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आम पूछे गये प्रश्न - गन्ने के कीट व हानिकारक जीव

शाखा बेधक

आम पूछे गये प्रश्न - शाखा बेधक

    1. शाखा बेधक के नियन्त्रण के लिये कीटनाशी का स्परे करने के लिये पाॅवर स्परेयर का प्रयोग क्यूं नहीं करना चाहिये ?
      • शाखा बेधक के नियन्त्रण के लिये कीटनाशी को पौधे में उस स्थान पर जाना चाहिये जो शाखा बेधक का पौधे में लक्षित स्थान है, और वह है पत्ति आवरण (sheath) के अन्दर और शाखा का काॅलर क्षेत्र। अतः प्रत्येक शाखा में इस प्रकार के क्षेत्रों पर कीटनाशी को फैलानें के लिये केवल उच्च आयतन वाले स्परेयर का प्रयोग अनिवार्य है, ताकि तरल पदार्थ का लक्षित क्षेत्र की और संचालन सुनिश्चित किया जा सके। इस प्रकार के स्परेयर से प्रत्येक पंक्ति के लिये स्परे तरल की ठीक मात्रा का प्रयोग सम्भव हो पाता है। पाॅवर स्परेयर पत्तों पर अपना भरण पोषण करने वाले कीटों के नियन्त्रण के लिये ही अधिक उपयुक्त है।

    1. शाखा बेधक के नियन्त्रण के लिये कीटनाशियों को छोड़कर और क्या साधन हैं ?
      • बारबार सिंचाई करें और फेरामोन ट्रैप्स को खेतों में लगायें, क्योंकि शाखा बेधक पौधे के वृद्धि शिखर को मार देता है, अतः शाखा की कलिकाओं में क्षतिपूरक फुटाव प्रेरित हो जाता है जिनकी सफलता के लिये बारबार सिंचाई आवश्यक है। यदि सिंचाई न की गई तो क्षतिपूरक शाखाओं का बनना सम्भव नहीं हो पायेगा और खेत में खाली स्थान देखने को मिलेंगे।
    1. फेरामोन ट्रैप्स क्या होते हैं ?
      • Iप्रकृति में एक मादा अपनी जाति के नरों को अपनी और खींचने के लिये एक विशेष प्रकार के रसायन, फेरामोन, को स्त्रावित करता है। नर कीट पतंगे एक किलोमीटर तक की दूरी से भी इसकी गंध की तरफ खिंचे चले जाते हुए मादाओं तक पहुंच जाते हैं। कुछ बेधकों द्वारा स्त्रावित फेरामोनों को पहचानकर गन्ना प्रजनन संस्थान द्वारा संस्लेशित किया गया है। इन संस्लेशित फेरामोनों को रबड़ के पट्टों पर डालकर नरों को लुभाने के लिये प्रयोग किया जाता है। इन पट्टों को पानी के ट्रैप्स, जिसमें थोड़ा सा मिट्टी का तेल डाला जाता है, के ऊपर लगाया जाता है। जब इन्हें खेत में रखा जाता है तब नर पतंगे इसकी और खिंचे चले आते हैं और वह पानी और मिट्टी के तेल या डीजल के मिश्रण में गिरकर पकड़े जाते हैं।.


शाखा बेधक....

More FAQs on Shoot borer..

