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आम पूछे गये प्रश्न - रोगों के बारे में

रोग के लक्षण

गन्ने के रोगों के लक्षण

विभिन्न प्रकार के रोग जनक, यथा कवॅक, बैक्टीरिया, विषाणु और फाइटोप्लास्मा, गन्ने में रोग पैदा करते हैं। देश भर से करीब 50 से अधिक रोग रिर्पोट किये गये हैं। भूतकाल में हमें विभिन्न रोगों की तीव्रता में आने के कारण बड़ी भारी हानि उठानी पड़ी है। अभी भी देश के विभिन्न भागों में गन्ने की खेती के लिये अलग अलग रोग एक भारी समस्या हैं। लाल सड़न रोग, कंडुआ रोग, विल्ट और बीज टुकड़ों का गलन रोग कुछ महत्वपूर्ण रोग हैं, जो विभिन्न राज्यों में गन्ना उत्पादन में हानि का कारण बनते हैं। विशिष्ट हालातों में फसल के लिये कवॅक, बैक्टीरिया, विषाणु और फाइटोप्लास्मा रोग का कारण बन सकते हैं। गन्ने के रोग जनक प्रणालीबद्ध ढंग से गन्ने को संक्रमित करते हैं और पिछले कुछ सालों में गन्ने के विभिन्न रोग जनकों का व्यवस्थापरक ढंग से उपनिवेशन प्रजातियों के स्तर में गिरावट का कारण बना है। गन्ने में वानस्पतिक जनन के कारण रोगजनक इससे उत्पादित नई फसल में आसानी से स्थानान्त्रित हो जाते हैं। क्योंकि गन्ने की फसल पूरा साल खेत में रहती है अतः इसलिये इसका एक या दूसरे रोगजनक से संक्रमित होने की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। यद्यपि गन्ने में रोगजनकों द्वारा कुछ समान्य लक्षण प्रदर्शित किये जाते हैं मगर निदान की विज्ञानिक पद्यति अपनाकर, इनके विशिष्ट लक्षणों द्वारा, इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। नीचे दिये गये अनुभागों में हम चीनी उद्योग से जुड़े कर्मचारियों और गन्ना किसानों के लिये रोगों को असानी से उनके लक्षणों द्वारा पहचाननें के बारे, विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से, जानकारी दी जा रही है, ताकि वह इन्हें फसल में देखते ही उपयुक्त प्रबंधन तकनीकी को अपना सकें।.

  • जब गन्ने के स्टाक या पत्ते रोग जनक (ों) से संक्रमित होते हैं तो पत्तों में पीलेपन्न का किसान द्वारा देखा जाना पहला लक्षण है।
  • अगर अंकुरित शाखाओं में पीलापन्न दिखाई दे तो यह बीज टुकड़ों का गलन रोग या लाल सड़न रोग के कारण हो सकता है।
  • बीज टुकड़ों के गलन रोग में, बीज टुकड़ों के गलने के साथ अन्दर वाले ऊतकों में लाल रंग का दिखना और सड़ते पाइनएप्पल से निकलने वाली दुर्गंध निकलती पाई जाती है। प्रभावित बीज टुकड़ों में कालापन्न भी देखा जा सकता है।
  • लाल सड़न रोग के कारण शाखाओं के पत्तों के चक्र में आघात दिखाई देते हैं और इनके बीज टुकड़ों से सड़ते पाइनएप्पल से निकलने वाली दुर्गंध निकलती नहीं पाई जाती है।

रोगों के लक्षण बारे में .....

रोगों के लक्षण बारे में और अधिक प्रश्न........

