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गन्ना फसल उत्पादन बारे में आम पूछे गये प्रश्न

संवर्धन प्रक्रियाऐं

आम पूछे गये प्रश्न - संवर्धन प्रक्रियाऐं

  1. गन्ने के रोपण के लिये खेत की कितनी गहराई तक जुताई की जानी चाहिये?
  2. गन्ने की करीब 80% जड़ें 60 सेंटीमीटर की गहराई तक जाती हैं अतः गन्ने के खेतों की गहरी जुताई करना आवश्यक है। शुरुआत में एक या दो जुताइयां, कम से कम 30 सेंटीमीटर की गहराई तक, ट्रैक्टर द्वारा खींचे गये डिस्क पलो या मोल्ड बोर्ड पलो या जानवर द्वारा खींचे गये मोल्ड बोर्ड पलो की सहायता से की जानी चाहियें। इसके बाद हल्के कृषि जुताई यन्त्रों से जुताई की जानी चाहिये।.

  3. गन्ने की रोपाई के लिये उपयुक्त पंक्तियों की दूरी क्या है?
  4. गन्ने में उपयुक्त पंक्तियों की दूरी प्रजाति तथा मृदा की उर्वरता के स्तर पर निर्भर करती है। निमन्न स्तर की उर्वरता वाली भूमी में एक कम ब्याँत (tiller) उत्पन्न करने वाली प्रजाति के लिये 60 सेंटीमीटर वाली नज़दीकी पंक्तियों की दूरी अच्छी रहेगी जबकि इस प्रकार की भूमि में अत्याधिक ब्याँत उत्पन्न करने वाली प्रजाति के लिये 75 सेंटीमीटर वाली मध्यम दूरी आवश्यक है। उच्च उर्वरता वाली मृदाओं में अत्याधिक ब्याँत उत्पन्न करने वाली प्रजाति के लिये 90 सेंटीमीटर की दूरी अतिउत्तम है। यद्यपि मशीनीकृत खेती के लिये 150 सेंटीमीटर की अत्याधिक दूरी वाली रोपण पद्यति अपनाई जाती है अतः अत्याधिक ब्याँत उत्पन्न करने वाली प्रजातियों का चुनाव आवश्यक है।.

  5. गन्ने के रोपण के लिये बीज की गुणवत्ता कैसी हो?
  6. एक अच्छी रोपण समग्री को, रोग एवं हानिकारक जीव रहित, अक्षत कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों को, 6-8 महीने की पौधा फसल से काटकर, प्राप्त किया जाता है।

  7. गन्ने की व्यवसायिक खेती के लिये एक, दो या तीन कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों में से कौन से बेहतर हैं?
  8. एक कलिका वाले बीज टुकड़े सार्वधिक 90% के करीब अंकुरण करते पाये गये हैं। दो कलिकाओं वाले बीज टुकड़े 60% के करीब और तीन कलिकाओं वाले बीज टुकड़े रोपण करने पर और भी कम करीब 50% अंकुरण प्रदर्शित करते हैं। एक कलिका वाले बीज टुकड़ों से उत्पन्न हुए पौधे प्रतिकूल वातावरण को सहन करने में सक्षम नहीं होते जबकि 2 या 3 कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों से उत्पन्न हुए पौधे प्रतिकूल वातावरण को सहन कर सकते हैं। अतः दो कलिकाओं वाले बीज टुकड़े रोपाई के लिये बेहतर हैं।

  9. गन्ने में खरपतवार नियन्त्रण के लिये कौन से खरतपवारनाशी उपयुक्त हैं?
  10. गन्ने में फुटाव से पहले खरपतवारों के नियन्त्रण के लिये एट्राजि़न (2.0 किलोग्राम क्रियाशील तत्व/है0) और मेट्रिबुजि़न (1.0 किलोग्राम क्रियाशील तत्व/है0) उपयुक्त हैं। इनको रोपण के तीसरे दिन के करीब प्रयोग किया जाता है। चोड़े पत्तों वाले खरपतवारों के नियन्त्रण के लिये 2,4-डी (1.0 किलोग्राम क्रियाशील तत्व/है0) को तभी प्रयोग किया जाये जब यह गन्ने की फसल में तीव्रता से वृद्धि कर रहे हों।

और अधिक संवर्धन प्रक्रियाऐं

  1. गन्ने में रोपण की कौन सी विधि उत्तम है?
भारत के उषणकटिबंधीय क्षेत्र में रोपण की कई विधियों का प्रयोग किया जाता है।
  • पारम्परिक रोपण विधि: इसमें खाँचे और मेढ़ें 90 सेंटीमीटर की दूरी पर निकाली जाती हैं और सिंचाई खाँचों में की जाती है।
  • द्विपंक्ति रोपण विधि: इस विधि में पंक्तियों की जोड़ी की आपस में दूरी 60 सेंटीमीटर और जोड़ी की आपस में दूरी 120 सेंटीमीटर रखी जाती है। यह विधि टपक सिंचाई और अन्तः फसलों को लगाने के लिये उपयुक्त है।
  • चोढ़ी पंक्ति रोपण विधि: इस विधि में पंक्तियों की आपस में दूरी 150 सेंटीमीटर रखी जाती है मगर खाँचे इतने चोढ़े होते हैं की इनमें रोपण 30 सेंटीमीटर की दूरी पर दो पंक्तियों में की जाती है। इस विधि में गन्ने की मशीनीकृत खेती की जा सकती है और अन्तः फसलें भी ले सकते हैं।
  • खड्डे वाली रोपण विधि: इसमें 90 सेंटीमीटर व्यास के 45 सेंटीमीटर गहरे खड्डे 1.5 मीटर ग 1.5 मीटर की दूरी पर बनाये जाते हैं। हर खड्डे को करीब निकाली गई मिट्टी में आधी को खलिहान खाद के साथ मिलाकर वापिस डाल करीब 17 से 26 बीज टुकड़े एक साईकल के पहिये के अर्धव्यास ताढ़ीयों के समान रोपित किये जाते हैं।(FYM)
  • गहरी खाई (trench) में रोपण विधि: यह विधि शुरुआती सूखे और बाद में जलप्लावन वाले हालातों के लिये अति उपयुक्त है। इन खाईयों को 45 सेंटीमीटर गहरा और 60 सेंटीमीटर चोढ़ा बनाया जाता है। खाईयों के बीच की दूरी 180 सेंटीमीटर रखी जाती है। दो कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों को हर खाई में 30 सेंटीमीटर की दूरी पर दो पंक्तियों में रोपित किया जाता है।
  1. गन्ने के गिरने के क्या नुकसान हैं? गन्नों के गिरने को कैसे कम किया जा सकता है?
गन्नों का गिरना फसल की पत्तियों के प्रभावी क्षेत्रफल को कम कर प्रकाश संस्लेषण की कुल क्षमता को कम कर परिणाम स्वरूप गन्ना उत्पादन में कमी ला देते हैं। कभी कभी गिरे गन्ने टूटकर सूख जाते हैं और मिल में पिराई के काम नहीं आ पाते। न गिरने वाली प्रजातियों का प्रयोग, अधिक दूरी वाली पक्तियों में रोपण और काफी मिट्टी चढ़ाना, 8वें महीने में पुरानी पत्तियों को उतारना गन्ने की बंधाई करना जिससे फसल में गन्नों के गिरने को कम किया जा सकता है।

सिंचाई प्रबंधन

आम पूछे गये प्रश्न - सिंचाई प्रबंधन

  1. गन्ने की एक अच्छी फसल लेने के लिये कितनी सिंचाईयों की आवश्यक्ता होती है?
  2. उषणकटिबंधीय क्षेत्र में पहले 35 दिन तक हर 7वें दिन, 36-110 दिन के बयाँत उत्पत्ति प्रवस्था के दौरान हर 10वें दिन, 101-270 दिन के वृहत वृद्धि प्रवस्था के दौरान हर 7वें दिन और 271वें दिन से परिपक्वता प्रवस्था के दौरान हर 15वें दिन सिंचाई की जानी चाहिये। इन दिनों को वर्षा पड़ने के अनुसार अनुकूलित करना पड़ता है। करीब 30 से 40 सिंचाईयों की आवश्यक्ता रहती है।

  3. कम से कम पानी के साथ गन्ने की खेती कैसे की जा सकती है?
  4. गन्ना एक अधिक पानी की आवश्यक्ता वाली फसल है। एक टन गन्ने के उत्पादन के लिये 250 टन पानी की आवश्यक्ता होती है। वैसे तो बिना उत्पादन में कमी आये पानी की आवश्यक्ता को अपने आप में कम नहीं किया जा सकता मगर सिंचाई के पानी की आवश्यक्ता में कमी, पानी को इसके स्त्रोत से पाईप लाईन के द्वारा खेत जड़ क्षेत्र तक लाकर, रास्ते में होने वाले रिसाव के कारण नुकसान को रोक कर, या फिर सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपनाकर, लाई जा सकती है। जब पानी की कमी के हालात हों तब हर दूसरी खाँच में पानी से सिंचाई की जा सकती है और मल्च का प्रयोग कर पानी की आवशक्ता में कमी लाई जा सकती है। सूखे के हालात के दौरान 2.5% यूरिया और 2.5% म्यूरेट आफ पोटाश के घोल को पाक्षिक अन्तराल पर 3 से 4 बार स्परे कर उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

  5. टपक सिंचाई प्रणाली में अवरोधों को कैसे रोका जा सकता है?
  6. पानी के सही प्रयोग के लिये टपक सिंचाई व्यवस्था को ठीकठाक रखना अति आवश्यक है। इसके लिये समय समय पर पानी की नलियों के अंत के डक्कन खोलकर इनमें से पानी को तेज़ी से बहाकर साफ करें। टपक प्रणाली के अंदर की सतह पर जमें लवणों को हटाने के लिये 30% हाइड्रोकलोरिक एसिड को इन्जैक्ट करें। जब सिंचाई के पानी का स्त्रोत नदी, नहर या खुला कूआं इत्यादि हो तो बैक्टीरिया, एलगी, इत्यादि को मारने के लिये 1 पीपीएम बलीचिंग पाउडर से कलोरिनेशन करना चाहिये। एसिड उपचार और कलोरिनेशन करने की समयावधि पानी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।

पोषक तत्व प्रबंधन

आम पूछे गये प्रश्न - पोषक तत्व प्रबंधन

  1. गन्ने की फसल के लिये पोषक तत्वों की कितनी आवश्यक्ता होती है?
  2. गन्ने की 100 टन/है0 की फसल औसतन 208 किलोग्राम नेत्रजन, 53 किलोग्राम फास्फोरस, 280 किलोग्राम पोटाश, 30 किलोग्राम गंधक, 3.4 किलोग्राम लोहा, 1.2 किलोग्राम मैंगनीज़ और 0.6 किलोग्राम तांबे को मृदा से निकालती है। अतः मृदा की उर्वरता को बनाये रखने के लिये इन पोषक तत्वो की मृदा में पुनः पूर्ति करना आवश्यक है।.