  1. फेरामोन ट्रैप्स कहां से मिल सकते हैं ?
    • राजश्री शूगर्स और कैमिक्लस लिमिटेड, वर्धाराज नगर, वगाई डैम - 625 562, थेनी और पैस्ट कन्ट्रोल इंडिया लिमिटेड, बैंगलुरू कम्पनियां फेरामोन बना रही हैं। पहली कम्पनी 8 ट्रैप्स ओर बाद वाली 4 ट्रैप्स प्रति एकड़ लगाने की सलाह देती है। परन्तु शाखा बेधक के प्रभावी नियन्त्रण के लिये 10 ट्रैप्स प्रति एकड़ लगाना अति प्रभावी है। ट्रैप्स को 45 सेंटीमीटर की ऊँचाई पर लगाया जाये और इसमें हर सप्ताह पानी और मिट्टी के तेल या डीजल का मिश्रण भरा जाये।
  1. क्या हम एक ही फेरामोन को सभी हानिकारक जीवों के लिये प्रयोग कर सकते हैं ?
    • हम एक ट्रैप को सभी हानिकारक जीवों के लिये प्रयोग कर सकते हैं मगर एक ही फेरमोन प्रलोभन नहीं। क्योंकि प्रत्येक जाति के लिये उसका विशिष्ट फेरामोन होता है अतः जाति अनुसार विशिष्ट फेरामोन का ही प्रयोग किया जाना चाहिये।
  1. कम्पनियों द्वारा अपूर्तित किये गये रबड़ पट्टे कोई विशेष गंध नहीं रखते, तब कैसे जाना जा सकता है कि यह वास्तविक हैं ?
    • क्योंकि किसी फेरामोन को उसका विशिष्ट हानिकारक जीव ही पहचान सकता है अतः कम्पनी द्वारा अपूर्ति किया गया पट्टा तब खेत में लगाया जाये जब इस जाति के पतंगे निकल रहे हों। इस समय पर उसकी असलियत का पता इस बात से चलता है कि ट्रैप में उस प्रजाति के पतंगे इकठ्ठे हुए की नहीं।
  1. क्या फेरामोन के दुष्प्रभाव भी होते हैं ?
    • फेरामोन के केवल 3 मिलिग्राम प्रति प्रलोभन के लिये प्रयोग किये जाने के कारण इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता बल्कि कुछ फायदे अवश्य हो सकते हैं, जो जैविक नियन्त्रण या प्रतिरोधि प्रजाति के प्रयोग में नहीं देखे जाते।

शाखा बेधक.......

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  1. पोरी बेधक के लिये लगाये फेरामोन ट्रैप्स वाले खेत में बेधक का आक्रमण अधिक था जबकि साथ वाले खेत में, जहां ट्रैप्स नहीं लगाये गये थे, वहां पोरी बेधक का आक्रमण कम था। क्या यह सम्भव है की पतंगे साथ वाले खेत से ट्रैप्स वाले खेत की और आकर्षित होने के कारण अधिक आक्रमण हुआ ?
    • नहीं, यह सम्भव नहीं, अगर साथ वाले खेत से पतंगे खिंचे आ सकते हैं तो वह फेरामोन ट्रैप्स वाले खेत से ट्रैप्स की और अधिक खींचे जायेंगे।
  1. मान लीजिये की फेरामोन ट्रैप्स का खेत में रख रखाव ठीक नहीं था, तो क्या साथ वाले खेतों से खिंचे चले आये पतंगों के कारण, और मरे नहीं, जिसके कारण उनकी जनसंख्या बढ़ गई और इस वजह से शायद उनका आक्रमण अधिक पाया गया ?
    • नहीं, खिंचे चले आये केवल नर पतंगे ही होते हैं मादा नहीं, अतः अगर नर पतंगे मरे नहीं तो वह अंडे तो नहीं दे सकते, और उस खेत के मादा अगर वहीं के नरों से एक बार मिलन कर चुके हैं तो वह दोबारा मिलन नहीं करते। अतः इस कारण से हानिकारक जीवों के आक्रमण के बढ़ने की कोई सम्भावना नहीं दिखती।

  1. क्या गन्ना अवशेषों के मल्च के रूप में प्रयोग से शाखा बेधकों का आक्रमण कम हो सकता है ?
  • हां, गन्ना अवशेष पैदा हुए नन्हे डिम्भों के लिये एक यांत्रिक अवरोधक की तरंह कार्य करते हैं क्योंकि इन्हें एक शाखा समूह से दूसरे शाखा समूह पर मृदा की सतह पर से चलकर जाना पड़ता है, क्योंकि शाखा समूह इस प्रवस्था में एक दूसरे से दूर छूते हुए नहीं होते। इसके अलावा गन्ना अवशेषों के कारण परभक्षी, जैसेकि मकडि़यां, केराबिड बीटल, इत्यादि का अधिक विकास होता है जिससे पतंगों और डिम्भों की परभक्षिता की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। यद्यपि काटने वाले कृमियों या चूहों के द्वारा क्षति मल्च वाले खेतों में अधिक होती है।.

शाखा बेधक.......

