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समन्वित पोषक

एकीकृत पोषक तत्व प्रबन्धन

रसायनिक, कार्बनिक और जैविक संसाधनों का फसल पोषण में इस प्रकार प्रयोग ताकि वह एक दूसरे के पूरक हों, आमतौर पर यह सहक्रियाशील प्रभाव दिखायें, उत्पादक्ता को दीर्घकालिक बनायें और बिना फसल के गुणों से समझोता किये या मृदा स्वास्थय या किसी और वातावरण पर बुरे प्रभाव के उत्पादन को अधिकतम करने को समन्वित पोषण तत्व प्रणाली कहा जाता है।

उपयुक्त खादों का चुनाव मृदा के वर्ग पर निर्भर करता है। गन्ने की अधिकतर मृदाओं के लिये यूरिया नेत्रजन का महत्वपूर्ण स्त्रोत है, फासफोरस के लिये सुपर फास्फेट सर्वोतम है जबकि म्यूरेट आफ पोटाष (पोटाशियम कलोराइड) पोटाश का स्त्रोत है हालांकि, विभिन्न प्रकार के संयुक्त खाद भी प्रभावशाली ढंग से प्रयोग किये जा सकते हैं। पथरीले फासफेट का प्रयोग आमतौर पर अमलीय मृदाओं में होता है मगर इसे आम मृदाओं में कार्बनिक खादों या फासफोरस घोलक बैक्टीरिया के साथ मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है जिससे मंहगी रसायनिक फासफोरस खादों से बचा जा सकता है।

खलियान खाद (एफ.वाई.एम.) की उपलब्धता आजकल बहुत ही कम है जिसका कारण गायों की जनसंख्या में आ रही कमी और जानवरों की शक्ति का खेती में कम होते प्रयोग हैं। अतः गन्ने की उत्पादन प्रणाली में प्रैस-मड, गन्ने का कचरा और चीनी मिलों एवं शराब कारखानों से निकलते बहिःस्त्रावी पदार्थ महत्वपूर्ण हैं।

प्रैस-मड में 1.26% नेत्रजन, 3.83% फासफोरस, 1.46% पोटाश, करीब 20-24% कार्बनिक पदार्थ और 11% कैलशियम की उपस्थिती दर्ज की गई है अतः प्रैस-मड पोषक तत्वों का समन्वित प्रणाली में एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। प्रैस-मड को एक महीने के लिये उपचारित किया जा सकता है या इसे सूक्षम जीवों जैसेकि पल्यूटोरस और ट्राइकोडर्मा से मिलाकर उपजाऊ बनाया जा सकता है और इसे शराब कारखानों के बहिःस्त्रावी द्रव्यों के साथ मिलाकर भूमी में दबाकर सूक्ष्म जीवों द्वारा गलने सड़ने दिया जाता है। प्रैस-मड का करीब 10-25 टन/है0 पोषक तत्वों की पूर्ति के लिये मृदा में डाला जा सकता है।

गन्ने के अवशेषों का प्रयोग

गन्ने के अवशेषों का प्रयोग

गन्ना अपने कुल जीव भार का करीब 40% पत्तों के रुप में उत्पन्न करता है जो करीब 15-20 टन/है0 दर्ज किया गया है। गन्ने के कचरे़ में विभिन्न पोषक तत्वों की औसत मात्रा 0.35% नेत्रजन, 013% पी.2ओ.5 और 0.15% के.2ओ. है अतः प्रति/टन गन्ने के कचरे़ से 3.5 किलोग्राम नेत्रजन, 1.3 किलोग्राम पी.2ओ.5 और 1.5 किलोग्राम के.2ओ. प्राप्त होता है। गन्ने की औसत उत्पादित फसल से करीब 50 किलोग्राम नेत्रजन, 20 किलोग्राम पी.2ओ.5 और 100 किलोग्राम के.2ओ. को पुनःप्राप्त किया जा सकता है।