  3. गन्ने के खेत में कार्बनिक और रसायनिक खादों की कितनी मात्राओं की आवश्यक्ता होती है?
  4. गन्ने के खेत में कार्बनिक और रसायनिक खादों की आपूर्ति सदा मृदा परीक्षण के आधार पर सिफारिश की गई मात्राओं द्वारा की जानी चाहिये। अगर आपके पास मृदा परीक्षण के आंकड़े उपलब्ध हैं तो आप केनइन्फो वैबसाइट (यदि आप इसके पंजीकृत सदस्य हैं) पर विधिवित लागइन कर इसकी “उर्वरता सलाहकारी सुविधा” का उपयोग कर सकते हैं। मृदा परीक्षण सिफारिशों के अभाव में आप 12.5 टन/है0 कार्बनिक खादों को खेत तैयार करते समय डालें। विभिन्न राज्यों की मृदाओं की उर्वरता स्तरों और गन्ना उत्पादन क्षमता के आधार पर इन राज्यों की खादों की सिफारिश की गई मात्रायें अलग अलग होती हैं। भारत के मुख्य राज्यों की गन्ने के लिये सिफरिशी उर्वरक मात्रायें इस संलगित तालिका में देखी जा सकती हैं।

  5. क्या कोई ऐसी विधि या तकनीक है जो साधारण है और जिसे मृदा परीक्षण के बाद गन्ने की फसल के लिये खादों की आवश्यक मात्राओं के आकलन के लिये (विशेषकर महाराष्ट्र के संदर्भ में) आसानी से प्रयोग किया जा सकता है
  6. इसका विस्तृत वर्णन इस प्रलेख में किया गया है।

  7. गन्ने में खादों को प्रयोग करने के समय क्या हैं?
  8. फास्फोरस की सारी मात्रा रोपण से पहले ही डाल दी जाती है जबकि नेत्रजन व पोटाश की मात्रा दो बराबर हिस्सों में बांटकर 45 और 90 दिन पर ऊपरी स्तह के रूप में प्रयुक्त की जाती है। खुले टैक्शचर वाली रेतीली मृदाओं और अगेती प्रजातियों के लिये नेत्रजन व पोटाश की मात्रा तीन बराबर हिस्सों में बांटकर 30, 60 और 90 दिन पर ऊपरी स्तह के रूप में प्रयुक्त की जाती है।.

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  1. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन से आपका क्या मतलब है?
  2. एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन में - उपयुक्त उत्पादन स्तरों को दीघ्रकालिक बनाने के लिये कार्बनिक, रसायनिक और जैविक खादों/संसाधनों का चत्तुर प्रयोग, मृदा के भौतिक व रसायनिक गुणों को बनाये रखना और फसल को ऐसा पोषण पैकेज दे सकना जो तकनीकी तौर पर सही हो, आर्थिक दृष्टि से समर्थ हो, प्रयोग में आसान और वातावरण के लिये सुरक्षित भी हो - कार्य शामिल हैं। एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पोषक तत्व चक्रीकरण के सभी पहलुओं - अपूर्ति, अवशोष्ण और वातावरण में लोप होने (जिससे कम से कम वातावरण दूषित हो) - को ध्यान में रखता है ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके।

  3. गन्ने में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की कार्य प्रणालियां क्या हैं?
    • लक्षित गन्ना उत्पादन को प्राप्त करने के लिये मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों की आवश्यक मात्राओं का अनुमान लगाना
    • मृदा परीक्षण के आधार पर खादों का प्रयोग करना और इस प्रकार देना ताकि जड़ें इन्हें आसानी से प्राप्त कर सकें, यूरिया का अमोनिया के रूप में वाष्पिकरण, भूक्षरण और पानी के साथ बहाव के कारण होने वाली हानि को न होने दे। इसके लिये उपयुक्त शरीरिक नियन्त्रकों जैसेकि भूमि को समतल बनाना और गुड़ाई कार्यों का प्रयोग किया जाना चाहिये
    • नेत्रजन के प्रयोग को इसके फसल द्वारा अवशोष्ण पैट्रन के साथ समकालिक बनाना, नमी उपलब्धत्ता बनाये रखना और निक्षालन व पानी के साथ बहाव के कारण होने वाली हानि को कम से कम करना
    • सुखे के हालातों में पोषक तत्वों को पत्तों पर स्परे करना और टपक प्रणाली द्वारा उर्वरकों का प्रयोग
    • पोषक तत्वों की पुनःप्राप्ति को बेहतर बनाने के लिये कार्बनिक खादों का प्रयोग, फसलों का आवर्तन, फसल प्रणाली में फलीदार फसलों के प्रयोग से जड़ों के विभिन्न पैट्रनों का उपयोग और नेत्रजन का स्थिरीकरण

सूक्षम पोषक तत्व

आम पूछे गये प्रश्न - सूक्षम पोषक तत्व

  1. गन्ने के खेती में सूक्ष्म पोषक तत्वों का क्या महत्व है?
  2. सूक्ष्म पोषक तत्व गन्ने के वर्धन और विकास के लिये काफी कम मात्रा में आवश्यक होते हैं। हरे पौधों के लिये अनिवार्य पोषक तत्व हैं लोहा, मैंगनीज़, तांबा, जिंक, बोरोन, मोलिब्डीनम और कलोरीन। अधिकतर सूक्ष्म पोषक तत्व जीवों के द्वारा उत्पादित एन्जाइमों और कोएन्जाइमों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं जो उनके विभिन्न कार्यकि प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिये आवश्यक हैं। जब इन तत्वों की उपलब्धता बहुत कम होती है तो पौधे इनकी कमी को विशिष्ट लक्ष्णों द्वारा दर्शाते हैं और पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। दूसरी तरफ अगर इनकी उपलब्धता अधिक हो जाती है और पौधों द्वारा अधिक अवशोषित होते हैं तब इनके पौधों में विषाक्ता के लक्ष्ण दिखाई देते हैं और उत्पादन में कमी हो जाती है। अतः पोषक तत्वों की उपलब्धत्ता को ठीक अनुपात में उपयुक्त स्तर पर बनाये रखना उच्चतम उत्पादक्ता को प्राप्त करने के लिये आवश्यक है। दूसरी फसलों की तरंह गन्ने की फसल के लिये भी सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की, इष्टतम वृद्धि और उत्पादन के लिये, आवश्यक्ता होती है। यह तत्व, गुणवत्ता वाले गन्नों के उत्पादन के लिये भी, महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। गन्ने की फसल उच्च जीव भार उत्पादक है अतः यह सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उच्च मात्रा को खेत से निकालकर ले जाती है। इसके अलावा आमतौर पर एक बार रोपित की गई गन्ने की फसल 3 वर्ष तक खेत में रहती है जिसके कारण सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण इसमें आमतौर पर देखे जाते हैं।

  3. गन्ने में लोहे की कमी के लक्षण क्या हैं?
  4. पूरी पत्ति में पीलापन्न आना, जिसके बाद हरी और पीली प्रत्यावर्ती धारियां, पत्ति की पूरी लम्बाई तक, विकसित होती दिखाई देने लगती हैं। इसे अंग्रेजी में इन्टरवीनल कलोरोसिस का नाम दिया जाता है। अंत में पूरी पत्ति पीली हो जाती है। इस कमी के लक्षण सर्वप्रथम नये पत्तों में दिखाई देते हैं क्योंकि लोहा पौधे के अन्दर पुनःप्रस्थान नहीं करता है। इसकी कमी का प्रभाव पेड़़ी और नवीन फसलों में अधिक दिखाई देता है। कलोरोसिस के कारण पौधे बौने रह जाते हैं और कभी कभी प्रभावित क्लम्प सूख जाते हैं।

  5. गन्ने में लोहे की कमी को कैसे दूर किया जा सकता है?
  6. लोहे की कमी को दूर करने के लिये, 1.0 से 2.5% फैरस सल्फेट को 0.1% साइट्रि़क एसिड के साथ मिलाकर तैयार घोल को हर सप्ताह तब तक स्परे करें, जब तक लक्षण खत्म न हो जायें। मृदा के आदर्श हालातों में 25-50 किलोग्राम फैरस सल्फेट से मृदा के उपचार की सिफारिश की जाती है। लोहे की कमी के कारण होने वाले कलोरोसिस को ठीक करने के लिये 2.5 टन कार्बनिक खाद/है0 में 125 किलोग्राम फैरस सल्फेट को मिलाकर प्रयोग करना अति उत्तम है। चूनेदार मृदाओं में जिप्सम/गंधक का प्रयोग और पानी की निकासी के साधन होने से लोहे की उपलब्धत्ता बढ़ जाती है।

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  1. गन्ने की कुछ प्रजातियां लोहे की कमी के लिये सहनशील हों?
  2. को. 8021, को. 86032, को. 86249, को. 88025, को. 94005 और को. 94012 लोहे की कमी के लिये सहनशील प्रजातियां हैं।

  3. गन्ने में मैंगनीज़ की कमी के लक्षण क्या हैं और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?
  4. कमी के लक्षण : फीकी और पीली हरि से सफेद, लम्बवत्त धारियां, पत्तियों पर दिखाई देती हैं। इन्टरवीनल कलोरोसिस पत्तों के मध्य और चोटी के हिस्सों में सीमित रहता है और कभी कभार ही पूरी पत्ते की पूरी लम्बाई तक पहुंचता है, जैसेकि लोहे की कमी के हालातों में प्रायः देखा जाता है।

    मैंगनीज़ की कमी को दूर करना : Tइसे 0.25-0.50% मैंगनस सल्फेट के घोल को हर सप्ताह तब तक स्परे करें जब तक लक्षण खत्म न हो जायें। मृदा में मैंगनीज़ की कमी को ठीक करने के लिये 2.5 टन कार्बनिक खाद/है0 में 25 किलोग्राम मैंगनस सल्फेट को मिलाकर प्रयोग करना अति उत्तम है।.