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  1. क्या 35वें दिन पर हल्कि मिट्टी चढ़ाना शाखा बेधकों के आक्रमण को कम करेगा ?
  • नहीं, ऐसा नहीं होगा क्योंकि डिम्भ इतने छोटे होते हैं वे आसानी से अपने रास्ते को मृदा के नीचे, शाखा के नीचे वाले हिस्से की पत्तियों की शीथों के बीच, खाली स्थानों के बीच से ढूंड लेते हैं क्योंकि कितनी भी मिट्टी शाखाओं को किसी भी प्रकार से ढक नहीं सकती।
  1. मरी हुई शाखाओं में बहुत सारे छोटे छोटे सफेद डिम्भ होते हैं तो क्या वह आक्रमण का कारण हो सकते हैं ?
  • नहीं, शाखा बेधक के डिम्भ बड़े होते हैं और एक शाखा में केवल एक या कभी कभी ही दो होते हैं। मरी हुई शाखाओं में पाये जाने वाले छोटे छोटे डिम्भ वास्तव में मृतजीवी कीड़े हैं जो पौधों के गलसड़ रहे कार्बनिक पदार्थों पर विकसित हो रहे होते हैं और कभी भी पौधों पर आक्रमण नहीं करते। अगर आप शाखा बेधक के डिम्भों को इकठ्ठा करना चाहते हैं तो आप सूखी हुई शाखाओं की बजाये मुर्झाती हुई शाखाओं का चुनाव करें।
  1. कीटनाशी घोल के पत्त्यिों पर बेहतर चिपकने के लिये क्या आप चिपचिपा को अतिरिक्त पदार्थ डालने की अवश्यक्ता है ?
  • नहीं, कीटनाशी में ही चिपिचिपा पदार्थ पहले से ही डाला हुआ होता है। उदाहरण के तौर पर कलोरपाइरिफास 20इै.सी के खरीदे गये एक लिटर में 200 मिलिलिटर वास्तविक कीटनाशी होता है जबकि बाकी 800 मिलिलिटर गीला करने, चिपचिपाहट पैदा करने व फैलाने वाले पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार दूसरे कीटनाशियों में भी दूसरे पदार्थ डाले गये होते हैं।

पोरी बेधक (INB)

आम पूछे गये प्रश्न - पोरी बेधक

  1. खेत में ट्राइकोडर्मा किलोनिस को छोड़ने के बाद भी पोरीबेधक द्वारा गन्ने में डैड्हार्टों का बनना कम नहीं हुआ, क्यों ?
    • ट्राइकोडर्मा किलोनिस पोरी बेधक का एक प्रभावकारी पैरासिटायड नहीं है अतः पोरी बेधक के नियन्त्रण के लिये इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये।
  1. क्या पोरी बेधक के प्रबन्धन के लिये पुरानी पत्तियों को शीथ समेत उतारना मदद कर सकता है ?
    • पुरानी पत्तियों को शीथ समेत उतारने से पोरी बेधक के संक्रमण में केवल 2 से 4% तक की ही कमी देखी गई है।
  1. क्या फेरामोन ट्रैप्स पोरी बेधक के प्रबंधन में मददगार हो सकते हैं ?
    • उपलब्ध विधियों में से फेरामोन ट्रैप्स से बेहतर परिणाम प्राप्त हुए हैं और वह भी तब जब इन्हें की संख्या में 25 प्रति है0, और वह भी 90 से 120 सेंटीमीटर की ऊँचाई पर 5 महीने पुरानी फसल में लगाये गये। इन फेरामोन ट्रैप्स में पानी व मिट्टी के तेल या डीजल के मिश्रण को हर सप्ताह तथा प्रलोभनों, फेरामोन वाले रबड़ पट्टे, को 40 से 50 दिनों में बदला जाये। इसके अलावा अपूर्ति किये गये फेरामोन प्रलोभनों की गुणवत्ता और किसानों द्वारा अतिरिक्त प्रलोभनों को भंडारित करने की विधि पर ही प्रभाव निर्भर करता है। अगर इनमें से किसी भी एक पहलू का ध्यान न रखा गया तो नियन्त्रण पाना सम्भव नहीं होगा।
  1. क्योंकि फेरामोन ट्रैप्स केवल नर पतंगों को ही अपनी और आकर्षित करते हैं तो यह शायद किसी तरंह लाभप्रद नहीं होगा इसलिये क्यों न हम मादा पतंगों को भी आकर्षित करें ?
    • कीट का पुनर्जनन नर और मादा के मिलन से ही हो पाता है। प्रकृति में पोरी बेधक के नर व मादा का अनुपात 50 : 50 का है और एक मादा अपने 8 से 10 दिन के जीवन काल में केवल एक बार ही नर से मिलन करती है। अतः नर या मादा में से किसी एक का ही मारा जाना काफी है। प्रकुति में केवल मादाऐं ही फेरामोन स्त्रावित करती हैं जिसे हम अपने आर्थिक लाभ के लिये प्रयोग कर पाते हैं।

पोरी बेधक......