गन्ने के खेतों एवं खाली पड़े खेत के स्थानों में बहुत सारे खरपतवार उग आते हैं। सधारणतया इन्हें उखाड़कर फैंक दिया जाता है जिसके बजाये इस जीव भार की कम्पोस्टिंग कर पोषक तत्वों को पुनःप्राप्त किया जा सकता है। गन्ने के कचरे़ को मल्च के रुप में प्रयोग कर बाद में उसे खेत में ही मिला दिया जा सकता है। दूसरी और कचरे़ को विभिन्न तरीकों से और अन्य संसाधनों को भी मिला कर कम्पोस्ट किया जा सकता है। एक नई विधि उसी स्थान पर कम्पोस्टिंग की है जो विशेषकर रटून की फसलों में और पत्तियों को पौधे से हटाकर वहीं कम्पोस्टिंग की जा सकती है।

गन्ने की कटाई के बाद पीछे स्टब्बल और जड़ें रह जाते हैं जो क्रमशः गन्ने का 4.5% और 12.7% के करीब होते हैं। इस प्रकार यह अवशेष कुल उत्पादित जीव भार का 17.2% होते हैं और यह कार्बनिक पदार्थ और पोषक तत्वों के स्त्रोत का काम करते हैं। एक अनुमान के अनुसार पिछली गन्ने की फसल से रटून को 4-5 टन सूखा पदार्थ मिलता है। इस जीव भार का पोषक तत्वों के रुप में 50 किलोग्राम नेत्रजन, 20 किलोग्राम पी.2ओ.5, 20 किलोग्राम के.2ओ., 1.48 किलोग्राम सोडियम, 7.8 किलोग्राम कैल्शियम, 8.12 किलोग्राम लोहा, 1.08 किलोग्राम मैंगनीज़, 0.07 किलोग्राम तांबा औा 0.10 किलोग्राम जस्ता प्रति है0 योगदान है।

बहिःस्त्रावी अवशेषों का प्रयोग

बहिःस्त्रावी अवशेषों का प्रयोग

भारत में करीब 285 शराब के कारखाने हैं जिनसे करीब 40 खरब लिटरस बहिःस्त्रावी अवशेषित द्रव्य (effluent waste), जिसे प्रयुक्त धुलाई (स्पैंट वाश) द्रव्य कहा जाता है, निकलता है। मिलों के बहिःस्त्रावी अवशेष द्रव्य आमतौर पर मिल घर, निस्यंदन घर, उबाल घर, सैंट्रीफयूज घर, ठंडा करने वाले द्रवणित्र से ऊपर बहने वाला पानी और फर्श धुलाईयों इत्यादि से प्राप्त मिश्रण है। एक चीनी मिल से, जो सल्फिटेशन प्रक्रिया पर आधारित है, प्रति एक टन पीढ़े गये गन्ने के पीछे उससे करीब 300 से 500 लिटर प्रयुक्त पानी निकलता है। अतः एक 2,500 टन प्रतिदिन गन्ना पीढ़ने वाली मिल कम से कम 750 हज़ार लिटर प्रयुक्त पानी बहिःस्त्रावित करेगा। यह प्रयुक्त पानी भी कुछ पोषक तत्वों को रखता है। इस पानी को उचित उपचार के बाद सिंचाई के लिये प्रयोग किया जा सकता है जिससे कुछ पोषक तत्वों की अपूर्ति भी हो जायेगी। प्रैस-मड और शराब कारखानों के बहिःस्त्रावों को प्रयोग कर जैव-कम्पोस्ट और जैव-भूमि खाद बना सकते हैं।

हरि खाद

हरि खादों का उपयोग

Inter-cropping sugarcane with daincha as green manure

मृदा की उत्पादक्ता को बढ़ाने के लिये हरि खाद फसलें, जैसेकि डैन्चा, पोषक तत्वों के स्त्रोत का कार्य करते हैं। गन्ने की फसल लेने से पहले लगाई गई हरि खाद फसल हमेशा फायदेमंद होती है। हरि खाद फसल को समय पर बीजना और पुष्पण से पहले काट कर उसे खेत में ही जोतकर उसका पूरा फायदा उठाया जा सकता है। इस जोती गई फसल के गलन के लिये अच्छी नमी का बनाए रखना अति महत्वपूर्ण है और इसके लिये प्रयाप्त समय की भी आवश्यक्ता है।

