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फल्फ आपूर्ति

फल्फ आपूर्ति

राष्ट्रीय संकरण बगीचा और फल्फ वितरण कार्यक्रम

राष्ट्रीय संकरण बगीचे की सुविधा को कोयम्बेत्तूर में अखिल भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजना केन्द्रों के गन्ना प्रजनकों के लिये एक सामान्य प्लेटफार्म की सुविधा प्रदान करने के लिये 1974 में श्रथापित किया गया ताकि वह सीधे तौर पर पैतृकों के चुनाव व क्रासिंग में भाग ले सकें। हर वर्ष विभिन्न केन्द्रों के द्वारा समय से पहले सुझाये गये आवश्यक पैतृकों को एक सामान्य प्रजनन प्लाट में रोपित किया जाता है। वांछित क्रासिस को बनाने के लिये प्रजनकों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। पुष्पण मौसम के अंत में सूखे फल्फ को इकठ्ठा कर साफ किया जाता है और फिर उसका अंकुरण परीक्षण कर सम्बंधित केन्द्रों को भेज दिया जाता है। हर साल करीब 600 पैतृक कृन्तकों को रोपित कर अनुरक्षित किया जाता है। उन कृन्तकों को बगीचे से हटा दिया जाता है जिन्हें पिछले तीन वर्षों में प्रयोग न किया गया हो। केन्द्रों द्वारा नीयत किये गये नये पैतृक कृन्तकों को संगरोधन के बाद बगीचे में शामिल कर लिया जाता है। एक ऊँचे मार्गों की नवीन विधि ने परागों को इकठ्ठा करने और उनको छिड़कने के कार्य को आसान बना दिया है जिससे क्रासिस बनाने की कुशलता में वृद्धि हुई है। इस विधि से दूसरों से कम सहायता लिये भाग लेने वाले केन्द्रों के विज्ञानिकों को नर स्पाइकलैट्स को परागण करने के लिये इकठ्ठा करने में और प्रौढ़ फल्फ को भी इकठ्ठा करने में सुविधा होती है।

Elevated Runway for hybridization

वर्ष 2013-14 के दौरान संस्थान में स्तिथ राष्ट्रीय संकरण बगीचा में 666 पैतृ़क कृन्तकों को 22 भाग लेने वाले केन्द्रों द्वारा क्रासिंग के लिये प्रयोग किया गया। कुल 541 स्टेशन क्रासिस, 14 सैल्फस, 50 क्षेत्रीय क्रासिस (चार क्षेत्रों के लिये बनाये गये जिनमें से 13 प्रायद्वीपीय क्षेत्र, 11 पूर्व तटटीय क्षेत्र, 10 उत्तर पश्चिमी क्षेत्र और 16 उत्तर केन्द्रीय और उत्तर पूर्वीय क्षेत्रों के लिये थे) और 204 सामान्य क्रासिस से प्राप्त हुए 42.91 किलोग्राम फल्फ को विभिन्न केन्द्रों को भेजा गया । राष्ट्रीय संकरण बगीचा में से प्राप्त अधिकतर क्रासिस के फल्फ में बीज का बनना काफी अच्छा पाया गया और 15 क्रासिस में अंकुरण दर 320/ग्राम फल्फ से अधिक पाई गई।

दूरस्थ संकरण बगीचा

एक राष्ट्रीय दूरस्थ संकरण सुविधा को अनुसंधान केन्द्र अगली (केरल) में स्थापित किया गया है जहां जंगली सम्बंधित जैनरा और स्पीसिस को पैतृकों के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। हर साल हितबद्ध भाग लेने वाले यहां तरंह तरंह के क्रासिस बनाते हैं और उनसे प्राप्त फल्फ को इकठ्ठा कर साफ किया जाता है और फिर उसका अंकुरण परीक्षण कर सम्बंधित केन्द्रों को भेज दिया जाता है।

कार्यक्रम का प्रभाव

राष्ट्रीय स्तर पर फल्फ आपूर्ति कार्यक्रम का प्रभाव

देश के मुख्य राज्यों में कई प्रचलित प्रजातियों का उद्गम कोयम्बत्तूर में प्रजनित कर फल्फ अपूर्ति कार्यक्रम के अनत्रगत प्राप्ति से हुआ है। इस प्रकार की प्रजातियों की लिस्ट नीचे दी जा रही है:-

  1. उत्तर प्रदेश: CoLk 8001, CoLk 8102, CoLk 9110, CoS 245, CoS 510, CoS 611, CoS 633,CoS 687, CoS 718, CoS 767, CoS 802, CoS 7918, CoS 8436, CoS 8439, CoS 87220, CoS 88230, CoS 95222, CoS 95435, CoPant 84211, CoS 95255, CoS 96258, CoS 97264, CoS 96268, CoSe 92423, CoSe 91232.
  2. बिहार: CoP 9206, CoP 9301, CoP 9302
  3. आसाम: CoJor 1, CoJor 2
  4. पंजाब: CoJ 46, CoJ 64, CoJ 67, CoJ 76, CoJ 77, CoJ 78 CoJ 79, CoJ 81, CoJ 83, CoJ 84, CoJ 85, CoJ 82191, CoJ 82315, CoJ 83536, CoJ 84191, CoJ 84291, CoJ 94192
  5. हरियाणा: CoH 7801, CoH 7802 ,CoH 7803, CoH 56, CoH 70, CoH 110, CoH 119
  6. मध्य प्रदेश: CoJn 861417.
  7. गुजरात: CoN 87263,CoN 91132
  8. महाराष्ट्र: CoM 7125, CoM 88121, CoM 0265
  9. कर्नाटक: KHS 3298
  10. आन्ध्र प्रदेश: CoA 7601, CoA 7602, CoA 7701, CoA 8401, CoA 8402, CoT 8201, CoR 8001, CoR 85096, CoA 88081, CoA 89081, CoA 89082, CoA 89085, CoV 92102
  11. तमिल नाडू: CoC 671, CoC 771, CoC 772 , CoC 773, CoC 774, CoC 775, CoC 777, CoC 778, CoC 779, CoC 8001, CoC 8201, CoC 85061, CoC 86062, CoC 90063, Co 91061, CoC 92061, CoG 93076, CoG 94077, CoSi 776, CoSi 86071, CoSi 95071

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