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सिंचाई प्रबंधन

सिंचाई प्रबंधन

किसी भी फसल की सामान्य वृद्धि और उत्पादन के लिये उसके पूरे जीवन काल के दौरान उपयुक्त नमी का बनाये रखना आवश्यक है। गन्ने जैसी फसल, जहां अन्तिम उत्पाद गन्ने हैं, और उनमें भार के आधार पर 70% पानी होता है, यह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। अतः गन्ने में कार्यकि की दृष्टि से और संरचना में पानी एक मुख्य घटक है। एक टन गन्ने के उत्पादन के लिये 200 से 250 टन पानी की आवश्यक्ता आंकी गई है।

उपयुक्त नमी के हालात वह हैं जब मृदा में जड़ों के क्षेत्र में पानी की मात्रा न तो कम और न ज़्यादा होती है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाये तो यह वह हालात हैं जब मृदा में जड़ों के क्षेत्र में पानी की मात्रा उपलब्द्ध सीमा में खेत की धारण शक्ति के करीब रहती है। इस प्रकार के हालात पौधों को तनाव रहित जीवन जीने में सहायक होते हैं जिससे पौधे की कार्यकि प्रक्रियाऐं सामान्य रूप से कार्य कर फसल की सामान्य वृद्धि और उत्पादन देने में सफल होते हैं।

गन्ने की फसल करीब एक वर्ष समयावधि की है अतः, इसका जब भी रोपण किया जाये, इसे वर्ष भर की सभी ऋतुओं का सामना करना पड़ता है। अगर हम विभिन्न ऋतुओं और महीनों को ध्यान में रखें तो उषणकटिबंधीय भारत के गन्ने की खेती के अधिकतर हिस्सों में मार्च से जून के बीच सिंचाई के पानी की उपलब्धता में कमी आती है जिससे नमी में कमी के हालात देखे जाते हैं। इसके साथ ही जलवायु के कारण वाष्पीकरण अधिक होने से फसल की पानी की आवश्यक्ता और भी बढ़ जाती है। इन हालातों में उपलब्द्ध सिंचाई के पानी को और भी अधिक कुश्लतापूर्ण प्रयोग कर एवं नमी को बनाये रखने की तरकीबों को प्रयोग कर सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

पानी की आवश्यक्ता

पानी की आवश्यक्ता का मूल्यांकन

गन्ने में पानी की आवश्यक्ता 1,200 से 3,000 मिलि मीटर के बीच देखी गई है जो देश के विभिन्न भागों में फसल के उत्पादन स्तर और जलवायु के हालातों पर निर्भर करती है। कम वाष्पिकरण वाले जलवायु क्षेत्रों में स्वभाविक तौर पर पानी की कम आवश्यक्ता होती है। एक जैसे जलवायु वाले क्षेत्रों में पानी की आवश्यक्ता सीधे तरंह से फसल के उत्पादन स्तर पर निर्भर करती है।

कुशल जल प्रबंधन में वर्षा के पानी को इकठ्ठा करना और इसे भंडारित कर साल भर विवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग करना शामिल हैं। किसी क्षेत्र में प्रति वर्ष जल की कुल उपलब्द्धता को ध्यान में रखा जाता है। फसल योजना बनाते समय पानी की उपलब्द्धता को ध्यान में रखा जाता है जैसेकि किसी खेत को वर्षा, नहरों और कूंओं से पानी मिलता है। वर्षा केवल साल के कुछ महीनों में ही होती है, सिंचाई का नहरी पानी भी विशेष अवधि के दौरान ही उपलब्द्ध होता है और खुले कूंओं से पानी की उपलब्द्धता बहुत अधिक ऊपर नीचे हो सकती है। अतः फार्म के स्तर पर पानी की उपलब्द्धता साल भर एक जैसी नहीं रहती है। इसलिये फसल की योजना बनाते समय साल के विभिन्न महीनों में पानी की उपलब्द्धता का फसल की आवश्यक्ता के साथ मेल खाना ज़रूरी है। कम से कम पानी की उपलब्द्धता की अवधि को ध्यान में रखते हुए उतने क्षेत्र का अंदाज़ा लगायें जिसे इस पानी से सींचित किया जा सकना सम्भव होगा। बाकी क्षेत्रों में छोटी अवधि की फसलों की फसलों को लगायें जब उनके लिये पानी की उपलब्द्धता निश्चित हो। कम पानी की उपलब्द्धता की अवधि में फार्म का कुछ हिस्सा फसल रहित रखा जा सकता है।

पानी का संरक्षण

सिंचाई के पानी का संरक्षण

अधिक पानी की उपलब्द्धता के समय के दौरान भी खेत में पानी भर कर सिंचाई नहीं की जानी चाहिये और केवल नियंत्रित सिंचाई विधि ही अपनाई जानी चाहिये ताकि अतिरिक्त पानी को कम पानी की उपलब्द्धता वाले समय के लिये बचाया जा सके।

नालियों में सिंचाई की विधि किसानों के लिये सबसे अच्छी उपलब्द्ध विधि है जिसे आसानी से अपनाया जा सकता है और इससे पानी की बर्बादी को कम से कम किया जा सकता है। लम्बी नालियों में गनने की रोपाई कर लहर सिंचाई विधि से फायदा हो सकता है। जहां तक सम्भव हो, पानी को इसके स्त्रोत से खेत तक ले जाने के लिये पाईपों को प्रयोग करें।

पानी की कमी के समयों में एक एक छोड़कर नालियों में सिंचाई की जा सकती है। जब पानी की व्यवस्था हो जाये तो किसान दोबारा पुरानी विधि अपना सकते हैं।

भारी मृदाओं में अंकुरण के दौरान छिड़काव (sprinkler) सिंचाई व्यवस्था हल्कि सिंचाई करने से फायदेमंद सिद्ध होगी जिससे फसल में बेहतर अंकुरण सम्भव होगा।

टपक (drip) सिंचाई विधि फार्म के पूरे क्षेत्र में कम से कम पानी से सिंचाई करने में सहायता मिल सकती है मगर प्रणाली के अपनाये जाने में इसकी उच्च लागत बाधक है।

गन्ने की निर्माणात्मक प्रावस्था में सूखा पड़ने वाले इलाकों में गन्ने की बीज समग्री को चूने से संतृप्त पानी में भिगोकर बीजने से लाभ होता है। रोपण में पंक्तियों की 60 सेंटीमीटर की दूरी को अपनाना चाहिये। दोहरी पंक्ति विधि में खाईयों (trenches) की गहराई 30 सेंटीमीटर और चैड़ाई 75 सेंटीमीटर रखी जाती है और खाईओं की दूरी 120 सेंटीमीटर रखी जाती है जिससे पानी की आवश्यक्ता कम हो जाती है और सूखे का प्रभाव कम करने में सहायता मिलती है। सूखे के दौरान पत्तों पर 2.5% यूरिया और 2.5% पोटाश के घोल का छिड़काव सिंचाई के साथ किया जा सकता है। जहां कहीं सम्भव हो, गन्ना अवशेषों (trash) को मल्च के रूप में प्रयोग करें।

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