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ADVISORY FOR SUGARCANE MANAGEMENT (Click for Details)

हाल ही की उपलब्धियां - गन्ना रोग विज्ञान

पीली पत्ति रोग

पीली पत्ति रोग और इसका प्रबन्धन

  • इस संस्थान द्वारा किये गये सर्वेक्षणों में पीली पत्ति रोग को देश में गन्ने की खेती के लिये एक उभरते हुए खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
  • विस्तिृत अध्यनों में पाया गया की इस रोग से ग्रसित पौधों में गन्ने के भार में 37% की कमी, गन्ने के व्यास में 15% की कमी तथा पोरियों की संख्या में भी कमी देखी जाती है। स्वस्थ गन्नों के मुकाबले रोग ग्रस्त पौधों के गन्नों के रस की ब्रिक्स%, शर्करा%, सी.सी.एस.% और शुद्धता% में कमी पाई जाती है। चीनी मिलों के क्षेत्रों में वर्ष 2000 में उत्पादक्ता, जो 95 टन/है0 थी वह धीरे धीरे घटकर 2009 में 77.5 टन/है0 पर पहुंच गई है। इसी प्रकार से मिलों में चीनी पुनःप्राप्ति में भी धीरे धीरे गिरावट देखी गई है। यह वर्ष 2000 के 12.31% से गिरकर 11.11% तक पहुंच गई है। कुल मिलाकर मिल के प्रदर्शन डाटा से पता चलता है की पीली पत्ति रोग के कारण मिल क्षेत्र में गन्ना उत्पादक्ता, गन्ने के रस में शर्करा% और चीनी पुनःप्राप्ति में क्रमिक मगर सतत् गिरावट थी। इन हालात से निपटनें के लिये क्षेत्र में स्वस्थ बीज नर्सरी कार्यक्रम को कार्यान्वित कर रोग प्रबन्धन की आवश्यक्ता है।
  • पीली पत्ति रोग के सफल प्रबन्धन के लिये ऊतक संवर्धन द्वारा उत्पादित पौधों/ विषाणु रहित रोपण समग्री द्वारा रोग रहित नर्सरियों की स्थापना प्रदर्शित की गई है। रोग संक्रमित और रोग रहित को. 86032 के गन्ने के बीज टुकड़ों को साथ साथ बड़े बड़े प्लाटों में रोपित कर उत्पादन मापकों को नियमित समय पर दर्ज किया गया। विषाणु रहित बीज समग्री से उगाई गई्र पौधा और पेड़ी की फसलों ने समान्य रोपित फसलों से बेहतर फसल का प्रदर्शन किया। विषाणु रहित बीज समग्री से उगाई गई पौधा और पेड़ी की फसलों ने क्रमशः 6.8 और 14.16% अधिक गन्ना उत्पादन दिखाया।
  • गन्ने में पील पत्ति रोग प्रतिरोधिता को जांचने के लिये 0-5 का सूचकांक विकसित किया गया है। इस नये सूचकांक का प्रयोग कर जर्मप्लास्म व प्रजाति संग्रहण में से रोग रहित जीनोटाइपों की पहचान की गई है।
  • गन्ने के पीली पत्ति विषाणु के चार विलगनों के पूरे जीनोम (करीब 5875 बीपी) को को. 86032, को.सी. 85061, को.वी. 92102 और बी. 38192 की संक्रमित पत्तियों से लेकर अनुक्रमित और लक्षण वर्णित किया गया। न्यूकलियोटाइड्स के अनुक्रमों को पहले से रिपोर्ट किये जा चुके जीनोटाइप्स के साथ सारेखण कर पता चला की नये विलगन एक अलग गुट के हैं और ओ.आर.एफ. 0 तथा ओ.आर.एफ. 1 में सराहनीय विभिन्नता को देखा गया। रिपोर्ट किये गये जीनोटाइप्स ओ.आर.एफ. 0 के अनुक्रमों में 29.2 से 31.8% की आर.ई.यू. के साथ, 28.1 से 34.4% की एच.ए.डब्लयू.-पी.ई.आर. के साथ और 30.7 से 33.4% की बी.आर.ए. के साथ विभिन्नता देखी गई। चीन से रिपोर्ट किये गये सी.एच.एन. 1 के साथ नये जीनोटाइप आईएन.डी. 1 का बड़े निकट का सम्बंध दिखाई देता है।

