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लोकप्रिय और आशाजनक प्रजातियां

इतिहासिक उपलब्धियां

इतिहासिक उपलब्धियां

इस संस्थान की 1912 में स्थापना के साथ ही प्रजातियों के विकास का कार्य अनुसंधान का केन्द्रिय बिन्दू रहा है। उपोषणकटिबंधीय हालातों के लिये प्रजातियों के प्रजनन के कार्य की शुरुआत अपने आप में एक पहल थी। विश्व का पहला सफल व्यवसायिक अन्तर-जातीय संकर को. 205, जिसे खेती में प्रयोग किये जा रहे सैक्रम आफिशनेरम को जंगली घास सैक्रम स्पानटेनियम के साथ क्रास कर प्राप्त किया गया। यह प्रजाति 1920 के दशक में पंजाब प्रान्त में बहुत ही लोकप्रिय रही। संस्थान द्वारा प्रजनित की गई प्रजातियों, जैसेकि को. 213, को. 214, को. 281, को. 285, को. 290, को. 312, इत्यादि, ने भारत के चीनी उद्योग के पुनर्निर्माण में सहायता की। वर्ष 1926 से संस्थान ने भारत के उषणकटिबंधीय क्षेत्र के लिये भी प्रजातियों के विकास के कार्य को प्रारम्भ किया।

संस्थान के द्वारा विकसित की गई कुछ इस प्रकार की प्रजातियां, जो पूरे भारतवर्ष में बहुत सफल रहीं, वह थी - को. 419, को. 453, को. 740, को. 997, को. 1148, को. 62175, को. 6304 और को. 6806 । वर्ष 2000 में को. 86032 प्रजाति को लोकार्पण के लिये अधिसूचित किया गया और भारत के उषणकटिबंधीय अधिकतर क्षेत्र में इसे उगाया जा रहा है। हाल ही में लोकार्पित की गई उपोषणकटिबंधीय प्रजातियां को. 0118 और को. 0238 हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों में बहुत ही लोकप्रिय हुई हैं। अतः संस्थान द्वारा विकसित की गई प्रजातियों ने हमारे राष्ट्र को चीनी आयातक से आज विश्व में सार्वधिक चीनी उत्पादक देश के स्तर पर ला खड़ा किया है। संस्थान द्वारा विकसित की गई प्रजातियां आज पूरे भारतवर्ष में न केवल उगाई जा रही हैं बल्कि विश्व के 26 अन्य देशों में इन्हें प्रजनक स्टाकों के रूप में प्रयोग भी किया जा रहा है।

लोकप्रिय प्रजातियां

भारत के विभिन्न भागों में लोकप्रिय प्रजातियां

नीचे दी गई तालिका में 1920 से ले कर आज तक, प्रत्येक दशक में उषणकटिबंधीय और उपोषणकटिबंधीय क्षेत्रों में, जो प्रजातियां लोकप्रिय रहीं या जिन्हें अच्छी पहचान मिल रही है, को सूचित किया जा रहा है। इस सम्पर्क में हाल ही में भारत के विभिन्न भागों के लिये लोकार्पित की गई प्रजातियों का वर्णन किया गया है।


उपोषणकटिबंधीय क्षेत्र

1920 का दशक Co 205, Co 210, Co 213, Co 214, Co 224, Co 281, Co 290
1930 का दशक Co 205, Co 213, Co 223, Co 244, Co 281, Co 285, Co 290, Co 312, Co 313
1940 का दशक Co 213, Co 312, Co 313, Co 331, Co 356, Co 453
1950 का दशक Co 312, Co 313, Co 453, Co 951
1960 का दशक Co 312, Co 975, Co 1107, Co 1148
1970 का दशक Co 312, Co 1148, Co 1158
1980 का दशक Co 1148, Co 1158, Co 7717, Co 7314
1990 का दशक Co 1148, Co 89003
2000 का दशक Co 89003, Co 98014, Co 0238, Co 0118

उषणकटिबंधीय क्षेत्र

1920 का दशक Co 213
1930 का दशक Co 213, Co 243, Co 281, Co 290, Co 313
1940 का दशक Co 213, Co 419
1950 का दशक Co 419, Co 449, Co 527
1960 का दशक Co 419, Co 527, Co 658, Co 740, Co 853, Co 975, Co 997
1970 का दशक Co 419, Co 527, Co 658, Co 740, Co 975, Co 997, Co 853, Co 62175, Co 6304, Co 6806, Co 6415
1980 का दशक Co 419, Co 740, Co 975, Co 62175,Co 6304, Co 6907, Co 7219
1990 का दशक Co 740, Co 62175, Co 6304, Co 7219, Co 7704, Co 7527, Co 7508, Co 7504, Co 8011, Co 8014, Co 8021, Co 8208, Co 8362, Co 8371, Co 8338, Co 85004, Co 86032, Co 85019, Co 86249, Co 97009
2000 का दशक Co 86032, Co 99004, Co 94012, Co 2001-13, Co 2001-15