  • कंसूऐ के आक्रमण के कारण भी शाखाओं के पत्तों के चक्र में आघात के साथ डैड्हार्टस बनते पाये जाते हैं। इसमें क्षतिग्रसत पत्तों के चक्र को खींचने पर आसानी से बाहर आते देखा जाता है जो लाल सड़न रोग में नहीं देखा जाता।
  • गन्ना बनने व उससे बाद की प्रवस्था में, लाल सड़न रोग व विल्ट से ग्रस्त गन्ने के शिखर से 3-5 स्थान के पूरे पत्तों में पीले या संतरी रंग के धब्बे देखे जाते हैं, और उसके बाद उस गन्ने या पूरे कुन्ज (कलम्प) {रोग की तीव्रता अनुसार} के गन्नों के पत्तों में पीले या संतरी रंग के धब्बे बन जाते हैं। मगर इस रोग की असली पहचान तो गन्नों को फाड़कर ही निश्चित होती है की यह लाल सड़न है या विल्ट।
  • लाल सड़न रोग में गन्ने के भीतरी ऊतकों में लाली के साथ विशिष्ट सफेद धब्बे दिखाई देंगे जबकि
  • विल्ट में सफेद धब्बे नहीं दिखाई देंगे। इसके अलावा विल्ट के कारण गन्ने में खोखलापन्न पाया जाता है जिसके साथ कश्ति के आकार के गढ़े, जिनके साथ अन्दर वाले ऊतको में लाली वाले भूरे धब्बे देखे जाते हैं।
  • पीली पत्ति रोग समूह से प्रभावित पौधों में गन्ना बनने व उससे बाद की प्रवस्था में गन्ने के शिखर से 3-5 स्थान के पत्तों में मध्य शिराओं का पीला पड़ जाना देखा जाता है और पत्ते की चोटी से नीचे की तरफ मध्य शिरा के साथ साथ पत्ति का सूखना पाया जाता है। इसके अलावा पोरियों के छोटे रह जाने के कारण धीरे धीरे शिखर की तरफ पत्तों का गुच्छा बनता दिखाई देता है।
  • पत्ता जलन एक बैक्टीरिया संक्रमित रोग है जिसमें सफेदी लिये पीले या सफेद रंग के पेंसिल की लाईन जैसी लम्बाई में धारियां पूरी पत्ति में देखी जाती हैं। प्रायः यह धारियां मध्य शिरा के समान्तर होती हैं, जिसके बाद धब्बों वाले क्षेत्रों में सूखना देखा जाता है।
  • इन सभी रोगों में पत्तियों के किनारों का सूखना देखने को नहीं मिलता जबकि पादप कार्यकि में अव्यवस्था के कारण किनारों का सूखना देखा जाता है।
  • तीव्र पच्चीकारी रोग में पूरी पत्ति फीके पीले रंग की, जिसके साथ फीके या गहरे हरे रंग के उपद्वीप दिखाई देते हैं। आमतौर पर यह पत्ते धीरे धीरे सूखने लगते हैं। कभी कभी जड़ छेदक या दीमक के आक्रमण के कारण भी पूरे गन्ने का पत्तों के साथ सूखना देखा जाता है। जब इन गन्नों को उखाड़ा जाता है तब जड़ छेदक या दीमक के आक्रमण के कारण क्षति दिखती है