पोरी बेधक.... (More FAQs)

  1. जब पहले से मिलन कर चुके नर पतंगों को फेरामोन ट्रैप्स अपनी और आकर्षित करेंगे तो वह प्रभावशाली कैसे हो पाते हैं ?
  • एक नर पतंगा अपने औसत 7 दिन के जीवन काल में से 4 से 6 दिनों तक प्रतिदिन एक नई मादा के साथ मिलन कर सकता है जबकि मादा जीवन में केवल एक बार ही मिलन करती है। अतः नरों का किसी भी दिन पकड़ा जाना उनके सम्भावित मिलन को खत्म कर देता है और इसलिये नर जितनी जल्दी पकड़ा जाये उतना ही अच्छा। इन बातों को ध्यान में रखते हुए फेरामोन ट्रैप्स को समय पर लगाना व और उनका पूरी तरंह से अनुरक्षण अति आवश्यक है।
  1. आजकल पोरी बेधक का आक्रमण बढ़ क्यों गया है ?
  • पहले पोरी बेधक का आक्रमण केवल बन रही पोरियों तक ही सीमित था और इससे डैड्हार्ट भी नहीं बनते थे इसलिये किसान को इसका पता तब तक नहीं चलता था जब तक की उसकी पत्तियों की शीथ को न उतारा जाये। मगर 1989 से पोरी बेधक ने अपना आक्रमण का तरीका बदल लिया है और अब यह शाखा के मैरिस्टैम को क्षतिग्रस्त करता है जिससे डैड्हार्ट और शिखर गुच्छ (bunchy top) बनते हैं जैसेकि चोटी बेधक के आक्रमण के कारण होता है। यह लक्षण अति स्पष्ट और आसानी से दिखाई देने वाला होता है। इसके अलावा प्रजाति को. 86032 की 7 महीने या इससे अधिक की फसल अति संवेदनशील है, विशेषकर मैरिस्टैम क्षति के लिये। और क्योंकि यह प्रजाति तमिल नाडू में 80% से अधिक क्षेत्र में उगाई जाती है अतः गन्ना किसान इसकी क्षति लक्षणों से परिचित हो गये हैं।
  1. पोरी बेधक और चोटी बेधक के डैड्हार्ट को कैसे अलग अलग पहचानें ?
  • पोरी बेधक में स्पिंडल पत्ते और उससे नीचे के एक या दो पत्ते सूखकर डैड्हार्ट बना सकते हैं जबकि चैटी बेधक के कारण सबसे अन्दर वाली पत्ति ही केवल सूखती है। पोरी बेधक के डैड्हार्ट बहुत ही स्पष्ट दिखाई देते हैं और भूसे के रंग के होते हैं तथा खींचने पर स्पिंडल से फिसलते हुए निकल आते हैं। इससे नीचे के पत्ते सूखने लगते हैं, धब्बे बनते हैं और कभी कभी मृतजीवी कीड़े भी पैदा हो जाते हैं। चोटी बेधक के डैड्हार्ट गहरे भूरे रंग के, छोटे आकार के, और खाने के लिये छिद्र हो या नहीं हो सकता है और खींचने पर टूटकर सूखा भाग ही बाहर निकलता है। बिलकुल साथ वाले हरे पत्तों में सूई या धारीदार सुराखों की एक या दो पंक्तियों को पाया जा सकता है और नीचे वाली हरि पत्ति के बीच में सुरंग दिखाई दे सकती है। यह चोटी बेधक का विशिष्ट पहचान लक्षण है।

वूली एफिड

आम पूछे गये प्रश्न - वूली एफिड

  1. क्या गन्ने का वूली एफिड शरीर पर खारिश का कारण हो सकता है ?
  • नहीं, इसके नवजात निम्फ हमारे शरीर पर घिसटते हुए एक गुदगुदाने वाला संवेदन प्रदान कर सकते हैं मगर इनका किसी प्रकार की एलर्जी प्रभाव के बारे में अभी तक कोई पता नहीं लगा है।