लाल सड़न रोग

लाल सड़न रोग

प्रोटियोनामिक्स द्वारा लाल सड़न रोग प्रतिरोधिता में भाग लेने वाली प्रोटिनों की पहचान

  • गन्ने के लाल सड़न रोग प्रतिरोधि (को. 93009) और संवेदनशील (को.सी 671) किस्मों के स्टाक के ऊतकों को रोगजनक से इनाक्यूलेट कर दो-आयामों वाले जैल इलैक्ट्रोफोरेसिस द्वारा प्रोटियोम प्रोफाइलों के लिये अध्यन किया गया। इस परीक्षण में रोगजनक के साथ 12 घंटों की प्रतिक्रिया के बाद प्रतिरोधि किस्म में प्रोटीनों के धब्बों की संख्या अधिक (335 ± 7) पाई गई जबकि संवेदनशील किस्म में धब्बों की संख्या कम (280 ± 3) पाई गई।
  • प्रोटियोमिक विश्लेषण से स्टाक के ऊतकों में पाये गये प्रोटीन धब्बों में से 250 से अधिक को प्रतिलिपियों में बड़ी संख्या में पुनरुत्पादित होते पाया गया।
  • करीब 50 अतिरिक्त प्रोटीन के धब्बों को प्रतिरोधि किस्म में रोगजनक से इनाक्यूलेट करने पर देखा गया जबकि करीब 24 प्रोटीन धब्बों को संवेदनशील प्रजाति में नीचे की तरफ नियंत्रित होते देखा गया।
  • गन्ने की लाल सड़न रोग प्रतिरोधिता में भाग लेने वाली विशिष्ट प्रोटीनों की पहचान के लिये सी. फाल्केटम x गन्ने के बीच अन्तरक्रिया के दौरान दो-आयामों वाले जैल इलैक्ट्रोफोरेसिस द्वारा प्रोटियोम के स्तर पर हमारा विश्लेषण को मानकीकृत करने का प्रथम प्रयास है।
  • पैप्टाइड मास फिंगर प्रिंटिंग द्वारा ऊपर/नीचे नियंत्रित होती करीब 125 प्रोटीनों को लक्षण वर्णित किया गया है। पहचानी गई कुछ प्रोटीन तथाकथित कैलोस सिंथेस, आर.2आर3-एम.वाई.बी. ट्रान्सक्रिप्शन घटक एम.वाई.बी.6, पी-कौमरेट 3-हाइड्रोक्सीलेस, पी.आरएल.टी.पी.1 और PISTALLIA-जैसी प्रोटीन थी। पहचानी गई प्रोटीनों के विविध प्रदर्शन का प्रमाणीकरण का आगे का कार्य वास्तविक समय-पी.सी.आर. द्वारा प्रगति पर है।

रोग प्रतिरोधि प्रजातियों की जांच

  • सी.सी.टी. विधि द्वारा 2386 जांचे गये जीनोटाइप्स में से 749 कृन्तकों को लाल सड़न रोग प्रतिरोधि/ सहनशील पाया गया है। उपोषणकटिबंधीय हालातों में को. 0327, को. 0331, को. 0424, को. 05010 और को. 05011 को प्रतिरोधि पाया गया है।

लाल सड़न रोग.......