हाल ही के लोकार्पण (उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र)

उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र के लिये प्रजातियां

को. 0232 - उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र के लिये अगेती प्रजाति

को. 0232 को को.एल.के 8102 x को. 87267 के संकरण कर कृन्तक चुनाव द्वारा प्राप्त जल प्लावन सहनशील और लाल सड़न रोग प्रतिरोधि एक अगेती प्रजाति है। यह कृन्तक उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र के पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में खेती के लिये उपयुक्त है। इस कृन्तक को गन्ना प्रजनन संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, मोतीपुर (जो अब भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के अन्तरगत कार्यरत है), बिहार में 2002 के दौरान पहचाना गया। जलप्लावन के हालातों में को. 0232 ने सर्वोतम मानक को.एस.ई 95422 से 7.63% अधिक गन्ना उत्पादन, 11.55% अधिक सी.सी.एस. टन/है0 और रसमें शर्करा की मात्रा 0.77% अधिक थी। यह जल्द पड़ने वाले सूखे के लिये व चोटी बेधक के लिये प्रतिरोधि है।

को. 0233, उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र के लिये मध्यम देरी वाली प्रजाति

को. 0233 को गन्ना प्रजनन संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, मोतीपुर (जो अब भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के अन्तरगत कार्यरत है), बिहार में पहचाना गया। यह को.एल.के 8102 x को. 775 के संकरण से कृन्तक चुनाव द्वारा प्राप्त मध्यम देरी से परिपक्व होने वाली प्रजाति है जो उत्तर पूर्वी और उत्तर मध्य क्षेत्र के लिये उपयुक्त है। को. 0233 को सर्वोतम मानक को.एस.ई 95422 से 21.11% अधिक गन्ना उत्पादन और 24.62% अधिक सी.सी.एस. टन/है0 उत्पादन देते पाया गया। यह जल्द पड़ने वाले सूखे, जलप्लावन, चोटी बेधक और लाल सड़न रोग के लिये प्रतिरोधि और उच्च उत्पादन देने वाली किस्म है।

प्राप्त होने वाली आशाजनक प्रजातियां

को. 0314 - प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिये अगेती कृन्तक

को. 0314 को श्याम्ला नाम दिया गया है जिसे को. 7201 x को. 86011, दो उच्च उत्पादन और रस की उच्च गुणवत्ता वाले पैतृकों, के संकरण और चुनाव प्रक्रिया द्वारा विकसित किया गया है। इसे 2003 में गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयम्बत्तूर में एक अगेती को. प्रजाति के रूप में पहचाना गया जो प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिये उपयुक्त है। उच्च उत्पादन और रस की उच्च गुणवत्ता के गुणों के अलावा यह लाल सड़न रोग के लिये मध्यम प्रतिरोधि व स्मट प्रतिरोधि है। इसके गुड़ की गुणवत्ता ए.1 है और गन्ने में रेशे की मात्रा 13.93% है। इस प्रजाति का खेत में बहुत ही अच्छा प्रदर्शनीय स्टैंड है और शुरुआती तीव्र वृद्धि, गहरे हरे रंग के पत्ते, सीधे व 3 मीटर तक ऊँचाई वाले बिना फटाव के गन्ने इस प्रजाति के कुछ गुण हैं।

को. 0209 - प्रायद्वीपीय क्षेत्र के लिये अगेती कृन्तक

को. 0209, जिसे को. 8353 x को. 86011 के क्रास से प्राप्त किया गया, ने को.सी. 671 और को. 85004 के मुकाबले पूरे प्रायद्वीपीय क्षेत्र में गन्ना व चीनी उत्पादन की दृष्टि से बेहतर प्रदर्शन दिखाया। उच्च उत्पादन और रस की उच्च गुणवत्ता के गुणों के अलावा यह लाल सड़न व स्मट रोगों के लिये प्रतिरोधि है। इसके गुड़ की गुणवत्ता ए.1 है और गन्ने में रेशे की मात्रा 13.93% है। इस प्रजाति का खेत में बहुत ही अच्छा प्रदर्शनीय स्टैंड है और शुरुआती तीव्र वृद्धि, गहरे हरे रंग के पत्ते, सीधे व 3 मीटर तक ऊँचाई वाले गन्ने तथा शीथ पर कांटे न होना इस प्रजाति के कुछ गुण हैं।

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