  1. क्या यह सच है की 10 दिन के अन्दर ही गन्ने का वूली एफिड पूरे खेत में फैल सकता है ?
  • नहीं, यह सच नहीं है, अगर जलवायु वातावरण सहायकक भी है तब भी इसे कम से कम 2 से 3 महीने पूरे खेत में फैलने में लगते हैं।

  1. क्या थिमैट् के दानों को डालने से गन्ने के वूली एफिड को प्रभावी ढंग से नियन्त्रित किया जा सकता है ?
  • नहीं, इससे केवल 50% तक ही नियन्त्रण सम्भव है जो गन्ने के वूली एफिड की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिये काफी नहीं है।.

  1. क्योंकि थिमैट के दाने काफी तीखी गंध छोड़ते हैं तो क्या इनको छेदों वाले पोलीथीन के बैगों में रखकर गन्ने के खेतों में विभिन्न स्थानों पर लटका कर गन्ने के वूली एफिड को प्रभावी ढंग से नियन्त्रित किया जा सकता है ?
  • नहीं, ऐसा नहीं है; मानव का शवसन तन्त्र कीटों के शवसन तन्त्र से बिलकुल भिन्न है। किसी भी धूमक का प्रभाव तभी दिखाई देता है जब इसे हवा बंद स्थानों में प्रयोग किया जाये, मगर एक तो थिमैट धूमक भी नहीं है और दूसरे इसे खुले खेतों में प्रयोग किया जाना है अतः यह प्रभावी नहीं होता।


वूली एफिड.....

More FAQs - वूली एफिड

  1. क्या गन्ने के वूली एफिड को मिथाइल पैराथियान धूल अति प्रभावी ढंग से नियन्त्रित कर सकती है ?
  • नहीं, ऐसा नहीं है;, एक तो धूल ई.सी. संरचनाओं से कम प्रभावी होते हैं और दूसरे मिथाइल पैराथियान धूल, सर्वांगी क्रियाशील न होने के कारण, पत्तों की नीचे वाली सतह को पूरी तरंह से नहीं ढक सकने के कारण (वूली एफिड पत्तों की निचली सतह पर पाये जाते हैं) प्रभावी नहीं हो पाती।.

  1. क्या कोई गन्ने के वूली एफिड के नियन्त्रण के लिये सूक्षमजीवी एजेंट भी है ?
  • नहीं, गन्ने के वूली एफिड का कोई भी सूक्षमजीवी एजेंट स्थानिक नहीं है जबकि दूसरे कीटों के रोगजनक प्रभावी भी नहीं होते। इसके अलावा गन्ने के खेत में सूक्षमजीवी का स्परे पत्ते के नीचे वाली सतह पर पहुंच पाना सम्भव नहीं हो पाता ताकि वह हानिकारक जीव के स्पर्ष में आ सके।.

  1. गन्ने के वूली एफिड के शत्रु जीव कहां मिलते हैं ?
  • शत्रु जीव केवल गन्ने के वूली एफिड से अक्रमित खेत में ही मिलेंगे न की व्यवसायिक तौर पर कहीं से। यद्यपि गन्ना प्रजनन संस्थान द्वारा इन्हें ट्रे में पालने की तकनीक किसानों के लिये विकसित की गई है।.

  1. क्या गन्ने के वूली एफिड दूसरी फसल को भी अक्रमित करते हैं ?
  • यद्यपि मक्का व जवार से इसके पाये जाने की कुछ रिपोर्ट उपलब्ध हैं मगर यह बहुत अधिक नहीं पाया जाता। इसके अलावा क्योंकि गन्ने की फसल लम्बी अवधि की है और लगातार उपलब्ध है, व वूली एफिड इसे कभी भी किसी प्रवस्था में अक्रमित कर सकती है, अतः एफिड पर वैकल्पिक मेज़बानों को ढूंडने का कोई दबाव नहीं होता।


