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ऊर्जा फसल सद`ष्य

गन्ना एक ऊर्जा फसल सद`ष्य

गन्ना एक ऊर्जा फसल सद`ष्य

पिछले कुछ वर्षों में लोगों के जीवन स्तर में उत्थान के कारण उनकी ऊर्जा की खपत में बहुत अधिक बढ़ौतरी हुई है। विश्वभर में ऊर्जा की खपत में 2025 तक कई गुना बढ़ोतरी सम्भव है जिसका अधिकतर हिस्सा तेज़ी से विस्तार करती अर्थव्यवस्थाओं को जाता है। जीवावशेष ईंधनों, जैसेकि कोयला, तेल गौर प्राकृतिक गैस विश्व की ऊर्जा खपत का 86% इनसे आता है और इस रफतार से निकट भविष्य में यह सारे ईंधन समाप्त हो जायेंगे। अतः वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोतों के द्वारा ऊर्जा की उपलब्द्धता पर ध्यान देना ही केवल एक रास्ता हमारे लिये बचा है।

प्रकाश संश्लेषण हरे पौधों की वह प्रक्रिया है जिसमें सूर्य की प्रकाश ऊर्जा को रसायनिक ऊर्जा में बदला जाता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में हवा की कार्बन डाईआक्साइड और मृदा से आये पानी का प्रयोग शर्करा बनाने में किया जाता है जिसमें सूर्य की ऊर्जा रसायनिक बान्डस के रुप में भंडारित हो जाती है। पौधों को जब काटकर संसाधित किया जाता है तो रसायनिक बान्डस के रुप में भंडारित ऊर्जा को दूसरे रुपों में बदला जाता है। इन संसाधनों के प्रयोग करने पर ऊर्जा उत्पादन के साथ कार्बन डाईआक्साइड का उत्पादन तो होता है मगर यह वही कार्बन डाईआक्साइड है जो प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में हवा से लेकर पौधे में स्थिर कर दी गई थी। मगर पौधों की कटाई, स्थानान्तरण और संसाधित करने में अतिरिक्त कार्बन डाईआक्साइड का उत्पादन तो होता है।

वर्तमान में जैव ऊर्जा ही केवल एक वैकल्पिक और सशक्त ऊर्जा स्त्रोत है जिसे तरल ईंधनों के रुप में स्थानान्तरित किया जा सकता है। पौधों को एक खमीर उठाने वाले शर्करा के स्त्रोत के रुप में प्रयोग कर ईथेनाल और दूसरे कम आणविक भार वाली अल्कोहलों को उत्पादित किया जा सकता है। खमीर उठाने योग्य शर्कराओं को मीठी जवार, गन्ना या चुकन्दर या शकरकंदी या कलफ/स्टार्च (जिसे मक्का, जवार या गेहूं के दानों से प्राप्त) के जलीय-अपघटन या सैल्यूलोस और हैमिसैल्यूलोस, जो पौधों की कोशिकाओं की दिवारों में उपस्थित रहती हैं, के जलीय-अपघटन से प्राप्त किया जा सकता है।