लाल सड़न रोग प्रबंधन

  • कवॅक नाशियों द्वारा लाल सड़न रोग प्रबंधन अध्यनों में इनके उपचार से गन्ने के रोपित किये गये बीज टुकड़ों को मृदा में उपस्थित इनाक्यूलम से बचाया जा सका और इनसे अंकुरण में भी वृद्धि देखी गई।
  • गमलों व खेत के हालातों में किये गये परीक्षणों में थायोफैनेट मिथाइल को नये कवॅकनाशियों, नामशः आउरोफन्जिन और ट्राइसाइक्लाज़ोल, के साथ अनुकूल और लाल सड़न रोग के विरुद्ध अधिक प्रभावशाली पाया गया। रात भर सोखना और छोटी अवधि की मशीनी विधियों द्वारा बीज टुकड़ों को उपचारित करने से एक जैसा प्रभाव दिखाई दिया।
  • कवॅक नाशियों का निर्वात यन्त्र से गन्ने के बीज टुकड़ों द्वारा अवशोषण/ समावेश का प्रभाव रात भर सोखने के बराबर था और यह सभी तरंह के ऊतकों, जैसेकि कलिकाओं, छाल, कटे अन्तिम छोर और अन्दर के भाग, में एक जैसा था।
  • खेत के हालातों में गन्ने के बीज टुकड़ों को अकेले नेटिवो में या इसे केबरियो या थायोफैनेट मिथाइल के साथ मिलाकर घोल में रात भर सोखने से फसल को लाल सड़न रोग के मृदा में उपस्थित इनाक्यूलम से बचाया जा सका तथा इससे पौघों की उत्तरजीविता व मिल में पीढ़ने योग्य गन्नों की संख्या पर अच्छा प्रभाव देखा गया।
  • जब गन्ने के बीज टुकड़ों को कोलटेट्राइक्म फालकेटम को दानों के साथ इनाक्यूलेट किया गया तब रोग प्रतिरोधि प्रेरकों में से बी.टी.एच. के कारण सबसे कम लाल सड़न रोग का संक्रमण (0.4%) देखा गया जबकि इसके बाद सी.एफ-इलिसिटर (2.3%) और जी.ए.बी.ए. (2.9%) को पाया गया ।
  • तीन अन्तःपौधीय बक्टीरियों, नामशः ई.एस.आर. 3, ई.एस.आर. 24 और ई.एस.आर. 26 को गन्ने से विलगित किया गया जिनमें कवॅक विरोधि, फास्फेट घोलने और साइडेफार उत्पादन क्षमता थी।

लाल सड़न रोग में विभिन्न्ता की पहचान के लिये नये भेदकर

  • भेदकर मेज़बान की रोगजनक के साथ अन्तरक्रियाओं के अध्यनों में, 14 भेदकरों को प्रयोग करने पर, देखा गया की उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के सी.एफ02, सी.एफ03 और सी.एफ09 रोगजनकवर्गों से सी.एफ01, सी.एफ08 और सी.एफ11 रोगजनकवर्ग अधिक संक्रामक थे।
  • तमिल नाडू से इकठ्ठे किये गये 4 विलगनों में से को.एस.आई6 और को. 91017 से विलगित किये गये विलगन अधिक संक्रामक दिखाई दिये। इस अध्यन से नये सी.एफ98010, सी.एफ94012, सीएफ6907 और सी.एफ94003 रोगजनकवर्ग की संक्रामकता का भी पता चला।
  • उषणकटिबंधीय क्षेत्र के लाल सड़न विलगनों के विरुद्ध कई प्रजातियों ने स्पष्ट विभेदक अन्तर क्रिया दर्शाई।
  • तमिल नाडू, हरियाणा, आन्ध्र प्रदेश व बिहार से नये रोगजनक विलगनों को इकठ्ठा किया गया। सी. फालकेटम के 49 विलगनों में विभिन्नता के कार्य को ß-ट्यूबुलिन प्राइमरों के दो वर्गों के साथ प्रारम्भ किया गया। विलगनों के बीच विभिन्नता को ß-ट्यूबुलिन जीन (करीब 545 बीपी) के भिन्नता वाले क्षेत्र 1 में, ß-ट्यूबुलिन जीन (करीब 480 बीपी) के भिन्नता वाले क्षेत्र 2 और एक्टिन जीन से, अधिक विभिन्नता देखी गई।

लाल सड़न रोग.....