लाल सड़न रोग

आम पूछे गये प्रश्न - लाल सड़न रोग

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  1. फसल का किन्न प्रवस्थाओं पर लाल सड़न रोग की दिखाई देने की उम्मीद होती है ?
    • अंकुरण से लेकर कटाई तक हर प्रवस्था में रोग दिखाई दे सकता है।
  2. इस रोग के विशेष लक्षण क्या हैं ?
    • संतरी/पीला रंग पततों पर दिखाई देना जिसके बाद गन्ने सूखने लगते हैं। गन्ने का छिल्के पर पोरयों और गांठों पर न चमकने वाले भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं। गन्नों को लम्बवत दो हिस्सों में दो हिस्सों में फाड़ने से पोरयों के ऊतकों में विशिष्ट प्रकार की लाली के साथ बीच बीच में सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। बाद में पिथ के क्षेत्र में कवॅक धागों का संवर्धन दिखाई देता है।
  3. पत्तों पर किस प्रकार के लक्षण दिखाई दे सकते हैं ?
    • आमतौर पर संक्रमित गन्नों में पत्तों पर संतरी से पीले रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं। अति संवेदनशील प्रजातियों में मध्य शिरा में लाल भूरे रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं।
  4. यह रोगजनक उत्पादन को कैसे प्रभावित करता है ?
    • संक्रमित गन्नों के सूख जाने के कारण गन्ना उत्पादन प्रभावित होगा मगर गन्ने न सूखनें की स्थिति में रोग जनक के इन्वर्टेस एन्जाइम शर्करा को गलुकोस व फरकटोस में तोड़ देते हैं जिसके कारण चीनी पुनःप्राप्ति में कमी आ जाती है।.
  5. बीज गन्नों में रोगजनक की उपस्थिति की पहचान कैसे करें ?
    • कटाई के समय कटे सिरों पर संक्रमित गन्नों में लालिमा दिखाई दे सकती है और गांठों के क्षेत्र में परिगलित धब्बे दिख सकते हैं।.

लाल सड़न रोगt...

लाल सड़न रोगt बारे में और अधिक प्रश्न.......

  1. क्या इसके कारण पेड़ी में अधिक क्षति हो सकती है ?
    • हां, क्योकि रोग के संक्रमण के लिये शुरुआती इनाक्युलम की उच्च मात्रा उच्च होती है अतः पेड़ी की फसल में पौधा फसल से अधिक संक्रमण पाया जाता है। यद्यपि महामारी के हालातों में पौधा फसल में भी अधिक क्षति देखी गई है।.
  2. क्या रोग जनक मृदा में भी जि़न्दा रह पाता है ?
    • हां, यह कुछ समय तक मृदा में जि़न्दा रह सकता है मगर बचे हुऐ स्टब्बलों में रोग जनक कई महीनों तक जि़न्दा रह पाता है।.
  3. किस मौसम में रोग सबसे तेज़ी से फैलता है ?
    • मानसून ऋतु में रोग सबसे तेज़ी से फैलता है।
  4. कौन्न से घटक रोग की तीव्रता में सहायक होते हैं ?
    • मानसून के महीने में चक्रवाती हवायें रोग के तीव्र फैलाव में सहायक होती हैं। बाढ़ का पानी जब बहुत बड़े क्षेत्र में फैलता है तब इनाक्युलम एक से दूसरे खेत में पानी के साथ बहकर जा सकता है। बीज टुकड़ों द्वारा आया इनाक्युलम रोग जनक का फसल के अन्दर इकठ्ठा होने में सहायक हो सकता है।.
  5. कौन्न सी प्रजातियां लाल सड़न रोग प्रतिरोधि हैं ?
    • Co 86032, Co 86249, Co 93009, Co 94008, Co 97008, Co 99004 and Co 99006.

लाल सड़न रोगt....

लाल सड़न रोगt बारे में और अधिक प्रश्न.........