दीमक

आम पूछे गये प्रश्न - दीमक

  1. क्या हलकि मृदाओं में दीमक का प्रभाव अधिक होगा ?
    • आवश्यक नहीं है। गन्ने में दीमक की 13 जातियां पाई जाती हैं जिनमें से कुछ हलकि और कुछ भारी मृदाओं में देखी गई हैं अतः आक्रमण हर प्रकार की मृदा में हो सकता है।
  1. क्या सिंचाई करने से दीमक को नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • नहीं, सिंचाई केवल कुछ समय के लिये अधिक नमी के कारण दीमक के आक्रमण को रोक देती है और जब उपयुक्त नमी का स्तर आ जाता है को दीमक का आक्रमण फिर प्रारम्भ हो जाता है।
  1. दीमक के टीलों के आसपास न होने के बावजूद भी गन्ने के खेतों में दीमक का आक्रमण क्यों देखा जाता है ?
    • गन्ने में दीमक की 13 जातियों में से कुछ ही धरती के ऊपर टीले बनाती हैं जबकि 5 जातियां धरती के नीचे कलोनियां बनाती हैं जो दिखती नहीं हैं।
  1. दीमक के टीलों को कैसे खत्म किया जा सकता है ?
    • सैलफास की एक गोली को छेद में से टीले के अन्दर टपका कर सभी छेदों को कीचड़ से बंद कर देते हैं। और अगर टीले बिना चिमनी के हैं तो एक छेद करके सैलफास की एक गोली को टपकाकर छेद बंद कर देते हैं।
  1. क्या इंजन के या मिट्टी के तेल को सिंचाई के पानी में मिलाकर देने से दीमक के आक्रमण से बचा जा सकता है ?
    • नहीं, दीमक का आक्रमण यहां वहां टुकड़ों में होता है और तेल पानी में समान्य रूप से मिक्स नहीं हो पाता अतः यह हर स्थान एक जैसा फैलेगा नहीं और दूसरे तेल की आवश्यक मात्रा बड़े क्षेत्र को ढकने के लिये मिलाई भी नहीं जा सकती है। इंजन के तेल का दीमक से प्रभावित स्पाट पर प्रयोग करने से दीमक के आक्रमण को निश्चित तौर नियन्त्रित किया जा सकता है मगर एक तो यह नियन्त्रण अस्थाई होता है और दूसरे यह मृदा की बनावट को गड़बढ़ा देगा जो दीमक के प्रभाव से अधिक हानिकारक है।

मीली बग्स

आम पूछे गये प्रश्न - मीली बग्स

  1. स्केल कीटों के नियन्त्रण के लिये क्या तरीके अपनाये जा सकते हैं ?
    • स्केल कीट कोई गम्भीर हानिकारक जीव नहीं है जिसके लिये नियन्त्रक उपायों की आवश्यक्ता हो। स्केल कीट शर्करा भण्डारण कोशिकाओं से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। कीट विकास के लिये प्रयोग की जाने वाली शर्करा की मात्रा न के बराबर होती है जिसके कारण यह फसल के लिये कोई गम्भीर समस्या नहीं बनता। क्योंकि कीट के मृत अवशेष गन्ने की पोरियों पर कटाई के समय तक चिपके रहते हैं जिससे यह गलत आभास होता है की पूरा गन्ना किसी एक समय पर स्केल कीटों के आक्रमण से बुरी तरंह त्रस्त है जबकि वास्तविक्ता यह है की दिखने वाली पपड़ी कई महीनों के आक्रमण के कारण बनी है। कोई भी स्पर्ष कीटनाशी, जैसेकि एन्डोसल्फान या डाईक्लोवोस इत्यादि को जब पुरानी पत्तियों की शीथ हटाने के बाद स्परे किया जाता है तब इससे केवल आक्रमित स्टाकों के प्रौढ़ स्केल कीट ही मरते हैं जबकि इसके नन्हें कीट पहले ही कोमल पोरियों पर जाकर बस चुके होते हैं और यह स्थान शीथ द्वारा ढके रहते हैं अतः स्परे के प्रभाव से बच जाते हैं और इस प्रकार संक्रमण जारी रहता है।
  1. गन्ने के बीज टुकड़ों के उपचार के लिये कौन्न सा कीटनाशी सर्वोतम है ?
    • यदि बीज टुकड़ों को उसी स्थान पर से ही रोपण के समय पर लिया गया है तब किसी कीटनाशी से उपचार की आवश्यक्ता नहीं होती क्योंकि स्केल कीट मृदा के नीचे अगले चार महीनों तक, जब तक की पोरियां न बने, विकसित नहीं हो सकते। हां, यदि गन्ने के बीज टूकड़ों को संक्रमित क्षेत्रों से नये स्थानों पर रोपण के लिये ले जाना है तो ऐसे बीज टुकड़ों को 1 पीपीएम डाइक्लोवोस के घोल में डुबोकर, सीमेंट के खाली बैगों में भरकर उनके मुंह को बांधकर, स्थानान्त्रित किया जाना चाहिये। तेज़ी से धूमक प्रतिक्रिया वाले क्रियाशील कीटनाशी, जैसेकि नुवान, का प्रयोग बीज टुकड़ों में स्केल कीटों को प्रभावशाली ढंग से मार देगा।
  1. मीली बग्स का नियन्त्रण कैसे किया जा सकता है ?
    • मीली बग भी कोई गम्भीर हानिकारक जीव नहीं है और इसके कारण कोई विशेष हानि नहीं होती। यह सभी गन्ना उगाने वाले क्षेत्रों में पाया जाता है और इसे आने वाले समय में एक आमतौर पर पाये जाने वाले हानिकारक जीव के रूप में गन्ने में देखा जायेगा। पुरानी पत्तियों की शीथों को हटाकर इसके आक्रमण को कम से कम तो किया जा सकता है मगर स्केल कीट की तरंह यह जीव भी घिसटता हुआ कोमल पारियों में जाकर बस जाता है अतः इसे भी पूरी तरंह से खत्म नहीं किया जा सकता।

