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हाल ही की अनुसंधान उपलब्धियां - जीव प्रौद्योगिकी

आणविक अध्यन

आणविक अध्यन

  • यथास्थान संकरण में फलुरोसैंस का सहारा लेकर पता चला की इरिएन्थस अरुंडिनेशियस x सैक्रम स्पानटेनियम से प्राप्त संकर सी.वाई.एम. 04-420 (2एन = 62) में 30 गुणसूत्र इरिएन्थस अरुंडिनेशियस से और 32 सैक्रम स्पानटेनियम से थे। इरिएन्थस जातियों और सैक्रम रोबस्टम के बीच क्रासिस से प्राप्त तथाकथित अन्तर जैनरिक संकरों में से वास्तविक संकरों को पहचानने के लिये माइक्रोसैटेलाइटों, आई.टी.एस. 1, आई.टी.एस. 2 और 5एस आरडी.एन.ए. प्राइमरों की मदद ली गई। एस. आफिशनेरम x इरिएन्थस, एस. रोबस्टम x इरिएन्थस और इरिएन्थस x एस. आफिशनेरम के अन्तर जैनरिक संकरों को गन्ने के साथ क्रास कर प्राप्त संकरों की पहचान के लिये माइक्रोसैटेलाइट मार्करों का प्रयोग किया जा सका। गन्ने के माइक्रोसैटेलाइट प्राइमरों को प्रयोग कर, संगति प्रतिचित्रण के लिये, कुछ लाल सड़न प्रतिरोधि व संवेदनशील प्रजातियों के विशिष्ट मारकरों की पहचान की गई। बहुत सारे अन्तर जातीय और अन्तर जैनरिक संकर कृन्तकों को करनाल में चोटी बेधक व स्टाक बेधक प्रतिरोधिता के लिये मूल्यांकित कर कम संवेदनशील कृन्तकों की पहचान की गई।
  • गन्ना x ज्वार संकरों के क्रासिस से प्राप्त 27 संततियों को शरीरिक विज्ञान की दृष्टि से लक्षण वर्णित किया गया और ज्वार विशिष्ट मारकरों की सहायता से उनकी संकरता को निश्चित किया गया।
  • आर.टी.-पी.सी.आर. तकनीकों के प्रयोग से गन्ना विशिष्ट तीन नई सूखा प्रतिक्रियाशील प्रत्याशी जीनों, नामशः डी.आर.ई.बी.360, एल.ई.ए.385 और सी.ए.एल.एम.ओ.डी.400, को सूखा सहनशील पैतृकों और संततियों में, उनकी उपस्थिती या अनुपस्थिती के आधार पर, पहचाना गया।
  • जाति व जीनस विशिष्ट माइक्रोसैटेलाइट मार्करों को विकसित कर उनको अन्तर जातीय और अन्तर जैन्रिक संकरों को पहचानने के लिये प्रयोग किया गया।
  • सूखा प्रतिरोधिता प्रत्याशी जीनों की पहचान का कार्य प्रगति पर है।
  • इरिएन्थस जातियों को लेकर बनाये गये क्रासिस से प्राप्त संततियों में से वास्तिविक संकरों की पहचान के लिये इरिएन्थस विशिष्ट मारकरों के पहचान के कार्य को किया गया है।

आणविक अध्यन.......

आणविक अध्यन (contd...)

  • गन्ने से प्रतिरोधि जीन अनुरूप अनुक्रमणों को विलगित कर लक्षण वर्णित किया गया जिन्हें प्रतिरोधि जीन अनुक्रमों के संरक्षित प्रक्षेत्रों से डिज़ाइन कर प्राप्त किया गया था। इस प्रक्रिया के आधर पर 29 प्राइमरों को डिज़ाइन कर लाल सड़न रोग प्रतिरोधि बी.ओ. 91 और संवेदनशील को.सी. 671 से जीनोमिक अनुक्रमणों को परिवर्धित किया गया। इस प्रकार कुल 54 प्रतिरोधि जीन अनुरूप अनुक्रमणों को एन.सी.बी.आई. के जी.एस.एस. डाटाबेस जीन बैंक में संरक्षित करने के लिये भेजा गया है।
  • सी. फालकेटम के 80 विलगनों को 5.8एस-आई.टी.एस. के प्रयोग से प्राप्त आणविक विविधत्ता के आधार पर तीन विभिन्न वर्गों में बांटा गया।
  • गन्ने में लाल सड़न रोग प्रतिरोधिता के आणविक आधार के पूर्ण वर्णन लिये अध्यन किये गये।
  • सम्पूर्ण विश्व में सभी गन्ना उगाये जाने वाले देशों में गन्ने में पाये जाने वाले तीन मुख्य आर.एन.ए. विषाणुओं, नामशः गन्ना पच्ची विषाणु, गन्ना धारीदार पच्ची विषाणु और गन्ना पीली पत्ति विषाणु, की पहचान के लिये एक बहुविधि उल्ट जानकारी प्रतिलेखन पोलीमरेस श्रंखलाबद्ध प्रतिक्रिया () को विकसित किया गया।
  • गन्ने के विषाणुओं में आणविक विभिन्नता - भारत से गन्ने के पच्ची विषाणु के विस्तृत लक्षण वर्णन से पता चला की हमारे विलगनों में दूसरे देशों के गन्ने के पच्ची विषाणुओं की स्थापित स्ट्रेन्स ए., बी., सी., डी. और एस.सी. के साथ किसी प्रकार की कोई नज़दीकी समरूपता नहीं थी। हमने भारतीय विलगनों को 9 नई गन्ने के पच्ची विषाणु स्ट्रेन्स के रूप में वर्गीकृत किया है और इनका संसार के किसी भी देश में पाये जाने की जानकारी नहीं है। कोट प्रोटीन अनुक्रमण के आधार पर भारत के 22 नये लक्षणवर्णित पीली पत्ति विषाणुओं को तीन जीनोटाइप्स नामशः, सी.यू.बी., आई.एन.डी. और बी.आर.ए.-पी.ई.आर., में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से आई.एन.डी. विषाणु केवल भारत से ही रिर्पोट किया गया है जबकि बाकी दो जीनोटाइप्स को दूसरे देशों से भी रिर्पोट किया गया है।