  1. क्या लाल सड़न रोग से संक्रमित फसल वाले खेत में फिर से गन्ना रोपित किया जा सकता है ?
    • नहीं, अगर लाल सड़न रोग खेत में देखा गया है तो संवेदनशील प्रजातियों का रोपण बिल्कुल मत करें। अगरप्रतिरोधि प्रजातियो उपलब्ध हैं तो उनमें से किसी की रोपाई की जा सकती है।
  2. रोग के प्रथम लक्षण दिखाई देने पर क्या करना चाहिये ?
    • इनाक्युलम का फैलाव रोकने के लिये संक्रमित कलम्प को उखाड़ कर उसी समय जला देना चाहिये। उखाड़े गये स्थान को 0.05% कार्बेंडाजि़म से अच्छी प्रकार भिगो दें ताकि इनाक्युलम का फैलाव न हो सके।
  3. कौन्न सा कवॅकनाशी रोग के लिये प्रभावी नियन्त्रक है ?
    • किसी भी कवॅकनाशी का स्परे प्रभावी नहीं होता क्योंकि कवॅक गन्ने के काफी भीतर स्थित है। बीज टुकड़ों को सर्वांगी कवॅकनाशी में डुबोकर लगाने से अंकुरण की प्रवस्था में रोग का मृदा इनाक्युलम द्वारा संक्रमण रोका जा सकता है।
  4. क्या हम लाल सड़न रोग संवेदनशील प्रजाति को, उपयुक्त पादप रोग प्रबन्धन विधियों को अपना कर, उगा सकते हैं ?
    • हां, इसे लाल सड़न रोग मुक्त क्षेत्र में उगाया जा सकता है। स्वच्छ बीज, खेत की स्वच्छता, रोग सर्वेक्षण और जल प्रबंन्धन की एकीकृत विधियों को अपनाकर इसे प्रभावी रूप से नियन्त्रित किया जा सकता है। महामारी के हालातों में संवेदनशील प्रजातियों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये।
  5. गन्ने की बीज नर्सरी उगाने में किन्न बातों का ध्यान रखना चाहिये ?
    • नर्सरी फसल को लाल सड़न रोग मुक्त क्षेत्रों में उगाया जाना चाहिये। लाल सड़न रोग संक्रमित फसल से रोपण के लिये बीज नहीं लिया जाना चाहिये। बीज के लिये प्रयोग की जानी वाली फसल को समय समय पर रोग के लिये निरीक्षित किया जाना चाहिये।

कंडुआ रोग

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  1. कंडुआ रोग के खेत में निदानिक लक्षण क्या होते हैं ?
    • संवर्धक शिखर क्षेत्र का चाबुक जैसी आकृति में परिवर्तन, जिसमें दस लाखों की संख्या में काले पाउडर जैसे बीजाणु उपस्थित रहते हैं, और जो पारभासी सफेद चांदी जैसी झिल्ली से ढके रहते हैं।.
  2. इसके लक्षण कब प्रकट होते हैं ?
    • सभी प्रवस्थाओं में रोग के लक्षण देखे जा सकते हैं। अधिक लक्षण गन्ने के बनने के दौरान देखे जाते हैं। पेड़ी में लक्षण बहुत पहले देखे जा सकते हैं। अति तीव्र संक्रमण के कारण पेड़ी में फुटाव के समय ही चाबुक का बनना देखा जा सकता है।
  3. कंडुआ रोग में चाबुक का बनना क्यों देखा जाता है ?
    • कंडुआ रोग कवॅक व्यवस्थित ढंग से गन्ने को संक्रमित कर शीर्ष मेरिस्टैम को भी संक्रमित करती है। शीर्ष मेरिस्टैम को संक्रमित कर कवॅक वृद्धि कर रही शाखा को चाबुक की तरंह की आकृति में परिवर्तित कर उसमें दस लाखों की संख्या में काले पाउडर जैसे बीजाणु, जो पारभासी सफेद चांदी जैसी झिल्ली से ढके रहते हैं, पैदा कर देते हैं।
  4. यह रोग कैसे फैलता है ?
    • प्रथम स्थानान्त्रण संक्रमित गन्ना बीज के टुकड़ों से होता है। खेत में चाबुकों के फटने से बीजाणु हवा के द्वारा एक से दूसरे गन्नें में स्थानान्त्रित होते हैं।
  5. प्रभावित गन्ने झाड़ीदार कैसे हो जाते हैं ?
    • मैरिस्टैम के संक्रमित होने से शीर्ष का प्रभुत्व खत्म हो जाता है जिससे बाजु वाली शाखायें वृद्धि के लिये प्रेरित हो जाती हैं और पौधे झाड़ीदार प्रदर्शन करते दिखते हैं।
  6. किन्न हालातों में कुडुआ रोग के कारण उत्पादन में अति अधिक हानि होती है ?
    • जब पेड़ी की फसल में शुरुआती अवस्था में ही कंडुआ रोग तीव्र रूप में आ जाता है तो उत्पादन में अति अधिक कमी आ जाती है।
  7. क्या गर्म रोगोपचार इस रोग के लिये कारगर है ?
    • हां, बीज टुकडों को कवॅकनाशी (ट्राईडाईमेफोन 0.1%) के घोल को 520सी. पर 30 मिन्ट तक उपचारित करने से बीज में से रोगजनक को खत्म किया जा सकता है।
  8. क्या प्रभावित फसल की पेड़ी ली जा सकती है ?
    • वह फसल जिसमें 2% से अधिक संक्रमण दिखाई दे उसकी पेड़ी फसल नहीं लेनी चाहिये।
  9. रोग के किस स्तर तक फसल के गन्नों को बीज के लिये प्रयोग किया जा सकता है ?
    • संक्रमण के 1% स्तर तक ही फसल के गन्नों को बीज के लिये प्रयोग किया जा सकता है।