सफेद मक्खी

आम पूछे गये प्रश्न - सफेद मक्खी

  1. पाईरिल्ला का नियन्त्रण कैसे किया जा सकता है ?
    • प्रायद्पीय भारत में पाईरिल्ला को कभी भी हानिकारक जीव का स्तर नहीं दिया गया है। पाईरिल्ला के निम्फों के इनस्टारों की 5 प्रवस्थायें होती हैं और हर प्रवस्था में उतारी गई त्वचा पत्तों पर चिपकी रहती है जिससे यह धोखा होता है की पाईरिल्ला की जनसंख्या अतिअधिक है। इसके अलावा पूरे प्रायद्पीय भारत के सभी क्षेत्रों में इसका पैरासिटायड एपिरिकाना मेलानोल्यूका उपस्थित रहता है जो पाईरिल्ला की जनसंख्या को (अपनेआप) प्रकृतिक तौर पर नियन्त्रित करता है। पाईरिल्ला से प्रभावित गन्ने के खेतों में, जहां एपिरिकाना उपस्थित हो, वहां किसी भी कीटनाशी का प्रयोग न करना अति महत्वपूर्ण है।

  2. सफेद मक्खी का नियन्त्रण कैसे किया जा सकता है ?
    • एसिफेट के पानी में 20% घोल को स्परे करने से सफेद मक्खी को नियन्त्रित किया जा सकता है। इस स्परे को एक माह के बाद दोबारा किया जाना चाहिये ताकि अंडों से निकलते निम्फों को मारा जा सके।

सफेद गिंडार

आम पूछे गये प्रश्न - सफेद गिंडार

  1. गन्ने में सफेद गिंडार को कैसे नियन्त्रित किया जाये ?
    • सफेद गिंडार को नियन्त्रित करने का सर्वोतम तरीका वह है जब इसके प्रौढ़ धरती से बाहर आकर एक विशेष वृक्ष (नीम वृक्ष) पर एक विशेष समय पर (गर्मियों में वर्षा की बौछार के एकदम बाद) इकठ्ठे होते हैं। इस विशिष्ट कार्य के लिये हमें पहले से ही तैयार रहना चाहिये ताकि हम वर्षा की बौछार वाले दिन और अगले सात दिन तक बीटलों को इकठ्ठा करते रह सकें। इस प्रकार से हम समस्या का कम लागत व प्रभावी रूप से समाधान कर सकते हैं।
  2. गन्ने की खड़ी फसल में सफेद गिंडार को कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • गन्ने की खड़ी फसल में सफेद गिंडार को नियन्त्रित करना न केवल बहुत ही मुश्किल है बल्कि मंहगा भी है। कोई भी कीटनाशी सफेद गिंडार के विरुद्ध प्रभावी नहीं है। गन्ने की फसल में 24 घंटे तक पानी को खड़ा रखने से गिंडार बाहर आ जाते हैं जिन्हें हाथों से पकड़ कर मार दिया जाये। यह ध्यान रखें की पानी खड़ा करने के बाद फसल गिरने न पाये।