पराजीनिक अनुसंधान

पराजीनिक अनुसंधान

  • गन्ने के पराजीनियों पर, जो कीटनाशी प्रोटीनों (क्राई 1ए.बी और एप्रोटिनिन) को प्रदर्शित कर रहे थे, उनके मूल्यांकन लिये खेत में पहला सीमित परीक्षण किया गया जिसमें गन्ना उत्पादन व रस की गुणवत्ता की दृष्टि से समान्य और पराजीनियों में कोई अन्तर नहीं पाया गया। इस पीरक्षण के दौरान खेत में बेधक के आक्रमण के निमन्न स्तर होने के कारण पराजीनियों की भेदकर प्रतिक्रियाओं को आंका न जा सका। बेधक के विशिष्ट लक्षणों, डैड-हर्ट्स, ने पत्तों में क्राई की मात्रा के साथ सार्थक प्रतिकूल सम्बंध दिखाया जो इस बात की और इशारा करता है की, हानिकारक जीव की मध्यम स्तर की गतिशीलता के बावजूद, क्राई विष में बेधक की क्रियाशीलता को रोकने की क्षमता थी। पोरी बेधक की व्यापक्ता के अध्यन ने इस परीक्षण में इस ओर इशारा किया की क्राई 1ए.बी इस बेधक का विरोधि नहीं दिखता।
  • एक नये निर्माणात्मक प्रोत्साहक को एक जंगली जाति से विलगित कर लक्षण वर्णित किया गया और अब इसके प्रदर्शन पैटर्न का अध्यन किया जा रहा है। इसके अलावा जड़ और तने से दो दो विशिष्ट प्रोत्साहकों को डिज़ाइन कर इनके निर्माणों को गन्ने, धान व गेहूं में प्रदर्शन अध्यनों के लिये रूपांतरित किया गया। घाव प्रेरित जीन पी.आर.10 के उच्च प्रदर्शन को देखा गया और, जीन के धारा प्रवाह के विपरीत, कलोनिंग व अनुक्रमण कर उनमें विभिन्न तथाकथित प्रोत्साहक तत्वों की उपस्थिति देखी गई।
  • उच्च व निमन्न शर्करा वाले व्यवसायिक गन्ना संकरों में, शर्करा उपापच्य में भाग लेने वाली जीनों, एस.पी.एस., एस.पी.पी. और इन्वर्टेसों (एस.ए.आई. और सी.डब्लयू.आई.), के प्रतिलिपी स्तरों को, प्रदर्शन रूपरेखांकन में, विभिन्नता से नियंत्रण होते देखा गया।
  • तीन विभिन्न यूबिक्यूटिन विलगित की गई जीनों में से तीन 5’ धारा प्रवाह के विपरीत अनुक्रमणों में से दो को pCAMBI वेक्टर पर CaMV35s प्रोत्साहक के स्थान पर कलोन किया गया ताकि जीन नियन्त्रित क्षेत्र - गॅस फयूज़न (gus fusion), को लाया जा सके। गन्ना, धान, तम्बाकू और अरेबिडोप्सिस में क्षेत्र-1 नियन्त्रक वाले निर्माणों का आवश्यक नियन्त्रकों के साथ एग्रोबैक्टीरियम/ बायोलिस्टिक्स के द्वारा परिवर्तन लाकर प्रमाणिकरण अध्यनों के लिये प्रयोग किया गया। यह नियन्त्रक क्षेत्र धान व गन्ने के ऊतकों में तो गॅस जीन का प्रदर्शन दिखाने में सफल हो पाये मगर एैसा तम्बाकू और अरेबिडोप्सिस में सम्भव न हो सका जो इस तरफ इशारा करता है की नियन्त्रक अनुक्रम एक बीजपत्री फसल विशिष्ट है। रूपान्त्रण अध्यनों में जीन प्रदर्शन में 5’ धारा प्रवाह विरोधि क्षेत्रों वाले विभिन्न स्थानों का महत्व समझने के लिये इस क्षेत्र से 6 विलोपनों को pCAMBI वेक्टर में कलोन किया गया।