  5. गन्ने में जि़ंक की कमी के लक्षण क्या हैं और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है?
  6. जि़ंक की कमी के लक्षण :पत्तों में शिराओं के साथ साथ हल्की पीली रंग की धारियां बनती देखी जाती हैं, मगर यह लोहे और मैंगनीज़ की कमी जैसे इन्टरवीनल कलोरोसिस की तरंह के नहीं होती। आउक्सिन हारमोन की भारी कमी हो जाने के कारण पादप वृद्धि में कमी और पोरियों की लम्बाई में कमी विशिष्ट लक्षण हैं। पोरियों के छोटे हो जाने के कारण पत्तों का गुच्छा सा बन जाता है। वहीं शीर्ष के प्रभाव के खत्म होने के कारण बगल वाली कलिकाओं में फुटाव प्रारम्भ हो जाता है। पत्तों का आकार छोटा हो जाता है जिनमें विशेष पीली धारियां शिराओं के साथ पाई जाती हैं। अगर अतिअधिक कमी के हालात हों तो इन्टरवीनल कलोरोसिस भी देखा जा सकता है। .

    जि़ंक की कमी को कैसे ठीक किया जा सकता है : इसे 0.25-0.50% जि़ंक सल्फेट के घोल को हर सप्ताह तब तक स्परे करें, जब तक लक्षण खत्म न हो जायें। मृदा में मैंगनीज़ की कमी को ठीक करने के लिये 2.5 टन कार्बनिक खाद/है0 में 25 किलोग्राम जि़ंक सल्फेट को मिलाकर प्रयोग करना अति उत्तम है। चूनेदार व सोडिक मृदाओं में जिप्सम का प्रयोग, और पानी की निकासी के साधन होने से, कार्बोनेट और बाईकार्बोनेट आयनों की अधिकता को कम कर, जि़ंक सल्फेट के उपचार का प्रभाव बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है।

कार्बनिक खेती

आम पूछे गये प्रश्न - गन्ने की कार्बनिक खेती

  1. मृदा में कार्बनिक पदार्थों का क्या महत्व है?
  2. मृदा में कार्बनिक पदार्थ मृदा की बेहतर आकृति बनाने मददगार होते हैं और पानी तथा हवा के अति लाभदायक हालात उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं। यह पौधे के पोषक तत्वों का स्त्रोत हैं, जिसमें सूक्ष्म पोषक तत्व भी शामिल हैं, जो खनिज रूपान्त्रण के दौरान उपलब्ध रूप में स्वतंत्र हो जाते हैं। इनकी उपस्थिति से मृदा की जल धारण क्षमता, बफर और आयन अदान-प्रदान क्षमता और सूक्ष्म जीव गतिविधियों में वृद्धि हो जाती है। अतः मृदा कार्बनिक पदार्थ को मृदा उत्पादक्ता का अमृत समझा जाता है।

  3. क्या गन्ने की खेती को केवल कार्बनिक खादों के साथ किया जा सकता है?
  4. हां, यह सम्भव है, गन्ने की खेती को केवल कार्बनिक खादों के साथ किया जा सकता है। कार्बनिक खादों की मात्रा इतनी होनी चाहिये जिससे एक फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों की सिफारिश की गई मात्रा उपलब्ध हो सके। आमतौर पर यह मात्रा 50 टन/है0 से अधिक आवश्यक होगी मगर इतनी अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थों की उपलब्धत्ता और उनकी उच्च कीमत इसके अपनाये जाने के रास्ते का सबसे बड़ा अवरोधक है।

  5. गन्ने की खेती के लिये कौन्न से जैविक खादों की आवश्यक्ता है?
  6. गन्ने की फसल के लिये 10.0 किलोग्राम एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टर के साथ 10.0 किलोग्राम फासफोबैक्टीरिया प्रति है0 की मात्रा मिलाकर प्रयोग करने की सिफारिश की गई है। यह मात्रा दो बराबर हिस्सों में बांटकर दी जाती है। गन्ने के खेत में जब रसायनिक खादों को 45 और 90 दिनों पर देना होता है तब जैविक खादों, एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टर के साथ फासफोबैक्टीरिया, की आधी आधी मात्रा 30 और 60 दिनों पर दी जाती है। उन गन्ने के खेतों में, जहां रसानिक खाद तीन हिस्सों में 30, 60 और 90 दिन पर दी जाती है वहां जैविक खाद 45 और 75 दिनों पर दो बराबर हिस्सों में दी जाती है।

    जैविक खादों, एज़ोसपिरिल्लम या गलुकोनएसिटोबैक्टरफासफोबैक्टीरिया की आवश्यक मात्रा को 500 ग्राम खलिहान खाद के साथ अच्छी तरंह से मिलाकर गन्ने के पौधों के उदगम स्थलों के पास डालकर हल्कि मिट्टी चढ़ाकर सिंचाई कर दी जाती है। दूसरा विकल्प है जैविक खादों को पानी में मिलाकर पौधों के उदगम स्थलों के पास गीली मृदा के हालातों में डालना।

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  1. प्रैसमड में पोषक तत्व संघटकों की मात्रा क्या है?
  2. प्रैसमड में औसतन 20 से 24% कार्बनिक कार्बन, 1.26% नेत्रजन, 3.85% पी.2ओ.5, 1.46% के.2ओ.,11.0% कैलश्यिम आक्साईड, 1.6% मैगनीश्यिम, 0.23% गंधक, 2,000 पीपीएम लोहा, 898 पीपीएम मैंगनीज़़, 59 पीपीएम जि़ंक और 52 पीपीएम ताम्बा पाया जाता है।

  3. प्रैसमड और गन्ने के अवशेषों की तीव्र कम्पोस्टिंग के लिये किन सूक्ष्मजीवों का प्रयोग किया जाता है?
  4. प्रैसमड और गन्ने के अवशेषों की तीव्र कम्पोस्टिंग के लिये ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस का प्रयोग किया जाता है।

  5. गन्ने के अवशेषों से कम्पोस्ट कैसे तैयार की जाती है?
  6. गन्ने के अवशेषों के अपघटन के लिये गन्ना प्रजनन संस्थान ने एक तीव्र कम्पोस्टिंग प्रक्रिया विकसित की है। गन्ने के खेत के किनारों पर आसान लम्बाई चोढ़ाई के गड्ढे बनाये जाते हैं। गन्ने की पुरानी पत्तियों को उतारकर और गन्ना कटाई के समय पत्तियों और गन्ने के ऊपरी हिस्सों को गड्ढों में तहें बनाकर रख दिया जाता है। ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस के संवर्धनों की एक किलोग्राम मात्रा को 7.5 किलोग्राम यूरिया और 50-75 किलोग्राम गाय के ताज़े गोबर के साथ पानी में मिलाकर, प्रत्येक एक टन गन्ने के अवशेषों के हिसाब से, तहों पर डालते रहें। समय समय पर पानी डालते रहें ताकि उपयुक्त नमी बनी रहे। इस विधि से 10-12 सप्ताह में कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है। इस कम्पोस्टिंग प्रक्रिया को गड्ढों की बजाय ढेर लगाकर भी सम्पन्न किया जा सकता है। गन्ने के अवशेषों से तैयार कम्पोस्ट में 0.8% नेत्रजन, 0.25% फासफोरस और 0.7% पोटाश की मात्रा के साथ कार्बनःनेत्रजन का अनुपात 22:1 को पाया जाता है। गन्ने के अवशेषों को प्रैसमड के साथ मिलाकर भी कम्पोस्ट तैयार की जा सकती है।

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  1. प्रैसमड से कम्पोस्ट कैसे तैयार की जा सकती है?
  2. ताज़ी प्रैसमड को 3 मीटर लम्बाई, 1 मीटर चोढ़ाई व 15 सेंटीमीटर ऊँचाई तक फैलाया जाता है। ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस के संवर्धनों की एक किलोग्राम मात्रा को 7.5 किलोग्राम यूरिया और 50-75 किलोग्राम गाय के ताज़े गोबर के साथ पानी में मिलाकर इसे छिड़़का जाता है। फिर इसके ऊपर 30 सेंटीमीटर की मोटाई की तह जमाई जाती है और उस पर फिर जैविक संवर्धन मिश्रण को छिड़़का जाता है। इस प्रकार करीब एक मीटर मोटी परत तैयार की जाती है। सबसे ऊपर मिट्टी की परत जमाई जाती है जिसपर इतना पानी छिड़का जाता है ताकि मृदा 50% जल धारण क्षमता तक गीली हो जाये। नमी को कम्पोस्टिंग के दौरान बनाये रखा जाता है। अपघटन की यह प्रक्रिया 6 से 8 सप्ताह में पूरी हो जाती है। कम्पोस्ट की पोषक्ता को बढ़ानें के लिये इसमें राॅक फास्फेट, फैरस सल्फेट, जि़ंक सल्फेट, इत्यादि को मिलाया जा सकता है। प्रैसमड से बनी कम्पोस्ट गहरे रंग की होती है और इसकी कार्बनःनेत्रजन का अनुपात 12:1 का होता है। इसमें करीब 22.38% कार्बनिक कार्बन, 2.08% नेत्रजन, 3.63% पी.2ओ.5, 1.40% के.2ओ. की मात्रा पाई जाती है।