इसकी क्षमता

गन्ने की ऊर्जा उत्पादन क्षमता

सभी फसलों में से गन्ने को, जो सूर्य ऊर्जा को निपुणता से जीवभार में बदलता है, विभिन्न कृषि उद्योगों को सहायता देने वालों में से एक महत्वपूर्ण फसल के रुप में स्थान दिया जाता है। गन्ने की खेती शर्करा उन्पादन के साथ साथ विभिन्न प्रकार के बहुमूल्य पदार्थों जैसेकि जानवरों का भोजन, बगास, ईथेनाॅल, पेपर और बिजली इत्यादि के लिये किया जाता है। गन्ना (सैक्रम स्पीसिस), एक सी.4 प्रकाश संस्लेषण वाला पौधा, एक ऊँचे कद वाली बहुवर्षीय घास है जिसकी खेती, विश्व के उपोषणकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में 80 से अधिक देशों में की जाती है, मुख्यतः इसकी तने में शर्करा को भंडारित करने की क्षमता के लिये की जाती है। विश्व की करीब 70% चीनी की आपूर्ति गन्ने से बनी चीनी द्वारा ही होती है। विश्व में गन्ना उन फसलों में से सबसे कुशल फसल है जो सूर्य की ऊर्जा को रसायनिक ऊर्जा में बदलती है जिसे एक ईंधन के स्त्रोत के रुप में प्रयोग किया जा सकता है। गन्ने की एक महत्वपूर्ण ऊर्जा फसल के रुप में पहचान को एक नई ऊँचाई उस वक्त मिली जब ब्राजील ने गन्ने से ईथेनाॅल उत्पादन को उच्च स्तर पर करना शुरु किया। क्योंकि गन्ने में सूर्य ऊर्जा को प्रयोग करने की क्षमता में अति सम्पन्न है अतः इसका ऊर्जा उत्पादन के लिये प्रयोग इसको गन्ने की कृषि में सम्भवतः एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने वाला है। इसे ध्यान में रखते हुए गन्ने के द्वारा ऊर्जा उत्पादन का मात्रा निर्धारण और विभिन्न प्रजातियों या जर्मप्लास्म के बीच इसमें अन्तर जांचना गन्ने का नवीकरणीय और दीर्घकालिक जैव-ऊर्जा फसल के रुप में व्यवसायिक उपयोग एक अति महत्वपूर्ण कार्य है।

फसलों द्वारा जीव भार का उत्पादन निर्भर करता है उनकी प्रकाश संस्लेषण प्रक्रिया की कुशलता पर। प्रकाश संस्लेषण प्रक्रिया की शुद्ध कुशलता सी.4 पौधों में सूर्य ऊर्जा को जैव भार में बदलना सैधान्तिक तौर पर 6-7% अनुमानित किया गया है जोकि सी.3 पौधों से काफी अधिक है। सी.4 पौधों को जो सी.3 पौधों के ऊपर लाभ है वो अक्षांश पर निर्भर करता है: वातावरण जितना अधिक उष्णकटिबंधीय उतना ही ज़्यादा लाभ। गन्ने की फसल कभी भी अपने सैधान्तिक सर्वोतम उत्पादक्ता को हासिल नहीं कर सकी क्योंकि फसल चक्र के शुरुआती समय में फसल छत्र का पूरा न हो पाना, फसल चक्र के अधिकतर हिस्से में अनुकूल्तम स्तरों से कम रोशनी और तापमान का होना, मृदा में अनुकूल्तम स्तरों से कम पोषक तत्व व पानी का स्तर और हानिकारक जीवों के कारण हानि इत्यादि कई कारण हो सकते हैं।

गन्ने का जीवभार ऊर्जा का एक मुख्य संसाधन हैं जिसे आजकल की तकनीकी बड़ी कुशलता से प्रयोग कर सकती है और भाग्य से गन्ने की बगास अधिक मात्रा में मिलने वाला जीव भार है। जब गन्नों को मिल में रस निकालने के लिये पीढ़ा जाता है तो बचा हुआ रेशेदार पदार्थ, जिसे बगास कहा जाता है, को बार बार पानी से धोकर पीढ़ा जाता है ताकि उसका सारा घुलनशील पदार्थ निकल जाये। इसके बाद मिल से निकला बगास करीब आधा पानी और आधा रेशों का बना होता है जिसे मिल की भट्टी में जलाने के काम में लाया जाता है या बाद में ईंधन के रुप में प्रयोग के लिये भंडारित किया जाता है। चीनी उत्पादन खेती की प्रक्रियाओं में से एक है जहां ऊर्जा का उत्पादन लागत से कम है। गन्ने में उपलब्द्ध ऊर्जा का केवल एक तिहाई हिस्सा, जो शर्करा के रुप में भंडारित रहता है, चीनी और ईथेनाॅल के उत्पादन में प्रभावी ढंग से प्रयोग किया जाता है। आने वाले समय में गन्ने की खेती, ऊर्जा-गन्ने के नये परिपेक्ष में, शाश्वत ऊर्जा को पैदा करने के लिये की जायेगी। क्योंकि गन्ने की खेती भारत में मुख्यतया उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होती है अतः यह महत्वपूर्ण है की गन्ने की फसल को चीनी के साथ साथ ऊर्जा उत्पादन के लिये भी देखा जाना चाहिये।