पराजीनिक अनुसंधान......

पराजीनिक अनुसंधान (contd...)

  • हरे घर के हालातों में दो प्रजातियों, नामशः को.86032 और को.जे. 64, के 39 पराजीनियों में केवल क्राई 1ए.बी या एप्रोटिनिन जीनों की शाखा बेधक विरोधि जीवपरख की गई। इससे पहले क्राई 1ए.बी के प्रदर्शन को वैस्टर्न विश्लेषण द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है और विष की इलिसा द्वारा मात्रा अनुमानित कर ली गई है। शाखा बेधक के नवजात शिशुओं के साथ परीक्षण में पारजीनक पौधों में, इसके बावजूद के इनमें बेधक के खाने के कारण क्षति देखी गई, समान्य पौधों के मुकाबले काफी कम डैड हर्टस देखे गये। कण बमबारी या एग्रोबैक्टीरियम की सहायता से परिवर्धित पराजीनियों में शाखा बेधक द्वारा क्षति में कोई अन्तर नहीं दिखाई दिया, इसके बावजूद की क्राई 1ए.बी का प्रदर्शन बाद वाली विधि से अधिक था। एप्रोटिनिन प्रदर्शन करने वाले गन्ने में बेधक द्वारा की गई क्षति में कमी क्राई 1ए.बी के प्रदर्शन के साथ और भी बढ़ गई जो इस बात की और इशारा करती है की दोनो जीनों में सुसंगति का गुण है। पराजीनियों के कुछ वर्गों में क्राई 1ए.बी के प्रदर्शन का, बेधक के कारण उत्पन्न हुए डैड हार्टस का, उल्टा सम्बंध देखा गया।
  • एक नये प्रोत्साहक की कलोनिंग व ऊतक विशिष्ट प्रदर्शन के बारे में अध्यन - यूबी (ubi) जीनों में से एक धारा प्रवाह के विरुद्ध 1929 बीपी वाली जीन को कलोन कर अनुक्रमित किया गया। अनुक्रमण डाटा के विश्लेषण से यह पता चला की लीडर अनुक्रमण में जीन के स्टार्ट कोडोन, धारा प्रवाह विरुद्ध, के शुरुआत में ही इन्ट्रोन्स व एक्सोन्स हैं जो क्रमशः 1653 बीपी और 37 बीपी के हैं। इन सबने मिलकर एक नियन्त्रक प्रणाली बनाई और प्रोत्साहक अनुक्रम में प्रोत्साहक तत्व - TATA डिब्बा और CAB डिब्बा- एवं जड़, गार्ड कोशिका तथा ज़ाइल्म विशिष्ट प्रदर्शन के लिये सिस क्रियाशीलता स्थान पाये गये। प्रमाणिकरण अध्यनों के लिये तम्बाकु को pCAMBI 1305, जिसमें गॅस जीन के साथ नया प्रोत्साहक है, की मदद से परिवर्धित किया गया। तम्बाकु के इन पराजीनियों में गॅस जीन के कुछ ऊतक विशिष्ट (जड़, गार्ड कोशिका तथा ज़ाइल्म) प्रदर्शनों को देखा गया।

गन्ने में सूक्षमजनन

गन्ने में सूक्षमजनन

  • तीव्र गति से बहुगुणित करने के लिये एक उन्नत पादप ऊतक संवर्धन विधि विकसित की गई है, जिसमें एक लाभकारी सहयोगी बैक्टीरिया को पहचाना गया है। यह लाभकारी बैक्टीरिया बहुत सारे एमिनो एसिडों, पादप-हारमोनों और विटामिनों को उत्पादित करने वाले हैं जो ऊतक संवर्धन से उत्पादित पौधों की वृद्धि में सहयोगी होते हैं, उन पर बिना किसी हानिकारक प्रभावों के। इस प्रक्रिया से उत्पादन लागत में 20% की कमी देखी गई जो इन विटरो में बहुगुणन की तीव्र गति व अधिक शाखाओं के उत्पादन के साथ माध्यम में समग्री, जैसेकि खनिज नमकों तथा पादप-हारमोनों, की कम आवश्यकता से सम्भव हो पाई।

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