चूहे

आम पूछे गये प्रश्न - चूहे

  1. चूहों को कैसे नियन्त्रित किया जा सकता है ?
    • नियन्त्रण के लिये सबसे पहले निश्चित किया जाये की चूहे उसी खेत में निवास करते हैं या बाहर से आते हैं। आमतौर पर अगर वह बाहर से आते हैं तब उनका आक्रमण खेत के किनारों से प्रारम्भ होता है। अगर उनकी बिल खेत के अन्दर हैं तब उनका आक्रमण टुकड़ों में खेत के अन्दर देखा जाता है। गन्ने की कटाई के बाद गन्ने के खेत के अन्दर और आस पास जीवंत बिलों की पहचान आवश्यक है। इसके लिये सभी बिलों के मुंह कीचड़ से बंद कर अगले दिन फिर से खुली बिलों को देखकर जीवंत बिलों पहचान की पहचान होती है। इन चूहों की क्रियाशील बिलों में सैलफास की आधी गोली डालकर इनके मुहों को कीचड़ से फिर बंद कर दिया जाता है। क्योंकि सैलफास एक गंधरहित गैस उत्पन्न करने वाला धूमक है अतः इसका प्रयोग दो अनुभवी कर्मियों द्वारा किया जाना चाहिये। इसके अलावा नरम छिलके वाली प्रजातियों, जैसेकि को. 86032, को चूहों से ग्रसित इलाकों में नहीं लगाना चाहिये जबकि सख्त छिलके वाली प्रजाति वहां लगाई जा सकती है।
  2. चूहों के विषाक्त प्रलोभन खाने में मिलाने के लिये कौन्न सा रसायन सर्वोतम है ?
    • समान्यतः खेतों में बहुत सारे खाने की उपाब्धता के कारण विषाक्त प्रलोभन खाना कोई विशेष फायदेमंद नहीं होगा। अगर जि़ंक फास्फाईड से खाने को विषक्त बनाया जाता है तब कुछ बार ऐसा खाना खाने के बाद उनमें प्रलोभन खाने के प्रति संकोच विकसित हो जायेगा और इस प्रकार प्रलोभन खाने प्रभावी नहीं रहेंगे। इसके अलावा प्रलोभन खाने पक्षियों, जैसेकि तोता, पैटरिज, कोयल, इत्यादि को भी मार देंगे।.
  3. क्या चूहों के शत्रु भी उपलब्ध हैं ?
    • चूहों के शत्रु उपलब्ध तो हैं मगर प्रयोगात्मक दृष्टि से काम के नहीं। जंगली बिल्लियां, सांप, उल्लू, नेवले, भेडि़ये इत्यादि प्रभावी तो हैं मगर उन्हें खेतों तक लाना सम्भव नहीं है। घरेलू बिल्लियां इतनी प्रभावी नहीं होने के बावजूद यह दूसरे आसान खानों की तरफ, जैसेकि छिपकलियां, आर्कषित होंगी बजाये के चूहों के, जिनके लिये इन्हें मनुष्य ने छोड़ा है।.
  4. क्या हम बिल्लियों, सांपों व उल्लुओं को चूहों के नियन्त्रण के लिये प्रयोग कर सकते हैं ?
    • यह सभी चूहों के प्रकृतिक शत्रु हैं मगर इनका गन्नें के खेतों में उपनिवेशन मुश्किल काम है। अगर इनका उपनिवेशन किसी प्रकार से हो भी गया तो सांपों के काटने का खतरा बना रहता है और उल्लुओं की बोली को अशुभ माना जाता है। जंगली बिल्लियों को छोड़कर, पालतू बिल्लियां खेतों में न केवल बहुत कम प्रभावी होती हैं बल्कि यह पालतू पक्षियों के लिये भी खतरनाक हो सकती हैं। इसके अलावा शत्रु जीवों का समान्यतः क्षेत्रीय आचरण रहता है जिसके कारण कई शत्रु जीवों को किसी एक क्षेत्रमें इकठ्ठा रख पाना सम्भव नहीं होता जिसके कारण से आपेक्षित परिणाम, एक निश्चित समय में, प्राप्त नहीं हो पाते। और यह भी सम्भव है की अगर चूहों की समस्या हल हो भी गई तो यह शत्रु जीव कहीं हमारे लिये खतरे या सरदर्द का कारण न बन जायें।

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