  3. वर्मीकम्पोस्ट कैसे बनाई जाती है?
  4. वर्मीकम्पोस्ट को खड्ढा विधि (5 मीटर x 4 मीटर x 0.5 मीटर) द्वारा भी तैयार किया जा सकता है। वर्मीकम्पोस्ट को फसलों व फार्म के अवशेषों, जैसेकि गन्ने के अवशेष, तूड़ी, प्रैसमड और गाय के गोबर, को प्रयोग कर बनाया जा सकता है। सूक्ष्मजीवों (ट्राइकोडर्मा विरिडी और प्लुटोरस), गाय के गोबर और यूरिया (जैसेकि प्रैसमड व गन्ने के अवशेषों की कम्पोस्टिंग के लिये ऊपर बताया गया है) का प्रयोग किसी हद कार्बनिक पदार्थों के अपघटन के लिये किया जाता है। इस थोड़े अपघटित पदार्थ में केंचुओं (Lambido marutii, Eudrilus eugeniae, Eisenia fetida and Perionyx excavatus) को 2,000/टन के हिसाब से छोड़ा जाता है और उस पर पानी को छिड़का जाता है। वर्मीकम्पोस्टिंग के लिये उपयुक्त तापमान और 40% से अधिक नमी बनाये रखना अतिआवश्यक है। वर्मीकम्पोस्ट के खड्ढे के ऊपर एक इंच मोटी मिट्टी की परत चढ़ा दी जाती है। यह कम्पोस्ट प्रयोग के लिये करीब 120 दिन में तैयार हो जाती है। दोबारा प्रयोग के लिये तैयार कम्पोस्ट से केंचुओं को अलग कर लिया जाता है। वर्मीकम्पोस्टिंग प्रक्रिया को गड्ढों की बजाय ढेर लगाकर भी सम्पन्न किया जा सकता है।

मृदाऐं

आम पूछे गये प्रश्न - मृदायें और उनका प्रबंधन

  1. गन्ने की खेती के लिये आदर्श मृदा किस प्रकार की होती है?
  2. गन्ना उत्पादन के लिये एक अच्छी पानी की निकासी वाली, जिसकी पीएच. प्रतिक्रिया 6.5 से 7.0 के बीच हो, जिसमें पोषक तत्वों की उपयुक्त मात्रा हो और बिना संघनन वाली मुदाऐं आदर्श हाती हैं। मृदा ढीली व भुरभरी, जिसमें कम से कम 45 सेंटीमीटर की गहराई तक हानिकारक लवण न हो और न ही उनमें पोषक तत्वों की कमी होनी चाहिये।

  3. गन्ने की खेती के लिये मृदा से किस प्रकार की अपेक्षायें होती हैं?
  4. मृदा के भौतिक गुणों पर खेती करने की तकनीक निर्भर करती है। दुम्मटी मृदाओं, जिनकी आकृति स्थिर कणों वाली हो, उनमें गन्ने की खेती के लिये तैयारी अपेक्षाकृत बहुत ही आसान होती है, क्योंकि इनमें खेत की तैयारी में केवल खाँचे और मेढ़ों को आवश्यक दूरी पर बनाने तक ही सीमित रहती है।

    चिकनी मिट्टी के कारण सख्त मृदाओं में खेत की तैयारी काफी उच्च स्तर की करनी पड़ती है; इसके लिये खाँचे और मेढ़ों को आवश्यक दूरी पर बनाने से पहले गहरी जुताई या रुखानी से कटाई करनी पड़ती है। गन्ने की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं और 5 मीटर से ऊपर दूरी तक पहुंचती हैं और इस प्रकार की गहरी मृदाओं में उग रही फसल में सूखे को सहने की काफी क्षमता रहती है। मृदा का स्थूल घनत्व 1.4 मिलीग्राम /मीटर3 और छिद्रिल्ता करीब 50% होना चाहिये जिससे अपनी धारण क्षमता के स्तर पर इसके छिद्रों में वायु और जल की मात्रा एक जैसे अनुपात में होगी। अगर मृदा का स्थूल घनत्व 1.5 मिलीग्राम /मीटर3 से अधिक होगा तो यह जड़ों के फैलाव में बाधक होने के कारण पौधों की वृद्धि में कमी का कारण बनता है।

    मृदा की ऊपरी स्तह में तीव्र गति से रिसाव और अन्दरूनी जल निकासी क्षमता होनी चाहिये ताकि वर्षा या सिंचाई जल एकदम से अवशोषित हो जाये और कोई अधिक मात्रा भी जल्दी से निकल भी जाये। आदर्श हालातों में भौम जल स्तर 1.5 से 2.0 मीटर से नीचे ही रहना चाहिये। ऊँचा भौम जल स्तर जल निकासी को प्रभावित करेगा जिससे अवायवीय (anaerobic) हालात बन जायेंगे जो जड़ों को बुरी तरंह से प्रभावित करेगा। गन्ने की फसल नमी को पसंद करती है मगर जल के रुकने को सह नहीं सकती। जब मृदा के हालात अनुकूल नहीं होते तब और भी अधिक तकनीकी मृदा प्रबंधन को अपनाने की आवश्यक्ता होती है। अतः गन्ने की फसल दानेदार और चिकनी मिट्टी वाली मृदाओं में उपयुक्त प्रबंधन प्रक्रियाओं को अपनाकर उगाई जा सकती है।

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  1. लवणता का गन्ने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
  2. लवणता के कारण फुटाव में कमी और देरी होने से वुद्धि में कमी, रिक्त स्थान, पिराई योग्य गन्नों और उत्पादन में कमी देखी जाती है। इससे जड़ों व नये पत्तों के शिखर और पुराने पत्तों के किनारों में जलने के लक्षण दिखाई देते हैं। अगर हालात बहुत ही बदतर हों तो शाखाओं का स्पिंडल जला हुआ सा दिखाई देता है। लवणता के कारण तने के बढ़ने, जड़ों के विकास और ब्याँतों के निकलने में कमी हो जाने से उत्पादन और रस की गुणवत्ता में गिरावट देखी जाती है। लवणताग्रस्त मृदाओं से काटे गये गन्ने मुरझाये और अन्दर से खोखलापन्न लिये होते हैं। आमतौर पर लवणताग्रस्त मृदाओं में फसल का प्रदर्शन खेत में निर्बल दिखाई देता है जिसमें बंजर रिक्त स्थान दिखाई देते हैं। कुछ संवेदनशील प्रजातियों में उत्पादन में 40% तक की गिरावट जबकि सहनशील प्रजातियों में यह गिरावट 20% से कम देखी जाती है। यद्यपि को. 95003, को. 93005, को. 97008, को. 85019, को. 99004 और को. 2001-13 को लवणता वाली मृदाओं में अच्छी प्रकार से उगता देखा गया है।

  3. लवणताग्रस्त मृदा को कैसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है
  4. लवणताग्रस्त मृदाओं से फालतू घुलनशील लवणों का निक्षालन (leaching) कर इन्हें कृषि योग्य बनाया जा सकता है। लवणताग्रस्त मृदाओं को कृषि योग्य बनाने के लिये खेत को समतल कर इसे करीब 1,000 मीटर2 के छोटे छोटे प्लाटों में मेंढ़े बनाकर बांट दिया जाता है। खेत के चारों और 75 सेंटीमीटर गहरी नालियां पानी की निकासी के लिये बनाई जाती हैं। इसके बाद खेत की सिंचाई, प्रचुर मात्रा में, अच्छी ग्रणवत्ता वाले पानी से की जाती है। खेत में पानी को 2 से 3 दिन तक खड़ा रखा जाता है ताकि मृदा में उपस्थित लवण घुल जायें। इसके बाद नालियों में से पानी को निकाल कर घुले हुए लवणों को खेत में से, कम से कम 75 सेंटीमीटर तक की गहराई तक, कम किया जाता है। इस निक्षालन प्रक्रिया को तब तक दोहराया जाता है जब तक की मृदा हानिकारक लवणों से स्वतन्त्र नहीं हो जाती। खेत में कार्बनिक पदार्थों को प्रचुर मात्रा में डालकर और गहरी जुताई करना, मिट्टी की निचली परतों को बारीक करना व पलटने जैसी मशीनीकृत उपचार प्रकियाऐं अपनाकर निक्षालन और जल निकासी को और भी बेहतर बनाया जा सकता है। गन्ने के खेत में से घुलनशील लवण निकालने के लिये हर 6टी से 10वीं पंक्ति को जल निकासी नाली के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिये।

  5. लवणता सहनशील कुछ प्रजातियों के नाम बतायें?
  6. को. 85019, को. 94012, को. 95003, को. 93005, को. 94008, को. 99004, को. 97008, को. 2000-10, को. 2001-13, को. 2001-15 और को. 97001 कुछ लवणता सहनशील प्रजातियां हैं।

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  1. लवणताग्रस्त मृदाओं में गन्ने की खेती के लिये किन्न प्रबंधन प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाना चाहिये?
  2. एक एकीकृत प्रबंधन प्रणाली, जिनमें निमन्नलिखित उपाय शामिल हैं, को अपनाया जाना चाहिये ताकि लवणताग्रस्त मृदाओं से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सके:-

    बीज टुकड़ों की मात्रा : सिफारिश की गई मात्रा से 25% अधिक प्रयोग करने से फुटाव में आने वाली कमी को पूरा कर फसल का अच्छा प्रदर्शन देखने को मिलता है।

    खाईयो में रोपण: लवणग्रस्त मृदाओं या जहां लवणीय जल से सिंचाई करनी पड़ती है वहां खाईयों में रोपण प्रणाली को अपना कर 15% बेहतर उत्पादन प्राप्त हुआ।

    कार्बनिक खादों का प्रयोग: कार्बनिक खादों यदा प्रैसमड 10-15 टन/है0 , खलिहान खाद 25 टन/है0, मृदा जीव, इत्यादि के प्रयोग से आवश्यक पोषक तत्वों (जि़ंक, लोहा, मैंगनीज, कैलशियम और मैगनीशियम) की उपलब्धता बेहतर हो जाती है। चूनेदार मृदाओं में कार्बनिक खादों से मृदा की पीएच. और विद्युत चालक्ता में कमी आ जाती है जिससे यह गन्ने की खेती के लिये बेहतर मृदाऐं बन जाती हैं।

    संशोधक: मृदा की पीएच. में वृद्धि से जिप्सम की आवश्यक्ता बढ़ जाती है मगर अधिकतर मृदाओं के लिये 3-6 टन /है0 जिप्सम काफी रहता है।

    अच्छी गुणवत्ता वाले जल से सिंचाई : पहले 150 दिनों की संवेदनशील अवधि में अच्छी गुणवत्ता वाले जल से सिंचाई करना लाभदायक रहता है।.