लाल सड़न रोग और स्मट के लिये आणविक निदान

  • गन्ने के स्टाक में लाल सड़न रोग की पहचान के लिये पी.सी.आर. आधारित आणविक निदान को ऊतक जीव परख के मुकाबले में अति सही पाया गया।
  • गन्ना खेतों की मृदा जड़क्षेत्र व बिना जड़ वाले क्षेत्र से लाल सड़न और अन्य कवॅक रोगजनकों की उपस्थिति के निदान के लिये आर.एन.ए. और डी.एन.ए. को मृदा से विलगित करने के लिये और पी.सी.आर./आर.टी.-पी.सी.आर. आधारित तकनीकों के प्रोटोकालों को मानकीकृत किया गया।
  • स्मट रोगजनक की बीई. मेटिंग टाइप जीन के आधार पर प्राइमरों को डिजाइन किया गया और पाया गया की इन्होंने विशेषतौर पर लक्षित जीन (करीब 454 बीपी) को स्मट रोग जनक के सुप्त संक्रमण वाले, बिना लक्षण वाले, पौधों में परिवर्धित किया। इस पी.सी.आर. आधारित निदान तकनीक को गन्ने के बड़े सारे कृन्तकों के साथ फिर से वैधता को जांचा जा रहा है और इसके साथ ही पी.सी.आर. तकनीक के हालातों को उपयुक्त बनाया जा रहा है ताकि परिणाम दोहराने लायक प्राप्त हो सकें।

सी. फालकेट्म मे रोगजनक्ता की प्रक्रिया

  • कोलेटोट्राइक्म के हेमिबायोट्रोफिक कवॅक रोगजनकों की रोगजनक्ता के दौरान एपरिसोरिया में मेलानिन रंगद्रव्य का बनना एक आवश्यक अंग है। प्रयोगशाला व खेतों में किये गये विस्तृत अध्यनों के आधार पर, जिसमें सी. फालकेट्म के विभिन्नता वाले विलगनों के वर्ग के साथ कार्य करने पर, सी. फालकेट्म की संक्रामक्ता में एपरिसोरिया में मेलानिन रंगद्रव्य के बनने को एक आवश्यक अंग के रूप में स्थापित किया जा सका। केवल एपरिसोरिया में मेलानिन रंगद्रव्य को उत्पन्न कर सकने वाले विलगनों में संवेदनशील गन्ना प्रजातियों में ही लाल सड़न रोग उत्पन्न किया जा सका।
  • बीजाणुओं के तरल विष की लाल सड़न रोगजनक्ता में योगदान को स्थापित किया जा सका और एक एैसे घटक को पहचाना जा सका जो विष का सर्वोत्म स्त्रोत था और इसे विष पदार्थ की संरचनात्मक समझ के लिये प्रयोग किया जा सकता है।

लाल सड़न रोग.....

लाल सड़न रोग प्रतिरोधिता का आणविक आधार

  • गन्ने और सी. फालकेट्म के बीच विशेषकर प्रेरित की गई परस्पर विरोधि अन्तरक्रिया को कलोन करने के लिये स्बट्रैक्टिव संकरण को मानकिकृत किया गया जिसके लिये प्रतिरोधि और संवेदनशील प्रजातियों से आर.एन.ए. को परीक्षक और संचालक के रूप में क्रमशः प्रयोग किया गया। इस परीक्षण के आधार पर 3 लाइब्रेरियों का निर्माण किया गया और पाया गया की परस्पर विरोधि अन्तरक्रिया के दौरान विभिननता से प्रदर्शित की गई करीब 850 प्रतिलिपियों को पहचाना गया था और उनमें से करीब 250 प्रतिलिपियां कार्यवाहक दृष्टि से टिप्पणी वाली थी।
  • गन्ने में काइटिनेस के कलास 4 के पूरे ओ.आर.एफ. के तदुनरूपी सीडी.एन.ए. (815 बीपी) की पूरी लम्बाई को सीधेतौर पर पीएम.ए.अल.-सी.4एक्स. प्रोटीन प्रदर्शन करने वाले वैक्टर में कलोन किया गया । पुनर्संयोजित प्लास्मिड को ई.कोलाई के के.12 स्ट्रेन में रूपान्तरित किया गया और काइटिनेस प्रोटीन की उपस्थिति एम.बी.पी.-काइटिनेस फयूज़न के रूप में प्रदर्शित हुई। काइटिनेस प्रोटीन की उपस्थिति पुनर्संयोजित प्रोटीन में घटक एक्स.ए के क्टाव द्वारा प्रमाणित हुई, जिसने फयूज़न प्रोटीन को करीब 42.0 केडी.ए और करीब 26 केडी.ए के घटकों के रूप में बांट दिया जो क्रमशः एम.बी.पी. और काइटिनेस से मेल खाते थे।
  • जीन विशिष्ट, आगे ले जाने और उल्टे ले जीने वाले, प्राइमरों को फैटी एसिड डीसैचूरेस के लिये डिजाइन किया गया और लयूसिन से भरपूर प्रोटीन ट्रांस्क्रिप्टों को, 5’-3’आर.ए.सी.ई. की मदद से, परिवर्धन की गई पूरी लम्बाई में डी.डी.-आर.टी.-पी.सी.आर. द्वारा पहचाना गया। फैटी एसिड डीसैचूरेस वाला एक परिवर्धन करीब 800 बीपी का पाया गया।
  • प्राइमरों के 42 वर्गों को प्रयोग कर, गन्ने से निमन्नलिखित ट्रांस्क्रिप्शन घटकों, नामशः डब्लयू.आर.के.वाई., एम.वाई.बी., टी.एल.पी., एन.ए.सी. और बी.ज़ैड.आई.पी., को परिवर्धित किये जाने को अनुकूलतम बनाया गया ताकि उनका रोगजनक की पहचान और संकेतक भूमिका के लिये अध्यन किया जा सके।