गन्ने की फसल एक ऊर्जा फसल के रुप में आशाजनक स्थान रखती है क्योंकि जीवभार की सर्वोतम उत्पादक्ता उष्णकटिबंधीय देशों में है। गन्ने की खेती ऊर्जा फसल के रुप में की जाने से गन्ना उत्पादन के साथ साथ चीनी का उत्पादन भी बढ़ जायेगा जिससे चीनी उद्योग में अधिक बगास और दूसरे गौण उत्पादों का स्तर भी बढ़ जायेगा। दीर्घावधि में जब सतह से ऊपर पोधे के सभी हिस्सों को काटकर उच्च.स्तर पर ऊर्जा उत्पादन किया जायेगा तब करीब 400 गीगाजूल/है0/वर्ष तक इसका पहुंचना अनुमानित है। इसके साथ गन्ने के रस में शर्करा% में वृद्धि ईथेनाॅल की उत्पादक्ता को अबके 90 लिटरस/टन गन्ना से 114 लिटरस/टन गन्ना पहुंचना 2030 तक सम्भव है।

निर्माणात्मक प्रावस्था

निर्माणात्मक प्रावस्था में ऊर्जा उत्पादन

शुरुआती परीक्षणें में ऊर्जा उत्पादन कलोरिफिक मूल्य के रुप में पत्ति, पत्ति की शीथ और तने में अलग अलग निर्माणात्मक, बृहत संवर्धन और परिपक्वता प्रवस्थाओं में चुनी गई प्रजातियों में जांचा गया। रस की गुणवत्ता को परिपक्वता के महीनों में मूल्यांकित किया गया।

Energy production at formative phase

को. 94008 में पत्ति और तनें का सूखा भार अबसे अधिक पाया गया अतः 4.32 किलो कैलोरी/मी.2 का कुल सूखा भार उत्पादन भी इस प्रजाति में सर्वाधिक था। पत्ति, शीथ और तने में औसत विभाजन क्रमशः 16.87, 9.31 और 73.82% स्पष्ट करता है की शाखाओं का अधिकतम सूखा पदार्थ तने में था। पत्ति की ऊर्जा उत्पादन क्षमता कम से कम को. 0314 में 2681 किलो कैलोरी/किलोग्राम से बढ़कर सार्वधिक को. 99004 में निर्माणात्मक प्रावस्था में 4025 किलो कैलोरी/किलोग्राम सूखा भार थी (चित्र 1)। को. 94008 में 3607 और को. 86032 में 3228 किलो कैलोरी/किलोग्राम दर्ज की गई। शीथ में कैलोरिफिक मूल्य को. 99004 में 2371 से सार्वधिक 86032 में 3805 किलो कैलोरी/किलोग्राम देखा गया। को. 99004 के तने में ऊर्जा की मात्रा सबसे अधिक 3488 किलो कैलोरी/किलोग्राम थी जिसके पीछे को. 86032 में यह क्षमता 3295 किलो कैलोरी/किलोग्राम थी।

बृहत और कटाई के समय

वृहत वृद्धि प्रावस्था और कटाई के समय ऊर्जा उत्पादन क्षमता

वृहत वृद्धि प्रावस्था में तने की ऊर्जा उत्पादन क्षमता को. 86032 को छोड़कर बाकी सभी में 4000 कैलोरी/किलोग्राम सूखा भार से अधिक दर्ज की गई (चित्र 2)।

Energy production at Grand growth phase

गन्ने की कटाई के समय पत्तियों में सबसे अधिक 4131 किलो कैलोरी/किलोग्राम ऊर्जा उत्पादन देखा गया जबकि तने में सार्वधिक ऊर्जा उत्पादन 4029 किलो कैलोरी/किलोग्राम को. 99004 में दर्ज किया गया। तने में को. 86032 ने 3856, को. 94008 ने 3825, को. 62175 ने 3840 और को. 0314 ने 3825 किलो कैलोरी/किलोग्राम ऊर्जा उत्पादन दिखाया। अतः आने वाले समय में ऊर्जा उत्पादन गन्ना कृषि में एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान पाने वाला है इसलिये ऊर्जा सम्पन्न गन्ने की प्रजातियों की पहचान और विकास पर अधिक ध्यान समय की मांग है। .

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