    हरि खाद : लवणताग्रस्त मृदाओं की उत्पादक्ता को बेहतर बनाने के लिये हरि खाद के रूप में प्रयोग होने वाली फसलों को अन्तः फसल के रूप में उगाकर उन्हें उसी स्थान पर मृदा में मिला दें।

    पोषक तत्व प्रबंधन : लवणीय हालातों में 25% अधिक नेत्रजन की मात्रा का प्रयोग बेहतर उत्पादन देता है। नेत्रजन और पोटाश को पौधों की जड़ों के पास खड्डों में देने से बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है।

    फसल चक्र: फसल चक्र में लवणता सहनशील फसलों का अपनाया जाना मृदा को बेहतर बनाने में सहयोग करता है।

    सहनशील प्रजातियां : लवणता सहनशील प्रजातियों को उगायें।

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  1. क्षारीय या सोडिक मृदाओं के लिये किन्न संशोधकों को प्रयोग किया जा सकता है?
  2. रसायनिक संशोधकों, जैसेकि जिप्सम, गंधक और माक्षिक (pyrite), के साथ प्रचुर मात्रा में कार्बनिक खादें, जैसेकि प्रैसमड या खलिहान खाद, मिलाकर देने से सोडियम मृदा के आयन अदान-प्रदान समूह से कैलशियम के द्वारा बदल दिया जाता है जिससे मृदा के भौतिक हालात बदल जाते हैं; इसके साथ ही मृदा से जल की समावेश गति तीव्र हो जाने से घुलनशील कार्बोनेटों व बाईकार्बोनेटों को सल्फेट से बदला जाना सम्भव हो पाता है। इस कार्य में जिप्सम सबसे सस्ता व प्रभावशाली रसायनिक संशोधक है। जिप्सम पौडर की सिफारिश की गई मात्रा (2.5 से 12.5 टन/है0 जो मृदा की पीएच., ई.एस.पी. और मृदा की बफर क्षमता पर निर्भर करती है) को खेत में बुरक कर अच्छी गुणवत्ता वाले जल से सिंचाई कर भरपूर जुताई की जाती है ताकि मृदा में इसकी प्रभावी प्रतिक्रिया हो सके।

  3. अम्लीय मृदाओं के लिये किन्न संशोधकों का प्रयोग किया जा सकता है?
  4. चूना या चूने के पत्थर का प्रयोग अम्लीय मृदाओं में संशोधन के लिये किया जा सकता है। डोलोमाईट (कैलशियम मैगनीशियम कार्बोनेट) का भी प्रयोग किया जा सकता है।

  5. गन्ना उत्पादन के लिये खेत की मृदा संघनन और सख्त पैन से कैसे पार पाया जा सकता है?
  6. घनी बुनावट वाली मृदाओं में मृदा संघनन और सख्त पैन से निमन्नलिखित विधियों से पार पाया जा सकता है:

    1. कार्बनिक खादों की अधिक मात्रा डालकर
    2. गहरी जुताई व कटाई से
    3. सभी जुताई/गुड़ाई के कार्य उचित नमी पर करने से

सूखा प्रबंधन

आम पूछे गये प्रश्न - सूखा प्रबंधन>

  1. सूखे के प्रभावों को दूसरे तनावों से भिन्न कैसे पहचाना जा सकता है?
  2. छोटी छोटी पोरियां, नीचे वाली पत्तियों का सूखना (पर ऊपर वाली पत्तियां या क्रौऊन नहीं) और ऊपर वाली पत्तियों का अन्दर की तरफ मुढ़ना सूखे के कुछ पहचाने जा सकने वाले लक्षण हैं।

  3. सूखे के गन्ना उत्पादन व शर्करा की मात्रा पर क्या प्रभाव हैं?
  4. सूखे का गन्ना उत्पादन पर शर्करा की मात्रा से अधिक प्रभाव देखा जाता है क्योंकि गन्ने की लम्बवत वृद्धि करीब 30% तक कम हो जाती है।

  5. किस प्रवस्था पर सूखे का प्रभाव सबसे घातक होता है?
  6. शुरुआती प्रवस्थाऐं, विशेषकर ब्याँत निकलने की अवधि सबसे अधिक हानिकारक होती है।

  7. खेत के हालातों में सूखे के प्रबंधन के कौन्न से आसान तरीके हैं?
  8. रोपण से पहले बीज टुकड़ों को 40% चूने से संतृप्त पानी में भिगोना, 2.5 किलोग्राम यूरिया और 2.5 किलोग्राम पोटाश का 100 लिटर पानी में घोल बनाकर 15-20 दिन के अन्तराल पर स्परे किया जाये और गन्ना अवशेषों का मल्च के रूप में प्रयोग प्रबंधन के कुछ आसान तरीके हैं।

  9. आजकल कौन्न सी सूखा सहनशील प्रजातियां उपलब्ध हैं?
  10. को. 86032, को. 88006, को.टी.एल 88322, को. 95014, को. 97008, को. 99004, को. 95003, को. 95006, को. 94012, को. 96009, को.जे.एन 86-600, वी.एस.आई. 9/20, को. 99012, को. 97001 और को. 96023 कुछ सूखा सहनशील प्रजातियां हैं।

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  1. शुरुआती सूखे व देर से आने वाले जलप्लावन के हालातों के लिये कौन्न सी रोपण प्रणाली गन्ना उत्पादन को बेहतर बना सकती है?
  2. शुरुआती सूखे व देर से आने वाले जलप्लावन के हालातों के लिये गहरी खाई प्रणाली से रोपण करने से गन्ना उत्पादन में वृद्धि हो सकती है। इन हालातों में गहरी खाईयों में 2.5 टन जिप्सम/है0 और 25 टन खलिहान खाद या 12.5 टन प्रैसमड/है0 डालने के बाद रोपण करने से समान्य रोपण विधि के मुकाबले बेहतर उत्पादन मिलता है। खाईओं की गहराई के अध्यन में पाया गया की 30 सेंटीमीटर गहरी खाईयों में रोपण से सार्वधिक उत्पादन प्राप्त हुआ और इससे 10,000 रुपये प्रति है0 की अतिरिक्त कमाई हुई। इस विधि से दो या उससे भी अधिक लाभदायक पेडि़यां ली जा सकती हैं जो समान्य प्रणाली से सम्भव नहीं है। उत्पादक्ता को 25% अधिक नेत्रजन की मात्रा डालकर और भी अधिक बढ़ाया जा सका।

  3. गन्ने में सूखे के प्रभाव को कम करने के लिये किन प्रबंधन प्रक्रियाओं को अपनाया जाना चाहिये?

  • रोपण को जल्दी करके सूखे के शुरूआत से पहले ही पौधों को काफी वृद्धि के लिये समय प्रदान कर पड़ने वाले सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • गन्ना अवशेषों का मल्च के रूप में प्रयोग मृदा की नमी को बनाये रखने में बहुत ही सक्षम प्रक्रिया है। इसके अलावा मल्च के प्रयोग से तापमान मध्यम दर्जे का रहता है, फुटाव बेहतर होता है, ब्याँतो की मरणशीलता में कमी आती है और खरपतवारों की वृद्धि में भी कमी आती है।
  • सूखे को सहने की क्षमता में वृद्धि बीज टुकड़ों को रोपण से पहले 1 घंटे के लिये चूने के संतृप्त घोल में डुबोकर पाई जा सकती है। चूने के संतृप्त घोल को 80 किलोग्राम भट्टी के बुझे चूने को 400 लिटर पानी में घोलकर बनाया जा सकता है। इस उपचार से बेहतर फुटाव के साथ ही पौधों में सूखे को सहने की क्षमता में भी वृद्धि देखी जाती है।
  • नदी-मुख भूमि के हालातों में शुरूआती सूखे व बाद में जलप्लावन एक आम समस्या है और गहरी खाईयों में रोपण अति लाभदायक होता है।
  • खाँच छोड़कर सिंचाई या हर दूसरी खाँच में सिंचाई करने से, जो खाँच सिंचाई प्रणाली में बदलाव हैं, उपलब्ध जल को प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
  • यूरिया 2.5 किलोग्राम को 2.5 किलोग्राम पोटाशियम कलोराईड के साथ मिलाकर 100 लिटर पानी में घोल को पत्तों पर हर 15-20 दिन के अन्तराल पर स्परे तब तक करें जबतक की हालात समान्य न हो जायें। इससे अधिक बलशाली शाखाओं को रखने में सहायता मिलती है।

जल प्लावन

आम पूछे गये प्रश्न - जल प्लावन

  1. जलप्लावन के हालातों में किन प्रबंधन प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाना चाहिये?