विल्ट

आम पूछे गये प्रश्न - विल्ट

  1. विल्ट रेग के निदान के लक्षण क्या हैं ?
    • बाहरी- पौधे के पत्तों में धीरे धीरे पीलापन्न आना तथा गन्नों का सुकड़ना व मुर्झाना।
    • भीतरी - संक्रमित गन्नों के धरातल के ऊतकों में हल्के से गहरे लाली लिये भूरे धब्बे, खोखलापन और कश्ति के आकार के खड्डे, पोरियों के मध्य में, देखे जाते हैं।
  2. विल्ट रोग के लक्षणों को लाल सड़न रोग से कैसे भिन्न किया जा सकता है ?
    • लाल सड़न रोग में धरातल के ऊतकों में लाली के साथ विशिष्ट प्रकार के सफेद धब्बे देखे जाते हैं जो विल्ट में नहीं पाये जाते। दूसरी और विल्ट में गन्नों में खोखलेपन्न के साथ कश्ति के आकार के खड्डे और लाली लिये भूरे धब्बे देखे जाते हैं।
  3. क्या विल्ट और लाल सड़न रोग एक ही समय में गन्ने को संक्रमित कर सकते हैं ?
    • हां, इस प्रकार के गन्ने दोनों के लक्षण दिखाते हैं।
  4. विल्ट की तीव्रता कैसे बढ़ती है ?
    • गर्मियों मे सूखे का समय बढ़ते जाना और बाद में जलप्लावन का आ जाना। इसके अलावा जड़ों को क्षति, विशेषकर जड़ छेदक और दूसरे हानिकारक जीवों द्वारा, विल्ट की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।
  5. विल्ट रोग को कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • रोपण के लिये स्वस्थ बीज गन्ने, फसल चक्र, मृदा में उपयुक्त नमी बनाये रखना और जड़ छेदक संक्रमण को एकीकृत पद्यति द्वारा कम करने की सिफारिश की जाती है ताकि विल्ट को नियन्त्रित किया जा सके।

