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फसल कटाई के बाद प्रबंधन

फसल कटाई के बाद प्रबंधन

कटाई के बाद रस की गुणवत्ता में गिरावट

गन्ने के तने में शर्करा का संग्रहण शर्करा के संस्लेषण और उपयोग के बाद हुई बचत को दर्शाता है। एक पूरी तरंह से परिपक्व फसल कटाई के कुछ दिन के बाद ही अपनी शर्करा को खो सकती है जिसको बढ़ाने में आसपास का उच्च तापमान, कटाई से पहले खेत में लगाई गई आग, कटाई और स्थानान्तरण में गन्ने को आई चोटों और सूक्ष्मजीवों का संक्रमण सहायक होते हैं। भारत में काफी चीनी मिलों में गन्ने की कटाई और मिल में इसकी पिड़ाई के दौरान शर्करा की मात्रा में गिरावट एक विकट समस्या है। गन्ने की कटाई के बाद 24 घंटे से अधिक बासी होने से इसके भार में काफी अधिक गिरावट इनकी नमी के स्तर में आई कमी के कारण देखी गई है जबकि शर्करा के विपर्यास (inversion) के कारण रस में इसके स्तर में कमी देखी गई है। गन्ने में 96 घंटे तक बासी होने से भारत के विभिन्न हिस्सों में गन्ने के भार में 7.4 से 17.0% की गिरावट एवं चीनी परता में 2.0% की कमी दर्ज की गई है। कटाई के बाद आई इन गिरावटों से किसानों को भार में आई कमी व मिल मालिकों को शर्करा में आई गिरावट के कारण चीनी परता में कमी से घाटा उठाना पड़ता है।

बासी गन्ने न केवल शर्करा की पुनःप्राप्ति में कमी लाते हैं बल्कि मिल और उबाल घर की क्षमता में आई कमी के कारण भी घाटे का कारण बनते हैं। इस कमी के कई कारण जिसमें मिल के शीरे में शर्करा की मात्रा में बढ़ोतरी एक है। गन्ने की कटाई के बाद ही इनमें इन्वर्टेस एन्जाइम क्रियाशील हो जाते हैं जिससे इनमें शर्करा का विपर्यास शर्करा के स्तर में आई कमी का कारण बनते हैं। एक दूसरी तरंह से आई कमी का कारण सूक्ष्मजीवों के संक्रमण, मुख्यतयः ल्यूकोनोस्टोक स्पीसिस, के कारण पाया गया है। यह सूक्ष्मजीव शर्करा को पोली सेकेराइडों, जैसेकि डैक्सट्रान, में बदल देते हैं। अतः शर्करा में कमी के साथ डैक्सट्रान की थोड़ी मात्रा में भी उपस्थिति निस्तरण, सफाई, रवें बनने और उनके आकार में आये बदलाव के कारण चीनी की गुणवत्ता और मिल की क्षमता प्रभावित होती है।

बासी गन्ने

बासी गन्ने की पेराई के कारण

गन्ना उत्पादक देशों में किसानों और चीनी मिलों के स्तर पर निमन्नलिखित अवरोधों में से कोई न कोई इसका कारण बनता है:

  1. प्रजातियों में उपयुक्त संतुलन की कमी के साथ गन्ने की परिपक्वत्ता के आधार पर विज्ञानिक कटाई का अभाव।
  2. पेराई के समय को बढ़ाकर गर्मियों के महीनों में ले जाना जब आसपास का तापमान 400सी से भी ऊपर चले जाना।
  3. किसान के खेत/गन्ना केन्द्रों से मिल तक गन्ने के पहुंचने में अत्याधिक देरी से और कुशल सम्पर्क नेटवर्क की कमी।
  4. मिल का बंद होना और अपने हाथों से बाहर के हालात, जैसे मज़दूरों की कमी और बिजली का चले जाना इत्यादि।
  5. बिना उपयुक्त और समय पर अपूर्ति व्यवस्था के जहां गन्ने की मशीन द्वारा कटाई के लिये फसल में आग लगाई गई हो।

घाटे का स्तर

कटाई के बाद घाटे की प्राकृति और स्तर

गन्ने में रस की गुणवत्ता और मिल की कार्यकुशलता पर चीनी परता निर्भर करती है। इसको 0.4 से 0.6% तक मिल की कार्यकुशलता से बढ़ाया जा सकता है और 1.5 से 2.0% तक गन्ने की उच्च गुणवत्ता से बढ़ाया जा सकता है। कटाई के बाद गिरावट के अध्यनों में कटे हुए गन्ने से सार्वधिक गिरावट तब दिखी जब 38-400सी पर 15% नमी में कमी देखी गई। गन्ने के भार में आती कमी फसल की परिपक्वता के स्तर और जलवायु के हालातों पर निर्भर करती है।.