  • फालतु पानी की निकासी व खेत में से जल निकासी के लिये नालियों को बनायें।
  • अधिक नमी को कम करने के लिये जल्द रोपण।
  • बीज की अधिक मात्रा का प्रयोग ताकि अधिक गन्ने प्राप्त हो सकें।
  • मिट्टी चढ़ायें ताकि जड़ों का बेहतर विकास हो सके।
  • जलप्लावन सहनशील प्रजातियां जैसेकि को. 8231, को. 8232, को. 8145, को.एस.आई 86071, को.एस.आई 776, को. 8371, को. 9006, 93ऐ.4, 93ऐ.145 और 93ऐ.21 को उगायें।

पुष्पण नियन्त्रण

आम पूछे गये प्रश्न - खेती किये जा रहे गन्ने में पुष्पण का नियन्त्रण

  1. पुष्पण के गन्ना उत्पादन व रस की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ते हैं?
  2. गन्ने की फसल में पुष्पण होने से गन्ना उत्पादन व रस की गुणवत्ता पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि पुष्पण के बाद कटाई कब की जाती है। इसके अलावा चोटी की वृद्धि रुकने से गन्ने की कलिकाओं में फुटाव प्रारम्भ हो जाता है और गन्ने में खोखलापन्न बनना शुरु हो जाता है। अगर फसल को उषणकटिबंधीय क्षेत्र में मार्च के बाद काटा जाना है तो इसमें पुष्पण को रोकना अतिआवश्यक है।

  3. गन्ने में पुष्पण को कैसे रोका जा सकता है?
  4. पुष्पण को रोकने के लिये 500 पीपीएम ईथरल (100 मिलिलिटर /100 लिटर पानी /एकड़ की दर से) को जुलाई के दूसरे सप्ताह में फसल के ऊपर मिस्ट के रूप में प्रयोग करने से पुष्पण को पूरी तरंह से रोका जा सकता है। इसकी उच्च सान्द्रता का प्रयोग मत करें।

कटाई और गुणवत्ता

आम पूछे गये प्रश्न - गन्ने की कटाई व उसकी गुणवत्ता

  1. गन्ने में परिपक्वता से आप का क्या मतलब है?

गन्ने में परिपक्वता को आमतौर पर यह माना जाता है जब गन्ने के अन्दर रस में शर्करा का स्तर लाभदायकक होता है और अगर फसल वानस्पतिक से प्रजनन की प्रावस्था में भी चली जाये तो भी इसमें रस के स्तर में अन्तर न आये। इस प्रवस्था में स्टाक के अन्दर शर्करा का भंडारण प्रजनन प्रावस्था को सहायक होता है मगर इसका हरगिज़ भी यह मतलब नहीं के गन्ने में शर्करा का स्तर अधिकतम पहुंच गया है। अगर सधारण तरीके से कहा जाये तो परिपक्वता का मतलब अधिक शर्करा का भंडारण करना है। अगर गन्ने के रस की पोल 16% और शुद्धता 85% से अधिक है तो गन्ने की फसल को परिपक्व माना जाता है। कई घटक, जैसेकि मृदा की उर्वरता, डाले गये रसायनिक खादों की मात्रा व समय, सिंचाई के पानी की गुणवत्ता व मात्रा, हानिकारक जीवों व रोगों का आक्रमण /संक्रमण, प्रजाति और जलवायु के मापक गन्ने की परिपक्वता का फैसला करते हैं।

  1. गन्ने की परिपक्वता का फैसला कैसे किया जाता है?

छोटे स्तर पर परीक्षण : प्रयोगशाला में रस का विश्लेषण सपिंडल ब्रिक्स के लिये ब्रिक्स हाइड्रोमीटर और शर्करा और शुद्धता के लिये पोलेरिमीटर की मदद से किया जाता है। कम से कम 85% की शुद्धता गन्ने की कटाई के लिये आवशयक है।

गन्ने के शिखर/नीचे वाले हिस्से की ब्रिकस का अनुपात : जैसे जैसे स्टाक परिपक्व होता जाता है तो हम देखते हैं कि सबसे ऊपर वाली सूखी पत्ति वाली पोरी से एक छोड़कर गन्ने को दो हिस्सों में अगर बांटा जाये तो दोनों हिस्सों (जिसे टाप/बाटम अनुपात कहा जाता है) के रस की ब्रिक्स का अनुपात परिपक्वता के साथ इकाई की और अग्रसर होता जाता है।

  1. क्या हम कोई परिपक्वता लाने वाला रसायन गन्ने में भी अंगूरों की तरंह पुनःप्राप्ति लाने में सक्षम हो सकता है? क्या इस दिशा में भारत या बाहर के देश में कार्य हुआ है?

  • ईथेफोन या ईथरल और गलाईफोसेट या पोलेरिस, रसायनिक परिपक्वता लाने वालों, का प्रयोग कर अच्छे परिणाम प्राप्त हुऐ हैं। ईथेरल (200 पीपीएम को 270 और 300 दिनों पर) के स्परे से वानस्पतिक वृद्धि देखी गई और शर्करा की मात्रा में भी थोड़ी सी वृद्धि 0.4 - 0.7% देखी गई। गलाईफोसेट (200 पीपीएम को 270 और 300 दिनों पर) के स्परे से शर्करा में विशेषकर 1.0 - 1.2% तक की वृद्धि देखी गई मगर इसके साथ गन्ना उत्पादन में कुछ गिरावट भी देखी गई।
  • ईथरल को बिना किसी हानि के शर्करा में थोड़ी वृद्धि के लिये सफलता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि रसायनिक परिपक्वता लाने वाले प्रजाति और जलवायु विशिष्ट होते हैं।
  • अगर गन्ने की फसल को ऋतु की शुरुआत में ही काटा जाना है तो हम गलाईफोसेट का प्रयोग कर सकते हैं।

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  1. चीनी मिल में कटाई से पहले परिपक्वता के लिये सर्वेक्षण कैसे किया जाता है?

  • कटाई के सम्भावित समय से कम से कम 4-6 सप्ताह पहले परिपक्वता के लिये सर्वेक्षण प्रारम्भ किया जाना चाहिये।
  • पौधा व पेड़ी फसलों के लिये अलग अलग सर्वेक्षण करें।
  • खेतों को प्रजाति एवं रोपण के महीने के अनुसार वर्गीकृत करें।
  • एक मिल के सारे क्षेत्र को करीब 50-60 है0 के आसान क्षेत्रफल के कई वर्गों में बांटा जाना चाहिये।
  • हर वर्ग के लिये एक गन्ना सहायक के साथ दो क्षमिकों को नमूने लेने के लिये लगायें।
  • हर एक टीम आम तौर पर 20-25 वर्गों का कार्य एक दिन में पूरा कर लेगी जिस हिसाब से हर हफते 120-150 वर्गों का सर्वेक्षण कार्य एक टीम पूरा कर लेगी।
  • करीब 40 टीमें प्रत्येक फैक्टरी क्षेत्र 5,000-7,000 है0 को एक सप्ताह में पूरा कर लेंगी।
  • प्रत्येक खेत के प्रतिनिधि नमूनों की ब्रिक्स हैंड रिफरैक्ट्रोमीटर और रस निकालने वाले यन्त्र की मदद से निकाल कर दर्ज की जानी चाहिये।
  • इस प्रकार दर्ज किये गये डाटा के आधार पर प्रत्येक क्षेत्र में खेतों को ब्रिक्स मान के गिरते स्तर के आधार पर व्यवस्थित किया जाता है।
  • इसके बाद ब्रिक्स मान के गिरते स्तर के आधार पर गन्ने की कटाई के आदेश दिये जाने चाहियें। इस विधि से काटने के आदेशों के आधार पर एक जैसे परिपक्वता वाले गन्ने पिराई के लिये मिल पायेंगे जिससे मिल की चीनी पुनःप्राप्ति में 0.2-0.5% की बढ़ोतरी सम्भव हो पायेगी।

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  1. कटाई के बाद गन्ने को रस की गुणवत्ता में बिना किसी गिरावट के रखा जा सकता है?

एक परिपक्व फसल कटाई के कुछ दिनों के भीतर ही अपनी शर्करा को खोना प्रारम्भ कर सकती है जिसमें आसपास के उच्च तापमान, कटाई से पहले खेत को जलाना, कटाई-ढुलाई व स्थान्तरण के दौरान घाव और सूक्ष्म जीवों द्वारा संक्रमण के कारण और भी वृद्धि हो जाती है। यद्यपि 24 घंटे के अन्दर पिराई करने से कोई विशेष हानि नहीं होती। चैबीस घंटे से अधिक गन्ने को कटाई के बाद रखने से गन्ने के भार में नमी खोने के कारण काफी गिरावट देखी जाती है जबकि रस में शर्करा की मात्रा में गिरावट व्युत्क्रम (इन्वर्शन) के कारण देखी जाती है। इस प्रकार का रस चीनी बनाने की प्रक्रिया में समस्याऐं उत्पन्न करता है। गन्ने के समय के साथ अधिक बासी होने से घाटा बढ़ता चला जाता है।

  1. कौन्न सी प्रजातियां कटाई के बाद होने वाली गिरावट प्रतिरोधि हैं?

प्रजातियां को.सी. 671, को. 7314 और को. 775 में को.जे. 64, को.एस. 510, को. 7240, को.सी. 8001, को. 6907 और को. 62175 के मुकाबले कम गिरावट देखी गई है। कोयम्बत्तूर में किये गये अध्यनों में को.सी. 671 में को. 6304 से कटाई के बाद होने वाले व्युत्क्रमण के कारण होने वाली गिरावट में कमी देखी गई। को.सी. 671 को जब रोपण के 14-16 महीने बाद भी काटा गया हो तो भी इसमें कम व्युत्क्रमण और डैक्स्ट्रान का बनना देखा गया।

  1. गन्ने में कटाई के बाद आने वाली गिरावट को कैसे कम किया जा सकता है?