एक दलहनी हरि खाद करीब 7.5 से 12.5 टन हरा पदार्थ/है0 और 10 से 30 किलोग्राम नेत्रजन/है0 प्राप्त होता है। सनन्वित प्रणाली में हरि खाद का एक अन्तः फसल के रुप में प्रयोग और उसका वहीं भूमी में समावेश एक महत्वपूर्ण कार्यप्रणाली है। अगर गन्ने से पहली हरी फसल को फासफोरस खाद दे दी जाये तो वह ली जाने वाली गन्ने की फसल के लिये फायदेमंद

जैव खादों

जैव खादों का प्रयोग

सभी मृदाओं को कार्बनिक पदार्थों, अपक्षयन, बारिश एवं सिंचाई के पानी द्वारा और स्थानिक सूक्ष्म-वनस्पतियों द्वारा जैविक नेत्रजन स्थानिकरण से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। मृदा का सहयोग मृदा परीक्षण द्वारा पता लगाया जाना चाहिये जिससे खादों की प्रयोग की जाने वाली मात्राओं का उचित फैसला लिया जा सकता है। संतुलित पोषक तत्वों की आवश्यक्ता को रसायनिक खादों, कार्बनिक स्त्रोतों, जैव-खादों और हरि खादों द्वारा पूरा किया जा सकता है। विभिन्न स्त्रोतों का संयोजन इस पर निर्भर करता है की आपके पास क्या कुछ उपलब्ध है। आजकल केवल रसायनिक खादें ही प्रयोग की जाती हैं और अगर दूसरी खादें प्रयोग भी की जाती हैं तो भी उनके सहयोग पर विचार नहीं किया जाता। यद्यपि गन्ने की खेती केवल कार्बनिक स्त्रोतों के आधार पर की जा सकती है (जैसेकि संस्थान में पिछले कुछ सालों में करके दिखाया गया है) परन्तु पोषक तत्वों की कुल आवश्यक्ता को पूरा करने के लिये जितनी कार्बनिक पदार्थों की ज़रुरत पड़ेगी उतनी बड़ी मात्रा की उपल्बधता मुश्किल ही नहीं होगी परन्तु इसकी लागत भी अधिक होगी। जैविक खाद एक और विकल्प है जिससे कुछ पोषक तत्वों को अपूर्ती की जा सकती है। अभी तक 6 एज़ोस्पिरिलियम (Azospirillium) और फोस्फो-बैक्टीरिया दो महत्वपूर्ण और प्रमाणित जैविक खादों के स्त्रोत हैं। ग्लुकोनएसिटोबैक्टर (Gluconacetobacter), जो नेत्रजन को स्थायी करता है, का बड़े पैमाने पर अध्यन किया जा रहा है। एज़ोस्पिरिलियम का प्रयोग अति फायदेमंद प्रमाणित हुआ है, विशेषकर कम नेत्रजन वाली मृदाओं और वहां जहां नेत्रजन को कम स्त्रों पर प्रयोग किया जा रहा हो और इससे गन्ने की फसल की 25-35% नेत्रजन की आवश्यक्ता को पूरा किया जा सकता है। फोस्फो बैक्टीरिया को फास्फोरस के घोलने अतिप्रभावशाली पाया गया है और इससे 25-50% फास्फोरस की आवश्यक्ता को पूरा किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में हमारे संस्थान में ग्लुकोनएसिटोबैक्टर की कई स्टरेन्स को पहचाना गया है और इनकी प्रभावकारिता को जांचा जा रहा है। एक उचित प्रणाली यह हो सकती है जिसमें 50 से 75% पोषक तत्वों को रसायनिक खादों के द्वारा दिया जाये जबकि बाकी मात्रा की अपूर्ति दूसरे स्त्रोतों (प्रैस-मड, हरि खाद, र्जविक-खादों, इत्यादि) से की जाये। हमारे गन्ना प्रजनन संस्थान में पोषक तत्वो की आवश्यक्ता का 50% रसायनिक खादों, 25% कार्बनिक पदार्थों और 25% जैविक-खादों द्वारा पूरी की जाती है और इस संयोजन को केवल रसायनिक खाद द्वारा अपूर्ति कर गन्ने की फसल को कोई अन्तर नहीं पड़ता है। कार्बनिक स्त्रोतों के फायदेमंद प्रभाव को कई परीक्षणों के द्वारा सिद्ध किया जा चुका है।

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