कटाई के बाद गन्ने में आये बदलावों की प्राकृति:

  1. गन्ने से पानी का 1.5 से 2.0% तक वाष्पिकरण द्वारा उड़ना, प्रत्येक 24 घंटे में देखा गया, जो वातावरण के हालातों पर निर्भर करता है।
  2. विशेषकर विपर्यास के कारण कटाई के 48 घंटों के बाद प्रत्येक 24 घंटों में रस में शर्करा प्रतिशत 0.1 से 0.2 इकाईयां कम हो जाती है ।
  3. रस में अमल्ता का बढ़ना, गोंद और डैक्सट्रान का बनना - जो रस की संसाधन प्रक्रिया को बुरी तरंह से प्रभावित करते हैं।
  4. गन्ने की नमी में आई कमी से गन्ने में रेशे की मात्रा बढ़ने से रस के निष्कर्षण में समस्यायें आती हैं।
  5. शर्करा के विपर्यास से गलुकोस और फरक्टोस के बन जाने से रिडयूसिंग शूगर्स की मात्रा बढ़ जाती है।

जीव रसायनिक पहलू

कटाई के बाद शर्करा में आई कमी का जीव रसायनिक आधार

काटे हुए गन्नों में आई गिरावट मुख्यतया जीव विज्ञानिक संसाधना है जो प्रक्रिया गन्ने के कटे और क्षतिग्रस्त भागों से बैक्टीरियों के संक्रमण के कारण होती है। इन्वर्टेस एन्जाइम सबसे अधिक अपरिपक्व स्टाक भाग में होते हैं परन्तु वह स्टाक के परिपक्व भाग में भी पाये जाते हैं। अपरिपक्व गन्नों में एसिड इन्वर्टेस अत्याधिक्ता, पेराई के दौरान उच्च विपर्यास दरों के कारण, बहुत हानिकारक साबित होती है। कटाई के एकदम बाद अन्दरूनी इन्वर्टेस एन्जाइम क्रियाशील हो जाते हैं और वह गिरावट का कारण बनते हैं।

दूसरी तरंह की गिरावट, जिसे जैव-गिरावट के नाम से जाना जाता है, सूक्ष्मजीवों, मुख्यतयः ल्यूकोनोस्टोक स्पीसिस (Leuconostoc spp.)ए के द्वारा हाती देखी गई है। यह बैक्टीरिया मृदा से गन्ने के कटे भागों व क्षतिग्रस्त हिस्सों से अन्दर घुसते हैं। यह बैक्टीरिया एक घंटे के भीतर ही गन्ने के तने में 20 सेंटीमीटर तक चले जाते हैं व समय के साथ उनका बहुगुणन होता रहता है। इसके अलावा वह मिल के कोनों, नालियों में, नलियों वाले रास्तों में और मिश्रित रस के टैंक में बहुगुणित करते रहते हैं। यह सूक्ष्मजीव शर्करा को पोलिसैकराइड्स, जैसेकि डैक्स्ट्रान, में बदलते रहते हैं। अतः शर्करा में कमी के साथ डैक्सट्रान की थोड़ी मात्रा में भी उपस्थिति से निःस्यन्दन, सफाई, रवें बनने और उनके आकार में आये बदलाव के कारण चीनी की गुणवत्ता और मिल की क्षमता प्रभावित होती है।

सूक्ष्मजीव

सूक्ष्मजीवों का बासी गन्नों में कार्यकलाप

क) डैक्स्ट्रान्स का बनना व शर्करा में गिरावट:

डैक्स्ट्रान्स, जो गलुकोस की बहुइकाईयों (पोलीमर) वाले संयोजक हैं व जिनमें 60% 1,6 संबंध (linkages) हैं, और यह ल्यूकोनोस्टोक मिजेन्ट्रोआइडेस या डैक्स्ट्रेनिक्म द्वारा सीधेतौर पर उत्पादित किये जाते हैं। देखा गया है की पौधा फसल के मुकाबले पेड़ी की फसल के गन्नों में इनका प्रभाव अधिक होता है। अतः पेड़ी की फसल के बासी गन्ने पौधा फसल के मुकाबले मिल के कार्य में अधिक मुश्किलें पेश करते हैं। यह देखा गया है की गन्ने से शर्करा की गिरावट डैक्स्ट्रान्स बनने की मात्रा से 1.9 गुना अधिक होती है।

ख) डैक्स्ट्रान्स उत्पादन और चीनी संसाधन प्रक्रिया:

डैक्स्ट्रान्स के बनने के चीनी संसाधन प्रक्रिया व चीनी परता पर प्रभाव:
  1. अधिक रिडयूसिंग शूगरस का बनना और अधिक शुद्ध शीरे का बनना।
  2. घुलनशील पोलीसैकराइडस का मिल के रस में मिलना।
  3. अधिक कार्बनिक अम्लों के बनने से स्केलिंग की समस्या उत्पन्न होती है जिससे ताप के लेनदेन में कमी से रस से वाष्पिकरण धीमा हो जाता है अतः अधिक ऊर्जा की खपत होती है।
  4. रवों का धीमें बनना, रस की निमन्न दर्जे की सफाई और मट्टी का धीमी दर से नीचे बैठना।
  5. लम्बे नाकीले चीनी के रवों के बनने से इस चीनी का बिकना प्रभावित होता है।
  6. अधिक गोंदीले पन के कारण रस की घनता बढ़ जाती है जिससे इसकी गतिशीलता धीमी हो जाती है।

रस गुणवत्ता में गिरावट

गन्ने की गुणवत्ता में गिरावट के घटक

क) गन्ना प्रजाति:

गन्ने की प्रजाति चीनी परता में एक अहम भूमिका अदा करती है जो जलवायु और अपनाई गई प्रबंधन प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है । प्रजातियों में आनुवांशिक विभिन्नता के कारण गन्ने की कटाई के बाद गिरावट का स्तर भिन्न भिन्न रहता है। प्रजाति की आनुवांशिक प्रकृति के कारण उसके गन्ने के शरीरिक गुण, जैसेकि गन्ने की मोटाई, छिलड़ी का ठोसपन, मोम की पर्त का होना इत्यादि कटाई के बाद गिरावट को निश्चित करते हैं।.

ख) मौसम:

कटाई के बाद इसकी गुणवत्ता पर प्रभाव डालने वालों में मौसम ए़क महत्वपूर्ण घटक है, जिसके बहुत सारे साक्ष्य हैं। उच्च तापमान (400C के करीब) और निमन्न सापेक्ष नमी (25-35%) का रस की गुणवत्ता पर इनके नुकसानकारक प्रभाव का वर्णन, बहुत सारे कार्यकर्ताओं द्वारा, किया गया है। बहुत सारे पहले वाले कार्यकर्ताओं ने तापमान-नमी के सम्बंध को अनुमानित कर इसका गन्ने की गिरावट से जोड़ा गया और अनका यह समान्य सोच थी की अगर कटाई के बाद गन्ने को छाया में या गन्ना-अवशेषों से ढक कर रखा जाये तो इसमें खुले में रखे गन्ने से कम गिरावट होगी।

ग) फसल की परिपक्वत्ता:

कटाई के बाद गन्ने में गिरावट की दर गन्ने की परिपक्वता पर निर्भर करती है। अपरिपक्व व अधिक परिपक्व गन्नों में परिपक्व गन्नों से तीव्र गिरावट होती है। गर्म मौसम में गिरावट अपेक्षाकृत तेज़ गति से होती है।

दूसरे पहलू

कटाई के बाद प्रबंधन के दूसरे पहलू

क) हरे के मुकाबले जला गन्ना :

जले और बिना जले खेत से गन्ने भंडारण में अलग अलग तरंह से वर्ताव करते हैं। यंग (1963) ने देखा की खेत में आग लगाने के बाद यदि गन्ने को काट कर छोड़ दिया जाये तब इससे शर्करा में अधिक गिरावट आती है बजाये इसके जब इसे काटा न जाये।

ख) कटाई का तरीका :

भारत के अधिकतर हिस्सों में हरे गन्ने को हाथ से काटा जाता है और यहां खेतों में उससे पहले आग नहीं लगाई जाती। मगर दक्षिणी गुजरात में गन्ने के खेतों में कटाई से पहले आग लगाना, चीनी मिलों के द्वारा अपनाये गये उपायों की और ध्यान दिये बिना, एक समान्य कार्यप्रणाली है और 80% गन्ना जले खेतों से आता है, विशेषकर पेराई की अवधि के अन्त में। इसी तरंह से उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों से भी पेराई की अवधि में जले खेतो से गन्ना लाया जाता है, विशेषकर तब जब यह अत्याधिक मात्रा में उपलब्ध हो। बहुत अच्दी तरंह से व्यवस्थित मिलों में भी कटाई और मिल में पेराई के समय में आई देरी के कारण प्रयाप्त मात्रा में शर्करा की हानि होती देखी गई है। औसत के आधार पर भारत में गन्ना मिलों को, इस वजह से, प्रति टन गन्ना पेराई में 10 से 15 किलोग्राम चीनी की हानि बर्दाशत करनी पड़ती है। यह घाटे और भी बढ़ जाते हैं जब पेराई की अवधि को मई/जून या उससे भी बाद तक बढ़ा दिया जाता है। गन्ने की मशीनी कटाई और गन्नों के और टुकड़ों में काटे जाने ने समस्या और भी गम्भीर कर दिया है, विशेषकर डैक्सट्रान के बनने के कारण। मशीनी कटाई में यह समस्या गन्ने में अधिक टुकड़ों के होने से कटे हुए हिस्सों के क्षेत्रफल बढ़ने के कारण उपजती है। क्वींसलैंड (आस्ट्रेलिया) में टुकड़ों में कटाई वाले यन्त्र से कटाई करने से 6 से 11% की हानि देखी गई जबकि भंडारित किये गये पूरे गन्नों से केवल 1 से 2% की हानि देखी गई।