  • अपरिपक्व या अतिपरिपक्व फसल को न काटा जाये।
  • कटाई के बाद होने वाली गिरावट के लिये संवेदनशील प्रजातियों को बिना देर किये पेराई के लिये मिल में ले जायें।
  • गर्म मौसम में काटे हुए गन्नों को छाया में रखा जाये।
  • काटे गन्नों को गन्ने के अवशेषों से ढकें और उस पर समय समय पर पानी का छिड़काव करते रहें ताकि उनकी नमी बनी रहे। गन्ने के कटे सिरों को किसी न किसी जीवनाशी, जैसेकि पोलीसाईड 2 मिलिलिटर /लिटर की दर से बनाये घोल में डुबोयें या बैक्ट्रिनोल-100 के 100 पीपीएम घोल का स्परे भंडारित किये गये गन्नों पर करें। इस प्रकार रस की गुणवत्ता में होने वाली गिरावट को 120 घंटों तक रोका जा सकता है।
  • गन्ने के दोनो कटे सिरों को सक्रो-गार्ड में डुबोने से चीनी पुनःप्राप्ति को 0.9% तक बढ़ाया जा सकता है। गन्ने के प्रथम रस में 70% तक सूक्ष्म जीवों की जनसंख्या में कमी सम्भवता इसका कारण था।

रस की गुणवत्ता

आम पूछे गये प्रश्न - रस की गुणवत्ता

  1. गन्ने के रस की अतिउत्तम गुणवत्ता का सर्वोतम तरीका क्या है?

  • रस में शर्करा की उच्च्तम सान्द्रता पहुंच चुकी हो
  • गैर शर्कराओं की मात्रा का स्तर कम हो
  • रस की शुद्धता उच्च हो
  • गन्ने में रेशों की मात्रा उपयुक्त हो
  • रस निकाले जाने वाले गन्नों के साथ अनावश्यक पदार्थों (गन्ने के अवशेष, बांधने की समग्री, मृत व सूखे गन्ने, कीचड़, अपरिपक्व शाखाऐं, इत्यादि) की मात्रा न के बराबर हो
  • गन्ने में खोखलापन्न न हो
  • गन्ने में रस की मात्रा उच्चतर होनी चाहिये

  1. वह कौन्न से घटक हैं जो रस की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं?

घटक जैसेकि प्रजाति, पोषक तत्व प्रबंधन प्रक्रियाऐं, परिपक्वता की अवस्था, मृदा के हालात, पादप वृद्धि का वातावरण, कटाई का समय और विधि, कटाई के बाद गन्ने को मिल तक पहुंचाने की समयावधि, रोगों और हानिकारक जीवों का संक्रमण/आक्रमण, इत्यादि, का गन्ने के रस में शर्करा और गैर शर्कराओं के संग्रहण पर काफी अधिक प्रभाव देखा जाता है। मुख्य पोषक तत्वों में नेत्रजन न केवल गन्ने के उत्पादन को बल्कि रस की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। नेत्रजन का आमतौर पर 90-120 दिनों के बाद अधिक मात्रा में उपयोग रस में शर्करा की मात्रा को कम और गैर शर्कराओं की मात्रा को बढ़ाता है जिससे चीनी की पुनःप्राप्ति में कमी हो जाती है। ऊतको में नेत्रजन की अधिक मात्रा के कारण वानस्पतिक संवर्धन चलता रहता है जिससे परिपक्वता में देरी हो जाती है। इससे ब्याँतों के देर तक बनते रहने से अपरिपक्व शाखाओं में वृद्धि हो जाती है। इसके साथ ही शीथ में नमी बढ़ जाती है और रस में घुलनशील नेत्रजन रसायनों की मात्रा बढ़ जाती है। अतः कम शर्करा, उच्च रिडयूसिंग शर्कराओं की मात्रा और निमन्न शुद्धता जैसे प्रभाव अधिक नेत्रजन के कारण देखे जाते हैं। इसके साथ मिल में शीरे की मात्रा भी बढ़ जाती है। उषणकटिबंधीय हालातों में करीब 250-300 किलाग्राम नेत्रजन/है0 उपयोगी रहती है।

  1. मृदा वर्ग और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता गन्ने की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करते हैं?

लवणीय और क्षारीय मृदाओं में गन्ने में सोडियम व कलोराईड का उच्च मात्रा में संग्रहण होता है जिसके साथ कुल खनिजों की मात्रा बढ़ जाती है। सिंचाई के पानी की गुणवत्ता और मात्रा भी रस की गुणवत्ता को काफी प्रभावित करती है। गन्ने को नदी के पानी के साथ कूँऐं के पानी के मुकाबले उगाने से रस की बेहतर गुणवत्ता प्राप्त होती है। परिपक्वता की प्रावस्था में सिंचाई की अवधि को बढ़ाकर शीथ की नमी कम होने से रस में शर्करा की मात्रा बढ़ती देखी गई है।

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  1. गन्ने के रस में संघटकों की मात्रा किस प्रकार की होती है?

समान्य गन्ने में इसके संघटकों की मात्रा की सीमा इस प्रकार है:-

पानी: 75 - 88%
शर्करा: 10 - 21%
रिडयूसिंग शर्कराऐं: 0.3 - 3.0%
शर्कराओं के अलावा दूसरे कार्बनिक पदार्थ: 0.5 - 1.0%
अकार्बनिक संयोजक: 0.2 - 0.6%
नेत्रजन वाले संयोजक: 0.5 - 1.0%
  1. बोतल बंद गन्ने का रस कैसे तैयार किया जा सकता है?

  • उच्चतम गुणवत्ता वाले गन्ने के रस के लिये आप इस प्रकार की प्रजाति का चुनाव करें जिसके रस में शर्करा मात्रा उच्च हो, हल्के रंग का हो और रस में रेशे कम हों और गन्ने को परिपक्वता के शिखर पर काटें। इस कार्य के लिये को.सी. 671, को. 62175, को. 7717, को. 86032, को. 86249 और को. 94012 कुछ उपयुक्त प्रजातियां हैं
  • तीन किलोग्राम गन्ने के लिये एक नीम्बू और 2-3 ग्राम अदरक का रस मिलायें
  • गन्ने के रस को 60-700सी. पर 15 मिन्ट के लिये गर्म करें
  • गन्दगी को मसलिन वाले कपड़े से छानकर निकाल दें
  • गन्ने के रस को साफ व सुरक्षित करने के लिये 1 ग्राम सोडियम मैटाबाईसल्फाईट प्रति 8 लिटर रस के डालें
  • इस रस को गर्म पानी से जिवाणु रहित की गई बोतलों में भरकर कार्क लगाने वाली मशीन की सहायता से कार्क लगायें
  • बोतल बंद रस को 6 से 8 सप्ताह के लिये भंडारित किया जा सकता है
  • इस कार्य के लिये जिसमें 500 बोतलें प्रतिदिन संरक्षित किये जाने का लक्ष्य हो उसके लिये करीब 10,000 रुपये की लागत आती है जिसमें बोतलों की कीमत, स्टैनलैस स्टील के बर्तन, बिजली के हीटर, गर्म पानी का जिवाणु रहित करने वाला टैंक और कार्क लगाने वाली मशीन शामिल हैं। गन्ना पिराई का यन्त्र इसमें शामिल नहीं है।

गुड़ की गुणवत्ता

आम पूछे गये प्रश्न - गुड़ व उसकी गुणवत्ता

  1. गन्ने के गुड़ के संघटकों का ब्योरा दें?
गुड़ में करीब 60-85% शर्करा, 5-15% गुलुकोस और फरक्टोस होते हैं जिसके साथ 0.4% प्रोटीन, 0.1 ग्राम वसा, 0.6 से 1.0 ग्राम तक खनिज पदार्थ (8 मिलीग्राम कैलशियम, 4 मिलिग्राम फासफोरस और 11.4 मिलिग्राम लोहा) 100 ग्राम गुड़ में पाये जाते हैं। इसके अलावा विटामिनों और अमीनो एसिड्स भी नाम मात्र के पाये जाते हैं। सौ ग्राम गुड़ से 383 किलोकैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। आयुर्वेद में दवाईयां बनाने के लिये गुड़ को सर्वोतम मूल पदार्थ माना जाता है। इसके मुकाबले सफेद रवेदार चीनी में 99.5% शर्करा ही होती है जबकि खनिज पदार्थ बिलकुल भी नहीं होते।
  1. गुड़ बनाने के लिये रस को साफ करने के लिये कौन्न से निर्मलकारी प्रयोग में लाये जाते हैं??
निर्मलकारियों में निमन्नलिखित गुण आवश्यक हैं :-
  • शर्करा, रिडयूसिंग शर्कराओं, अकार्बनिक फासफेट, लोहा और कैलशियम और कार्बनिक उच्च प्रोटीन व वसा पदार्थों को छोड़कर सभी दूसरे पदार्थ हटा दे
  • अनुचित रंग को न बनने दे व उबालने तथा गाड़ा करने के दौरन शर्करा का व्युत्क्रमण रोके
  • बेहतर रवेदार गुड़ बनने में सहायता करे
  • अधिक गर्माहट व तले पर जलने से रोके
  • मनुष्य के स्वास्थय पर बुरा असर न पड़े और गुड़ का स्वाद भी अच्छा हो
  • गुड़ को लम्बे समय के लिये भंडारित किया जा सके
  • निर्मलकारी पदार्थ असानी से उपलब्ध हो
  1. कौन्न से वानस्पतिक मिर्मलकारी गुड़ बनाने के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं?
देओला और भिंडी के तने व जड़ें, फालसा और सेमुल के तने की हरी छाल, सुखलाई पौधों की सूखी छाल, कैस्टर, मुंगफली और सोयबीन के बीज गुड़ बनाने में निर्मलकारी के रूप में प्रयोग किये गये हैं। निर्मलकारी की मात्रा करीब 40-70 ग्राम प्रति 100 लिटर गन्ने के रस के अनुसार प्रयोग में लाई जाती है।

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  1. कौन्न से रसायनिक निर्मलकारी गुड़ बनाने के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं?