विल्ट

विल्ट के लक्षणों का बनावटी पुनरुत्पादन

विल्ट के लक्षणों का बनावटी पुनरुत्पादन
  • करनाल और गुजरात में समान्य प्राकृतिक हालातों में, और कोयम्बत्तूर में सूखे और जलप्लावन के साथ, रोगजनक से इनाक्यूलेट कर गन्ने में विल्ट के बनावटी लक्षणों को पुनरुत्पादित कर विस्तृत अध्यन किया गया। इनाक्यूलेशन के लिये नीयत प्लग विधि को अपनाकर 5 महीने बाद रोग के लिये मूल्यांकित करने पर प्रजातियों के एक वर्ग में विल्ट के बहुत ही स्पष्ट लक्षणों का पुनरुत्पादन सभी स्थानों पर देखा गया जबकि कुछ प्रजातियों को लक्षण रहित पाया गया जो उनकी प्रतिरोधिता/ सहनशीलता की और इशारा करता है।
रोगजनक की पहचान का प्रमाणिकरण
  • पहले के कार्यकर्ताओं द्वारा गन्ने में विल्ट के सच्चे रोगजनक के बारे में फुसेरियम, सेफलोस्पोरियम और एकरिमोनियम की जातियों के होने के परस्पर विरोधि दावे प्रस्तुत किये गये हैं। क्योंकि विल्ट से जुड़े रोगजनक को स्पष्ट तौर पर स्थापित नहीं किया गया था अतः कवॅक जातियों की पहचान के लिये रोगजनक्ता और आणविक विभिन्नताओं पर विस्तृत अध्यन किये गये। फुसेरियम से विल्ट रोगजनक विलगनों में आणविक विभिन्नताओं के अध्यन के लिये विशिष्ट आर.ए.पी.डी. और आई.एस.एस.आर. मारकरों को प्रमाणिकरण के लिये प्रयोग किया गया। आणविक मारकरों, जैसेकि आर.ए.पी.डी. प्राइमर ओ.पी.ए.13 का 1000 बीपी वाला घटक, आई.एस.एस.आर.1 का 650 बीपी वाला घटक, आई.एस.एस.आर.5 का 720 बीपी वाला घटक और आई.एस.एस.आर.9 का 880 बीपी वाले घटकों, की मदद से रोगजनकों और रोग न उत्पादित कर सकने वाले विलगनों को स्पष्ट तौर पर अलग किया जा सका। खेत और प्रयोगशाला में किये गये अध्यनों द्वारा, बहुत ही साफ तौर पर, विल्ट रोगजनक विलगनों को फुसेरियम सैकेराई जाति से होने को प्रमाणित कर दिया गया। उत्पादित किये गये आणविक मारकरों और एफ. सैकेराई के विलगनों का रोगजनक्ता के साथ सम्बंध का यह पहला प्रयत्न है।