ग) गन्ने के ले जाने और भंडारण प्रणाली:

गन्ने की स्थानान्त्रण प्रणाली कटे गन्ने की गुणवत्ता को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला घटक है। स्थानान्त्रण की समयावधि, भंडारण के हालात, गन्ने की लदाई करने वाले यन्त्र के कारण क्षति का स्तर और माल डिब्बों की आकृति पर गन्ने की गुणवत्ता निर्भर करती है। ताज़े गन्नों को छोटे माल भंडारण डिब्बों में ले जाने से गुणवत्ता में कम गिरावट होती है। मिल में गन्ना रखने के स्थान की सफाई व स्वस्थय मिल की कार्य कुशलता का एक महत्वपूर्ण पहलू है और इस पर ध्यान दिया जाये की यहां सबसे पहले आये गन्ने को सबसे पहले पेराई में प्रयोग किया जाये।

घाटे को कम करना

बासी गन्नों से होने वाली हानि को कम करने की विधियां

  1. उन क्षेत्रों में, जहां गन्ने के स्थानान्तरण में देरी का पूर्वानुमान हो, वहां कटाई के बाद कम गिरावट दिखाने वाली प्रजातियों को उगाया जाना चाहिये।
  2. अपरिपक्व और अत्याधिक परिपक्व हालत में गन्ने को न काटा जाये।
  3. कटाई के बाद गिरावट के लिये संवेदनशील प्रजातियों को जल्दी से पेराई के लिये ले जाया जाये।
  4. गर्म वातावर्ण में कटे गन्ने को छाया में रखा जाये।
  5. गन्ने को अवशेषों से ढकें व उसपर बार बार पानी का छिड़काव करें ताकि गन्ने में नमी बरकरार रहे।
  6. शिखर कटे गन्नों में गिरावट तेज़ी से आती है बजाये उसके, जहां गन्ने केवल स्थल से ही काटे गये हों। अगर पेराई में देरी की सम्भावना हो तो गन्ने के शिखर को मत काटें।
  7. गन्ने के कटे भागों को जीवनाशियों, जैसेकि पोलीसाइड 100 मिलिलिटर/लिटर या बैक्ट्रिनोल 100 मिलिलिटर/ लिटर की दर से बनाये घोल में डुबोने तथा भंडारित गन्ने के ऊपर इसका छिड़काव करने से 120 घंटे तक गिरावट को रोका जा सकता है।
  8. पौधों पर कटाई से पहले पकाने वाले रसायनों, जैसेकि पोसैरिस, इथरल, सोडियम मेटासिलीकेट इत्यादि, के छिड़काव को कटाई के बाद आने वाली गिरावट को रोका जा सकता है। अध्यनों में पाया गया की गन्ने की कटाई से 3 दिन पहले 2% सोडियम मेटासिलीकेट के छिड़काव से कटाई के 6 दिन बाद तक रस की गुणवत्ता में कोई गिरावट नहीं देखी गई थी।
  9. कटाई से पहले मरक्यूरिक कलोराइड या कोबाल्ट कलोराइड 100 मिलिलिटर/ लिटर की दर से छिड़काव करने पर गन्ने में इन्वर्टेस एन्जाइम की क्रियाशीलता को अवरोधित कर भंडारण के 20 दिन तक रस की गुणवत्ता को बनाये रखा।
  10. देसाई और सहयोगियों ने 1985 में देखा की 100 पीपीएम बैन्ज़ोइक एसिड या फार्मैल्डीहाइड का कटे गन्नों पर छिड़काव करने से गिरावट की गति में धीमापन्न आ गया।
  11. कुल मिलाकर पेराई में कटाई के बाद समय को कम से कम करने व उपयुक्त जैव-नाशियों के प्रयोग से कटाई के बाद की शर्करा में आने वाली गिरावट और पेराई के दौरान पैदा होने वाली समस्याओं को कम किया जा सकता है।

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