सोडियम हाईड्रोसल्फाईट, चूना, सोडियम कार्बोनेट, साजी 50% सोडियम कार्बोनेट, मीठा सोडा, 6.4% सोडियम सल्फेट, 4.5% नमक, सुपर फास्फेट और फटकड़ी कुछ निर्मलकारी गुड़ बनाने के लिये प्रयोग में लाये जाते हैं। इनमें से कुछ रसायनिक निर्मलकारी गुड़ बनाने के दौरान हानिकारक सल्फर डाईआक्साइड गैस उत्पन्न करते हैं और इनका गुड़ के स्वाद व भंडारण पर भी प्रभाव पड़ता है।

  1. 5. कौन्न सी प्रजातियां गुड़ बनाने के लिये अच्छी हैं?
  • आन्ध्र प्रदेश: को. 6907, को.टी. 8201, को. 8013, को. 62175, को. 7219, को. 8014, को.आर. 8001
  • बिहार: को.एस. 767, बी.ओ. 91, को. 1148
  • गुजरात: को.सी. 671, को. 7527, को. 6217, को. 8014, को. 740
  • हरियाणा: को. 7717, को. 1148, को. 1158, को.एस. 767
  • कर्नाटक: को. 7704, को. 62175, को. 8014, को. 8011, को.सी. 671, को. 86032
  • मध्य प्रदेश: को. 775, को. 7314, को. 6304, को. 62175
  • महाराष्ट्र: को. 775, को. 7219, को.सी. 671, को. 740, को. 7257, को. 86032
  • उड़ीसा: को. 7704, को. 7219, को. 62175, को. 6304
  • पंजाब: को.जे. 64, को. 1148, को.जे. 81
  • राजस्थान: 997, को. 419
  • तमिल नाडू: को.सी. 671, को. 62175, को. 7704, को. 6304, को. 8021, को. 86032, को.सी. 92061
  • उत्तर प्रदेश: को.एस. 687, को.जे. 64, को.1148, को.एस. 767, को.एस. 802, को.एस. 7918, को. 1158, को.एस. 8408, को.एस. 8432, बी.ओ. 91, को.एस. 8315, को.एस. 8016, को.एस. 8118, को.एस. 8119, बी.ओ. 19, को.एस. 837
  • पश्चिम बंगाल: को.जे. 64, को. 1148

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  1. गुड़ भंडारण की विधियां कौन्न सी हैं?

निमन्नलिखित विधियां उपयोग में लाई जा सकती हैं ताकि गुड़ की गुणवत्ता में ज्यादा गिरावट न आये :-

  • गुड़ को बड़ी मात्रा में भंडार गृह, जिसमें कैलशियम कलोराईड या चूने जैसे नमी सोखने वाले पदार्थ रखे हों, में भंडारित किया जा सकता है
  • गुड़ की तहों के बीच गन्ने के अवशेष, फलाई ऐश, पामीराह के पत्ते, चावल की भूसी, इत्यादि रखें
  • विशेषकर मानसून ऋतु के दौरान भंडार गृह में चावल की भूसी का धूआं करें
  • कम तापमान पर भंडारण करने से गुड़ की ताज़गी और सुगंध बनी रहती है तथा इसके शर्करा के स्तर में भी गिरावट नहीं होगी
  • गुड़ को टाट के बोरे, जिनके अन्दर काली पालीथीन की परत लगी हो, में भंडारित किया जा सकता है
  • गर्मीयों में गुड़ की नमी को छाया में सुखाकर 6% से कम लाकर इसे टाट के बोरे, जिनके अन्दर काली पालीथीन की परत लगी हो, में भंडारित करने से इसकी भंडारण की अवधि और उपयोगिती बढ़ जाती है
  • आम मिट्टी के बर्तन, जिन्हें बाहर अन्दर से पेंट किया गया हो, लकड़ी के डब्बे, पामिराह के पत्तों से बनी टोकरियों को घर में गुड़ को भंडारित करने के लिये प्रयोग किया जा सकता है
  1. गन्ने से बने गुड़ की ग्रेडिंग करने के लिये किन्न विशष्ट मानकों का प्रयोग किया जाता है?
क्रम संख्या गुण ग्रेड - 1 ग्रेड - 2
1. शर्करा % (न्यूनतम) 80 70
2. रिडयूसिंग शर्ककरायें % (अधिकतम) 10 20
3. नमी % (अधिकतम)% 5 7
4. पानी में अघुलनशील पदार्थ % (अधिकतम)% 1.5 2.0
5. सल्फेट वाली राख % (अधिकतम) 3.5 5.0
6. सल्फर डाईआक्साईड पीपीएम (अधिकतम) 50 50
7. गन्धक के हल्के अम्ल में अघुलनशील राख % (अधिकतम) 0.3 0.3

स्त्रोत: भारतीय मानक (आई.एस. 12923) – 1990

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  1. गुड़ बनाने की विधि क्या है?

आमतौर पर मार्किट में मिलने वाले गुड़ में हानिकारक रसायनों, जैसेकि सल्फर डाईआक्साईड, को अधिक मात्रा में पाया जाता है। गुड़ बनाने के लिये रसायनों के प्रयोग से स्वाद और भंडारण प्रभावित होते हैं। उच्च गुणवत्ता वाले गुड़ को बनाने के लिये पहले तो गन्ने की खेती को प्राकृतिक तौर पर कार्बनिक पदार्थों के प्रयोग से किया जाना चाहिये और उससे गुड़ बनाते समय कार्बनिक निर्मलकारियों का प्रयोग ही किया जाना चाहिये। देश में और निर्यात के लिये भी कार्बनिक विधि से उगाई गई फसल और गुड़ बनाने की मांग बढ़ती जा रही है। कार्बनिक गुड़ बनाने के लिये गन्ने की खेती उन मृदाओं में की जानी चाहिये जो पिछली फसल के रसायनिक खादों, खरपतवारनाशियों, पैस्टीसाईडों इत्यादि के अवशेषों से मुक्त हो। कार्बनिक खेती के लिये सभी सिफारिश की गई तकनीकों का प्रयोग किया जाये और पोषक तत्वों के लिये केवल कार्बनिक स्त्रोतों का ही प्रयोग किया जाये और खरपतवारनाशियों व पैस्टीसाईडों को बिलकुल भी प्रयोग न किया जाये। रोगों व हानिकारक जीवों के प्रबन्धन के लिये केवल जैव-नियन्त्रकों का ही प्रयोग किया जाये।.

  1. तरल गुड़ बनाने की विधि क्या है?

गुड़ बनाने की विधि के दौरान ही तरल गुड़ भी बनाया जा सकता है। इसमें पानी, शर्करायें और गैर शर्करायें शामिल हैं। इसमें गलुकोस व फरकटोस बराबर अनुपात में पाये जाते हैं जिनके साथ प्रोटीनों, कार्बनिक अम्लों और खनिजों का पाया जाना शामिल है। रस के निष्कर्षण के बाद पोटाश एलॅम के रवों को इसमें डाला जाता है। इससे रस में से ठोस पदार्थों को नीचे बैठ जाने में सहायता मिलती है। इस प्रकार साफ किये गये रस को कढ़ाहे में उबाला जाता है। करीब 50 ग्राम चूने को मिलाकर पीएच. को 6.0 तक लाया जाता है। जब तापमान 850सी. पहुंचता है तो भिंडी की गोंद को उालने के बाद पहली बार झागवाली मैल को हटाया जाता है। रसायनिक निर्मलकारीयों में फासफोरिक अम्ल और सुपर फासफेट का प्रयोग किया जा सकता है। उबालने को जारी रखा जाता है और दूसरी बार मैली को 980सी. पर हटाया जाता है। इस कार्य को पूरा करने का समय तब आता है जब तापमान 1060सी. पर पहुंच जाता है और इस अवस्था में कढ़ाहे को आग से उतार लिया जाता है और 0.04% साइट्रिक अम्ल मिला दिया जाता है। तरल गुड़ चीनी और गुड़ दोनो से मीठा होता है। पूरी तरंह शांत होने पर तरल गुड़ को साफ व हानिकारक जीवों रहित बोतलों में भरा जाता है। इन्हें 1-1.5 साल तक भंडारित किया जा सकता है। बेहतर भंडारण के लिये इसमें 0.1% साईट्रि़क अम्ल व 0.1% सोडियम मेटाबाईसल्फाईट मिलाना आवश्यक है।

और अधिक प्रश्न......

  1. मूल्यवर्धित गुड़ क्या होता है?

ठोस गुड़ के बनते समय उसमें पोषक पदार्थों, जैसेकि मुरमरे, चने, तिल तथा विभिन्न प्रकार के नट्स जैसेकि काजू, बदाम, विटामिनों, लोहा, स्वाद वर्धक चाकलेट पाउडर, को मिलाकर इस प्रकार के गुड़ की मांग बढ़ाई जा सकती है। मुरमरे, चने, तिल और मुंगफली को विभिन्न अनुपातों, 1:0.75, 1:1, 1:1.25, 1:1.5 और 1:1.75 में मिलाकर गुड़ पट्टियां बनाई जाती हैं जिससे पोषकता व स्वाद में वृद्धि होती है। गुड़-गेहूं के आटे और गुड़-बेसन निःस्त्रावित स्नैक्स गुड़ को आटे या बेसन के साथ 90:10, 80:20, 70:30, 60:40, 50:50 और 40:60 के अनुपात में मिलाकर बनाये जाते हैं। गुड़ को 10% कोको पाउडर के साथ मिलाकर जो उत्पाद बना वह चाकलेट की जगह पर लोगों को काफी पसंद आया। मूल्यवर्धित गुड़ गरीब व कुपोषित बच्चों के लिये पोषक आहार साबित होगा।

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