बीज टुकड़ों का गलन

आम पूछे गये प्रश्न - बीज टुकड़ों का गलन

  1. अंकुरण प्रवस्था बीज टुकड़ा गलन रोग के संक्रमण के लिये असुरक्षित क्यों है ?
    • मृदा में बचे हुए रोग जनक बीज टुकड़ों के ऊतको में कटे सिरों से घुसकर उन्हें गला देते हैं यदि बीज टुकड़ों को कवॅकनाशियों से संरक्षित न किया गया हो। गहरे रोपण या पानी के रुकने के कारण अगर अंकुरण में देरी होती है तो बीज टुकड़ों में रोगजनक के घुसने की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं।
  2. क्या बीज टुकड़ा गलन रोग के लिये कवॅकनाशी उपचार प्रभावी है ?
    • हां, बीज टुकड़ों को 0.5% कार्बिन्डाजि़म घोल में डुबोने से कवॅकनाशी इन्हें मृदा में बचे हुए रोगजनक से संरक्षित करता है।
  3. बीज टुकड़ा गलन रोग से कैसे बचा जा सकता है ?
    • मानसून ऋतु में गहरा रोपण न करें और अंकुरण की प्रवस्था में खेत में पानी को रुकने न दें। रोपण से पहले बीज टुकड़ों को कवॅकनाशी से उपचारित कर गलन रोग से बचा जा सकता है।

घसीय शाखा रोग

आम पूछे गये प्रश्न - घसीय शाखा रोग

  1. कौन्न सा रोगजनक घासीय शाखा रोग के लिये उत्तरदायी है ?
    • फाइटोप्लास्मा।.
  2. घासीय शाखा रोग के विशिष्ट लक्षण क्या हैं ?
    • अति अधिक ब्याँतों (tillers) का बनना, जो पतले, लंबे व हरिमाक्षयिता (chlorotic) वाले होते हैं। अगर गन्ने प्रभावित होते हैं तो वह छोटे रह जाते हैं और उनकी अक्षवत्तीय (axillary) कलिकाओं में फुटाव देखा जाता है।
  3. घासीय शाखा रोग के लक्षणों को दूसरे आमतौर पर पाये जाने वाले पोषक तत्वों की कमी के लक्षणों से भिन्न कैसे पहचाने ?
    • अति अधिक ब्याँतों का बनना जिसके साथ किसी हद तक या पूरी तरंह से हरिमाक्षयिता पत्ते घासीय शाखा रोग में देखे जाते हैं। दूसरी और पोषक तत्वों की कमी के कारण अति अधिक ब्याँतों का बनना नहीं देखा जाता। इसके अलावा केवल घासीय शाखा रोग में प्रभावित गन्नों में अक्षवत्तीय कलिकाओं में ही फुटाव देखा जाता है। लोहे की कमी के कारण हुई हरिमाक्षयिता के लक्षण फैरस सल्फेट के स्परे से खत्म हो जाते हैं मगर घासीय शाखा रोग के कारण हुई हरिमाक्षयिता के लक्षण स्परे से दूर नहीं होते। इसके अलावा घासीय शाखा रोग केवल अलग अलग शाखा समूहों में दिखाई देता है जबकि पोषक तत्वों की कमी के कारण हरिमाक्षयिता के लक्षण खेत में टुकड़ों में दिखाई देते हैं।
  4. घासीय शाखा रोग पेड़ी में क्यों अधिक तीव्र दिखाई देता है ?
    • रोगजनक की पौधा फसल में शुरुआती कम मात्रा के कारण इसमें कम हानि होती है जबकि इस फसल से पेड़ी की फसल लेने से स्टब्बलस में जो रोगजनक उपस्थित रहता है वह नई निकलती शाखाओं को प्रभावित करना प्रारम्भ कर देता है अतः इन शाखा समूहों से पेराई योग्य गन्नों का बनना सम्भव नहीं होता।
  5. घासीय शाखा रोग का रोग जनक कैसे फैलता है ?
    • संक्रमित गन्ने के बीज टुकड़े रोगजनक का प्रथम स्त्रोत का काम करते हैं और कीट वैक्टर रोगजनक को खेत में एक गन्ने से दूसरे में फैलने में सहायक होते हैं।
  6. क्या घासीय शाखा रोग को तापमान उपचार द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • हां, घासीय शाखा रोगजनक को वातित भाप उपचार से बीज गन्ने के टुकड़ों से खत्म किया जा सकता है।

पीली पत्ति रोग (YLD)

आम पूछे गये प्रश्न - पीली पत्ति रोग (YLD)