विषाणु

गन्ने के विषाणु

पुनर्संयोजक विषाणु की कोट प्रोटीन के लिये एन्टीसीरम का उत्पादन

  • गन्ने के धारीदार पच्ची विषाणु (गधापवि) के ओ.आर.एफ. भाग की कोट प्रोटीन (कोप्रो) जीन (करीब 850 बीपी) को कोड करने वाले सीडी.एन.ए. को प्रोटीन प्रदर्शन वैक्टर पीएम.ए.एल.-सी.4एक्स. के EcoRI स्थान पर कलोन किया गया। इस पुनर्संयोजक प्लास्मिड को फिर रूपान्तरित किया गया और इसने गधापवि-कोप्रो को एम.बी.पी.-गधापवि-कोप्रो फयूज़न प्रोटीन के रूप में प्रदर्शित किया। प्रदर्शित प्रोटीन को एक एन्टीजन के रूप में प्रयोग कर अति विशिष्ट एन्टीसीरा को विषाणु निदान के लिये उत्पादित किया गया। सीरम की अत्याधिक संवेदनशीलता को इलिसा और आई.सी.-आर.टी.-पी.सी.आर. द्वारा प्रमाणित किया गया है।

गन्ना विषाणुओं का आणविक निदान

  • एक बहुविध उल्ट प्रतिलिपिकरण पोलीमरेस श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया (एम.-आर.टी.-पी.सी.आर.) विधि को विकसित किया गया ताकि विश्व भर के गन्ना उगाये जाने वाले क्षेत्रों में पाये जाने वाले तीन मुख्य आर.एन.ए. विषाणुओं, नामशः गन्ना पच्ची विषाणु, गन्ना धारीदार पच्ची विषाणु और गन्ना पीली पत्ति विषाणु, की पहचान की जा सके। इन विषाणुओं के कोट प्रोटीन जीनों से उनके घटकों को परिवर्धित किया गया जो एम.-आर.टी.-पी.सी.आर. द्वारा उत्पादित करीब 860 बीपी (गन्ना पच्ची विषाणु) करीब 690 बीपी (गन्ना धारीदार पच्ची विषाणु) और करीब 860 बीपी (गन्ना पीली पत्ति विषाणु) के घटक पाये गये। इस अध्यन में गन्ने के विषाणुओं से संक्रमित संदिग्ध पौधों से विशेषकर लक्षित विषाणुओं को पहचानने में हम सफल हो पाये। परीक्षित किये गये 9 नमूनों में से 4 में सभी तीनो विषाणु पाये गये, 2 में गन्ना पच्ची विषाणु और गन्ना धारीदार पच्ची विषाणु दोनो साथ पाये गये और बाकी 3 नमूनों में केवल एक एक ही विषाणु पाया गया। एम.-आर.टी.-पी.सी.आर. के उत्पादों के अनुक्रमों की सूचनाओं ने इन विषाणुओं की प्रमाणिक्ता सिद्ध कर दी। इसके अलावा गन्ने के लक्षित विषाणुओं को परिवर्धित करने के लिये बहुविध-आर.टी.-पी.सी.आर. उतनी ही क्षमतावान थी जितनी की एकलविध आर.टी.-पी.सी.आर. सक्षम थी।

विषाणु सुचकांकिकरण के लिये परीक्षण प्रयोगशाला की अधिकारिक मान्यता

  • संस्थान की पादप रोग विज्ञान प्रयोगशाला को ऊतक संवर्धन से उत्पादित गन्ने के पौधों को विषाणु परीक्षण के लिये, जीव प्रौद्योगिकी विभाग, नई दिल्ली के ऊतक संवर्धन से उत्पादित पौधों के लिये राष्ट्रीय प्रमाणिकरण प्रणाली के अन्तरगत, अधिकारिक मान्यता प्राप्त है। भारत में ऊतक संवर्धन से गन्ने के पौधों को उत्पादित करने वाली इकाईयों को इस विषाणु सूचकांक सेवा को प्रदान किया जा रहा है। तमिल नाडू, आन्ध्र प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से प्राप्त ऊतक संवर्धन से उत्पादित गन्ने के पौधों को आर.टी.-पी.सी.आर./ पी.सी.आर. तकनीकों से गन्ना पच्ची विषाणु, गन्ना धारीदार पच्ची विषाणु, गन्ना पीली पत्ति विषाणु और घासदार शाखा वाले फाइटोप्लास्मास की उपस्थिति के लिये विश्लेषित कर सूचकांकित किया गया। इस सुविधा से रोग रहित पौधों की विभिन्न राज्यों में अपूर्ति सम्भव हो पायेगी जिससे गन्ना उत्पादक्ता में वृद्धि हो पायेगी।

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