहता है। इसके अतिरिक्त अकेली फसल को एक ही खेत में बार बार लेने से एक फसल की कटाई से दूसरी फसल के रोपण/उगने के बीच में काफी समय तक खेत खाली ही रहता है। अतः किसी खेत में वर्ष भर पत्ति क्षेत्रफल को अनुकूलतम के पास रखने के लिये हमें अकेली फसल की बजाये कई फसलों को उसी खेत में समयानुसार उगाकर रिकत्ता को भरने में सहायता करने की आवश्यक्ता होती है।

गन्ना एक लम्बी अवधि की, उच्च जीव भार उत्पादित करने वाली, फसल होने के कारण पोषक तत्वों की बड़ी मात्राओं को मृदा से निकाल ले जाता है। अतः गन्ने की फसल के बाद एक सफल उत्पादक्ता के लिये पौधे के पोषक तत्वों को बड़ी मात्रा में कार्बनिक और रसायनिक खादों के द्वारा पूरा किया जाना आवश्यक है। गन्ने की अकेली फसल को बार बार उसी खेत में लेने से भी कुछ तत्वों की अपुर्ति सम्भव नहीं हो पाती क्योंकि खादों के डालने के बावजूद भी पोषक तत्वों के डालने और निकलने के बीच तालमेल न हो सकने के कारण कुछ तत्वों की कमी हो ही जाती है। इस प्रकार के हालात फसल की वृद्धि को कम कर पत्तों के विकास में बाधक होते हैं जिससे सौर ऊर्जा को रसायनिक ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया में कमी आ जाती है। समय अनुसार फसलों को मिलाकर उगाने से प्राकृतिक संसाधनों व डाली गई सामग्रीयों का उचित प्रयोग कर अनुकूलतम पत्ति क्षेत्रफल के विकसित होने और बनाये रखने में सहायता मिलती है जिससे सौर ऊर्जा का अधिकतम प्रयोग कर फसल संवृद्धि सम्भव हो पाती है। अतः दीर्घकालिक कृषि के लिये हमें अपनी बदलती आवश्यक्ताओं के अनुसार संसाधनों का कृषि के लिये सफल प्रबंधन करना होगा और इस बात का भी ध्यान रखना होगा की हमारे वातावरण की गुणवत्ता बढ़े और प्राकृतिक संसाधन भी बचे रहें।

गन्ने की अकेली फसल को लगातार उगाने के कुप्रभावों को गन्ने के अनुक्रम में दूसरी फसलों को उगाने से काफी कम किया सकता है। सबसे पहले तो इससे प्राकृतिक संसाधनों व डाली गई सामग्रीयों का फसल उत्पादन में बेहतर प्रयोग सम्भव होगा क्योंकि अनुक्रमिक दूसरी फसलों को विभिन्न परिस्थितिकी हालात मिलते हैं और पोषक तत्वों के डालने और निकलने में अधिक तालमेल बना रहता है। किसी तत्व की एक फसल में डाली गई अधिक मात्रा आगे लगाई गई दूसरी फसल द्वारा सम्भवतः प्रयोग कर ली जाती है। इसी प्रकार कुछ तत्वों का एक फसल के दौरान अधिक निकल जाना अनुक्रम में आने वाली फसल में उर्वरकों की भारी मात्रा डालकर पूरा किया जा सकता है। क्योंकि अनुक्रमिक फसलों के उगाने से विविधता बढ़ती है अतः हानिकारक जीवों जैसेकि कीटों, रोगों और खरपतवारों की समस्या में भी कमी आती है। इन कारणों से अनुक्रमित फसलों की सामान्य वृद्धि की सम्भावना बढ़ जाती है क्योंकि इससे अनुकूलतम पत्ति क्षेत्रफल के विकसित होने और बनाये रखने में सहायता मिलती है जिससे सौर ऊर्जा का अधिकतम प्रयोग फसलों की वृद्धि में सहायक होता है।

उषणकटिबंधीय हालातों में गन्ने के अनुक्रम में उगाये जाने वाली उपयुक्त फसलों में धान, केला, हल्दी, मुंगफली, लोबिया, काली उड़द, मूंग, सोयबीन, ढैन्चा और पटसन इत्यादि हैं।

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