  1. पीली पत्ति रोग (संलक्षण) के विशिष्ट लक्षण क्या हैं ?
    • गन्ना बनने व उसकी बाद की प्रवस्थाओं में, तीसरे से पांचवें पत्तों की मध्य शिराओं का पीला होना देखा जाता है। मध्य शिराओं के पीले पड़ने के बाद उसके साथ वाला हिस्से में पीलापन्न आना प्रारम्भ हो जाता है और पत्ति के शिखर से नीचे की तरफ मध्य शिरा के साथ साथ पत्ति का सूखना देखा जाता है।
  2. क्या पीली पत्ति रोग संलक्षण के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है ? यदि हां, तो किस हद तक ?
    • संवेदनशील प्रजातियों में और जिन खेतों की देखभाल नहीं होती, उनमें यह रोग उत्पादन को बुरी तरंह से प्रभवित करता है। रोग अगर फसल की शुरुआती अवस्था में आ जाता है तो इससे अधिक क्षति होती है। प्रभावित गन्नों में पारियों की लम्बवत वृद्धि धीरे धीरे कम होती चली जाती है जिससे शिखर की तरफ पत्तों का गुच्छा सा बन जाता है। उत्पादन में कमी के अलावा, संक्रमित गन्नों से चीनी परता में भी कमी आ जाती है।
  3. पीली पत्ति रोग कैसे फैलता है ?
    • संक्रमित गन्नों को बीज के रूप में प्रयोग करने से कीट वैक्टरों के द्वारा।
  4. पीली पत्ति रोग को कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • शिखर मैरिस्टैम संवर्धन द्वारा विषाणु को गन्ने से हटाया जा सकता है। बाद में उपयुक्त बीज नर्सरी कार्यक्रमों द्वारा रोग मुक्त बीज गन्नों की अपूर्ति की जानी चाहिये।

पेड़ी का बौना रोग (RSD)

आम पूछे गये प्रश्न -पेड़ी का बौना रोग (RSD)

  1. क्या पेड़ी का बौना रोग केवल पेड़ी को ही प्रभावित करता है ?
    • नहीं, यह पौघा फसल को भी प्रभावित करता है मगर प्रभाव पेड़ी में ही अधिक देखा जाता है।
  2. इस रोग को खेत में कैसे पहचाना जाता है ?
    • प्रजाति के प्रदर्शन में धीरे धीरे गिरावट देखी जाती है जिसके साथ गन्ने पतले होते जाते हैं और ताकत में भी कमी देखी जाती है।.
  3. इस रोग के निदानिक लक्षण क्या हैं ?
    • गाँठों के अन्दर के ऊतकों में लाली वाली धारियों, बिन्दुओं या कोमाओं के रूप में लक्षण दिखाई देते हैं। पोरियों में कोई भी लक्षण नहीं देखे जाते।.
  4. इस रोग के कारण गन्ने पतले क्यों हो जाते हैं ?
    • रोगजनक बैक्टीरिया ज़ाइलम वैसल्स में व्यवस्थित ढंग से उपनिवेशित करते हैं। अगर उन फसलों से कई वर्षों तक गन्ना बीज लिया जाता रहता है तो रोगजनक का अनुमाप बढ़ने से प्रजाति की वृद्धि धीमी हो जाती है और गन्ने पतले हो जाते हैं।
  5. यह रोग फैलता कैसे है ?
    • यह रोग संक्रमित गन्ना बीज और खेत में छोड़े गये गन्ना अवशेषों से रोग फैलता है।
  6. इस रोग को किस प्रकार से नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • वातित भाप उपचार संक्रमित बीज टुकड़ों से रोगजनक को हटा सकता है। कीटाणुनाशियों से बीज कटाई यन्त्रों को रोगाणु मुक्त कर रोग के फैलाव को संक्रमित से स्वस्थ बीज गन्नों के टुकड़ों में जाने से रोका जा सकता है।

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